Wednesday, January 26, 2011

बच्चों में बढ़ती क्रोध और आत्महत्या की प्रवृत्ति --- सुनील अमर

सुश्री शीबा फ़हमी
दिल्ली में कक्षा दो में पढ़ने वाले आठ वर्षीय एक बालक ने गत सप्ताह माँ द्वारा खेलने से मना किये जाने पर फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली। बीते एक पखवारे में ही देश के कई शहरों से बच्चों द्वारा आत्महत्या कर लेने की कई घटनायें प्रकाश में आई हैं। ज्यादा चिंतनीय यह है कि ये बच्चे दस साल से भी कम उम्र के थे। एक ऐसी उम्र, जिसमें माना जाता है कि बच्चा खाने और खेलने के अलावा कुछ जानता ही नहीं, और इसी उम्र में ही जिन्दगी के खिलाफ इतना बड़ा फैसला! देश में लगभग एक दशक पहले जब टी.वी. चैनलों पर धारावाहिकों का तूफानी दौर जारी हुआ, ऐसे तमाम विज्ञापन और कथाऐं आईं, जिनकी नकल में बहुत से मासूम बच्चे अपनी जान गवाँ बैठे। ऐसे कार्यक्रमों पर उस वक्त रोक लगाने की माँग भी देश में उठी और उनमें परिवर्तन भी हुए। वे घटनायें नकल में थीं इसलिए चिंताऐं भी हल्की थीं कि नकल के स्रोत जब बंद कर दिये जाऐंगें तो बच्चों की यह प्रवृत्ति भी रुक जायेगी। आगे चलकर कुछ हद तक ऐसा हुआ भी, लेकिन माँ-बाप के डॉटने या रोक लगाने से आहत होकर मासूम बच्चे गले में फंदा डालने जैसे हौलनाक काम को अंजाम देने लगें तो यह किसी भी जागरुकऔर सामाजिक व्यक्ति की नींद उड़ा देने वाली घटनाऐं हैं! ये घटनाऐं यह सवाल उठा रही हैं कि जिस समाज में हम जी रहे हैं और जिस समाज का निर्माण हम कर रहे हैं, क्या वह यही समाज है?

यह कहा जा सकता है कि आत्महत्या की प्रवृत्ति पूरी दुनिया में लगातार बढ़ी है और न सिर्फ साधारण, बल्कि अपनी काबलियत, सफलता और समझ-बूझ की धाक जमा चुके लोगों द्वारा भी खुदकुशी की जा रही है। लेकिन इसके कारण और निवारण दूसरी तरह के हैं जबकि नन्हें-मुन्नों में पनप रही इस प्रवृत्ति के सर्वथा दूसरी तरह के और ज्यादा चिन्तनीय भी। आत्महत्याओं पर हुए मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय अध्ययन बताते हैं कि जिन्दगी जीने के सारे रास्तों के बंद हो जाने का विश्वास ही किसी व्यक्ति को खुदकुशी के मुकाम तक ले जाता है। लेकिन इस तरह का विश्वास किसी छह साल, आठ साल के बच्चे में आने लगे, जिसे अभी यही नहीं पता कि जिन्दगी क्या है और जिन्दगी जीने के तरीके और रास्ते क्या होते हैं तो किसी भी देश-समाज के लिए इससे ज्यादा चिंतनीय बात और क्या हो सकती है?

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय की फेलो, पत्रकार और समाजशास्त्री सुश्री शीबा फ़हमी कहती हैं कि इस उम्र के बच्चों में 'सेल्फ रेस्पेक्ट' यानी आत्म-आदर की प्रवृत्ति बहुत ज्यादा होती है। होता यह है कि कई बार माँ-बाप अपने बच्चों को सबके सामने विशेषकर उनके दोस्तों के सामने बुरी तरह झिड़क, डॉट या मार देते हैं, इससे बच्चा आहत हो जाता है और बाद में उसके ऐसे ही दोस्त उसको चिढ़ाने या मजाक बनाने लगते हैं तो खिसियाहट के फलस्वरुप बच्चे में आत्मघाती सोच बनने लगती है और आगे की कोई ऐसी ही झिड़क या डाँट बच्चे को जीने-मरने के मुकाम पर ला खड़ा कर देती है। शीबा कहती हैं कि हममें यानी समाज में एक बच्चे की 'इन्डिविजुअल्टी'(वैयक्तिता) स्वीकारने की आदत ही नहीं है। हम यह मानते ही नहीं कि बच्चे का भी कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व है। हम अपने बड़े होने, माँ-बाप होने के घमंड में ही चूर रहते हैं। जब तक औलाद मुंह बंद कर देने लायक कमाई न करने लगे, हम उसकी हैसियत ही नहीं समझते।

संयुक्त परिवारों के विघटन ने इस बीमारी को और घातक कर दिया। सुश्री शीबा कहती हैं कि आज हममें निजता बहुत ज्यादा आ गई है। पहले बच्चे एक तरह से कम्युनिटी में पलते थे और सब एक-दूसरे के बारे में जानते रहते थे। आज जब परिवार का तात्पर्य सिर्फ माँ-बाप और बच्चों से ही रह गया है तो ऐसे में बच्चों में भी एकांतता और निजता घर करती जा रही है। उनमें असुरक्षा की घातक भावना पैदा हो रही है। ऐसे माहौल में पलने वाले बच्चे बहुत जल्द ही मायूस हो जाते हैं।

अभी ज्यादा अरसा नहीं हुआ जब यह कहा जाता था कि संयुक्त परिवार या यों कहें कि परिवार में दादी-दादा का होना बहुत ही आवश्यक होता है, खासकर बच्चों के संदर्भ में, लेकिन समाजशास्त्री शीबा कहती हैं कि यह कुछ हद तक ही सही और उपयोगी है। वे कहती हैं कि दादी-दादा से सुकुन और छाया मिलने वाली स्थितियों में इसलिए बदलाव आ गया है कि अब खुद दादी-दादा ही पहले जैसे नहीं रह गये हैं, क्योंकि आज की युवा कुंठित और भटकी कही जाने वाली पीढ़ी ही तो आगे चलकर दादी-दादा की भूमिका में आ रही है! शीबा कहती हैं - इसका दूसरा पहलू यह है कि यही दादी-दादा तो घर में सास-ससुर की भूमिका में भी रहते हैं और बच्चे की माँ का तमाम प्रकार से जानलेवा उत्पीड़न करते रहते हैं! घर का मासूम बच्चा विस्फारित नेत्रों से यह सब कुछ भी तो देखता रहता है। उसके लिये ये दादी-दादा कितना आश्वासनकारी हो सकते हैं? इस चिन्ता का एक दूसरा कारक स्कूल और वहाँ दी जाने वाली शिक्षा का मौजूदा तौर-तरीका भी है। घर से भी ज्यादा तनावपूर्ण माहौल आजकल बच्चों को स्कूल में मिलता है। प्राय: ऐसा होता है कि घर से राजी-खुशी स्कूल गया हुआ बच्चा रोनी सूरत बनाये हुये घर लौटता है। कई बार तो वह ऐसा गुमसुम होता है कि अपने में ही मशगूल रहने वाले मॉ-बाप उसे साधारण तौर से बीमार मानकर उसका इलाज कराने लगते हैं, जबकि उसकी बीमारी की जड़ और दवा वास्तव में वे खुद ही होते हैं! लेकिन बीमारी में सबसे आसान काम तो डाक्टर के पास जाना होता है, बाकी सारे काम कठिन ही होते हैं! इधर के दो दशक में हमारे समाज की संरचना और उसकी जरुरत जिस तरह और जिस तेजी से बदली है, ऐसा पहले कभी नहीं था। समाज में आ रहे आमूल-चूल बदलाव के लिहाज़ से जीवन के जो क्षेत्र अपने को साध नहीं पा रहे हैं, मातृत्व-पितृत्व भी उन्हीं में से एक है। सुश्री शीबा कहती हैं कि खाना, कपड़ा, छत और स्कूल मुहैया करा देना ही माँ-बाप के मायने नहीं हैं। यह काम तो यतीमखाने भी कमो-बेश करते ही हैं। असल चीज है यह जानना कि बच्चों का लालन-पालन कैसे किया जाय। इसके लिए जरुरी है कि युवा जब शादी करने की स्टेज में हों तो उन्हें 'पैरेन्टिंग' यानी मातृत्व-पितृत्व के बारे में जानकारियॉ दी जॉय। यह चाहे पढ़ाई के दौरान हो या विशेष अभियानों द्वारा। वे कहती हैं कि समाज में जो तबका गरीब है वहाँ इस तरह की वारदातें न के बराबर हैं, क्योंकि एक तो वहाँ धुल-मिलकर रहने की परिस्थितियाँ ज्यादा हैं और निजता नाम की चीज़ प्राय: होती ही नहीं, दूसरे ऐसे समाज के बच्चों में 'सेल्फ रेस्पेक्ट' और 'सेल्फ इस्टीम' यानी आत्म सम्मान और आत्म मुग्धाता जैसी किसी भावना की कोई गुंजाइश शुरु से ही नहीं होती। इसलिए वहॉ आत्महत्या की हद तक जाने जैसी हताशा और निराशा भी कभी नहीं होती।

ओशो ने कभी कहा था कि आज के समाज में बच्चा पैदा होना एक दुर्घटना सरीखा है। वास्तव में आज की तैयार हो रही नयी पीढ़ी के मिजाज में बच्चे सर्वाधिक 'एब्यूज्ड' हैं। कारण जो भी हों लेकिन सुखद यह है कि ग्रामीण भारत में अभी यह बीमारी नहीं पहुची है। संयुक्त परिवार भी जो कुछ बचे हैं, गॉवों में ही हैं। शहरों की पारिवारिक सेहत सुधारने के लिए गॉवों का अध्ययन किया जाना चाहिए। (Also published by feature agency humsamvet.org.in on 24 January 2011)

Thursday, January 20, 2011

...हम जैसे बहुत लोग डार से बिछड़े ही हैं --- सुनील अमर

अरसा पहले अमृता प्रीतम का उपन्यास पढ़ा था -- डार से बिछड़ी . डार यानी डेरा यानी घर ! इधर संयोगवश अपने गाँव में थोड़ा लम्बा वक़्त गुजारना पड़ा तो लगा कि मैं भी डार से बिछड़ा ही हूँ .
मेरी माँ श्रीमती सुशीला त्रिपाठी (84 ) कई गंभीर बीमारियों से ग्रस्त थीं और तमाम इलाज के बाद डाक्टरों ने कह दिया कि अब इन्हें घर ले जाकर इनकी सेवा करिए. इस तरह की ''सेवा'' का अर्थ लगभग सभी लोग समझते हैं, सो मैं भी समझ गया. इकलौता पुत्र और आज की भाषा में single होने के कारण लगभग तीन महीना मैं उनकी सेवा में ही दिन-रात लगा रहा.इसी बहाने गाँव को थोड़ा ताज़ा-ताज़ा जाना भी . माँ गाँव में ही रहती थी.बीते महीने उनका देहावसान हो गया.
वैश्वीकरण और संचार-विस्फोट के बावजूद गाँव अभी कमोबेश गाँव बने हुए हैं,रहन-सहन में जिस तरह अमीरी-गरीबी पहले दिखती थी, उसी तरह आज भी दिखती है. गाँव में जो लोग अमीर हो गए हैं, उन्होंने अपने सामाजिक सरोकार दूसरी तरह के कर लिए हैं लेकिन जो अमीर नहीं हैं उनका जीवन-यापन का तौर-तरीका अभी ज्यादा स्वाभाविक और प्राकृतिक है. एक-दूसरे के सुख-दुःख में उनकी सहभागिता अभी भी ज्यादा सहज है.और हम जैसे लोग तो घर-परिवार वहीं रहने के बावजूद NRV यानी '' non resident villager '' सरीखे हो गए हैं! एक-दो घटनाओं ने बहुत आहत किया --
१- शाम का समय था और मैं टहलते हुए खेतों की तरफ काफ़ी दूर चला गया था. ठंढक की वजह से कपड़ों से लदा-फदा मैं मोबाइल पर दिल्ली अपनी एक दोस्त से बातें करने में मशगूल था.कुछ देर बाद लगा कि जैसे कोई पुकार रहा है. धुंधलका सा हो चला था फिर भी देखा कि थोड़ी दूर पर एक बृद्ध महिला कांख में कुछ सामान दबाये आ रही थी और वही मेरी दिशा में मुखातिब थीं.दूरी और धुंधलका होने के कारण पहचान नहीं पा रही थीं, इसीलिए स्थानीय अवधी बोली में वे '' के होय? तनी सुना तौ? '' की हांक अधिकारपूर्वक लगा रही थीं. फोन बंद करके मैं उनके पास गया .''पायलागी'' किया और पूछा कि क्या है.
मुझे नजदीक से देखने और पहचानने के बाद उन वृद्धा के चेहरे का भाव ही बदल गया.जैसे कोई अपराध उनसे अनजाने में हो गया हो, बहुत कातर स्वर में उन्होंने कहा कि ,'' अरे बचवा तू ह्वा ! चीनेह्न नाय ( पहचाने नहीं ) बच्चा! ''
मैं ख़ुद ही झेंप गया और बोला कि '' का बात है माई बतावा तौ ?''
'' नाही बच्चा, कुछ नाय , तू जा टहरा ( घूमो-टहलो ), हम चिनेह्न नाय तुहैं बच्चा!''
मेरे कई बार पूछने पर भी उन्होंने काम नही बताया तो मैं खिसियाकर चला आया. मैं जानता था कि किसी काम से ही उन्होंने पुकारा था.
लगभग उसी वक़्त गाँव के ही मुझसे उम्र में काफ़ी बड़े एक सज्जन वहां से गुजरे तो उन वृद्धा ने उन्हें जोर से पुकार कर अपनी कांख में से गिर रहे सामान को पकड़ाकर कहा कि इसे उनके घर तक पहुंचा दें .
वे दोनों चले गए और मैं बड़ी देर तक वहीँ खिसियाया सा बैठा रहा.जो अधिकार, जो लगाव और जिस विश्वास से वृद्धा ने उनसे अपने काम के लिए कहा, मुझसे नही कहा, जबकि मैं भी उसी गाँव का रहने वाला और उन वृद्धा का घर-परिवार से उतना ही नजदीकी हूँ जितना कि वे सज्जन, लेकिन समीकरण रिश्ता बना सकते हैं, लगाव नहीं ! मै बाहरी आदमी हो चुका हूँ अब!
२ -- इधर मौसम बहुत ख़राब था. दिन भर कुहरा और बदली! मौसम का मिजाज़ बेहद ठंढा! टहलने निकला था तो देखा कि गाँव के बाहर लड़के वालीबाल खेल रहे थे! देखते ही गरमी का एहसास हुआ! 25 साल पहले के दिन याद आ गए जब हम भी खेला करते थे! मन में खेलने की तीब्र इच्छा जग रही थी लेकिन कहने में संकोच हो रहा था तभी एक लड़के ने कह ही दिया कि आइये चाचाजी आप भी खेलिए. खेलने का अभ्यास तो न जाने कब का छूट चुका था ही बस शौक बुझाने लगा. बार-बार गलतियाँ हो रही थीं . लड़कों के खेल में भी बाधा पड़ रही थी लेकिन वे मुझे झेल रहे थे! उनमें से एकाध लड़के आँखों ही आँखों में मेरी तरफ कटाक्ष भी कर रहे थे फिर भी मुझे मेहमान समझकर वे तमाम लड़के खेलाते रहे. आपस की ज़रा सी गलती पर वे लोग खूब चाँव-चाँव करते लेकिन मुझसे एक सम्मानजनक दूरी वे सब बनाये रखे.यह सम्मान जब थोड़ी देर बाद असह्य होने लगा तो मैं ख़ुद ही वहाँ से खिसक आया !
कभी-कभी सम्मान भी कितना खलने लगता है, यह बड़ी शिद्दत से महसूस किया मैंने!
अपना ही गाँव और अपना ही घर फिर भी यह बेगानापन !
घर लौट कर माँ के पास बैठे-बैठे मै सोचता रहा कि अब मेरे लिए अपनापन किस जगह बचा हुआ है? लखनऊ में जहाँ कि मैं रहता हूँ या दिल्ली,मुंबई,अहमदाबाद , उत्तराखंड और ऐसी वे तमाम जगहें जहाँ मैं आता-जाता रहता हूँ ? कहीं तो नहीं! जैसे आपस में घुल-मिलकर गाँव वाले रह रहे हैं, क्या दुनिया के किसी कोने में वो आत्मीयता मेरे लिए मौजूद है ? शायद नहीं ! और शायद क्या बिल्कुल नहीं.
न गाँव के रहे और न बाहर के ! न घर के और न घाट के !!
यह भी सोचा कि अगर मैं यहीं गाँव आकर रहने लगूँ तो क्या कुछ समय बाद मैं भी उन सबमें घुल-मिल जाऊंगा? उनका लगाव हासिल कर लूँगा?
काफ़ी देर बाद मेरे मन ने कहा नहीं, बहुत मुश्किल है अब. एक लेखक-पत्रकार होने की जो खोल इतने वर्षों से मैंने ओढ़ रखी है,शहर में रहने की एक आदत, जो मुझमें बन गयी है, उसे उतार फेंकना और इन सब में समाहित हो जाना इतना आसान नही!
नगरीय-संस्कृति का भी तो नही हो पाया मैं ठीक से!
तो कहाँ से जुड़ा हूँ मैं ?
और कहाँ का होकर रह गया हूँ ?
शायद कहीं का नहीं !
जैसे-जैसे उम्र बढ़ेगी, यह एहसास शायद और कचोटने लगेगा मुझे.

Tuesday, January 18, 2011

“जेंडर जेहाद” के हक़ में ''--''शीबा असलम फहमी”

हफ्ते की मुलाकात में इस बार हमारे बीच हैं स्त्री अधिकारों के मामलों में बिलकुल अलग ढंग की सोच रखने वाली शीबा |शीबा असलम फहमी के लिए धर्म की अपनी परिभाषाएं हैं ,शीबा असलम फहमी को हम देश की उन चंद महिलाओं में गिन सकते हैं जो न सिर्फ मुस्लिम बल्कि हर तबके की महिलाओं के लिए अपनी कलम और अपनी जबान से संघर्ष कर रही हैं न सिर्फ संघर्ष कर रही हैं बल्कि स्त्री विरोधी ताकतों को पराजित भी कर रही हैं |आइये बात करते हैं शीबा से |इस पूरी बातचीत को आप आडियो फार्मेट में हमारी वेबसाईट में “हफ्ते की मुलाकात” कालम में सुन भी सकते हैं--आवेश तिवारी


आवेश तिवारी -शीबा आप क्या मानती हैं तीसरी दुनिया के देशों में ” जेंडर जेहाद “कितना सफल रहा है |और इनके सफल या असफल होने की वजह क्या है ?
शीबा असलम फहमी – तीसरी दुनिया के देशों में जेंडर जेहाद यानि नारीवादी आन्दोलन बहुत अच्छा चल रहा है ,जब हम तीसरी दुनिया के देशों की बात करते हैं तो ये वो देश हैं जो निजी विषमताओं से अनवरत गुजर रहे हैं ,जब हम स्त्री विमर्श की बात करते हैं तो ये अमेरिका की पश्चिमी देशों की गोरी महिलाओं का स्त्री विमर्श नहीं होता ,ये हमारा, हमारी मिटटी से उपजा स्त्री विमर्श है ,हमारे हालात के हिस्साब से जो स्त्रियों की मूलभूत समस्याएं हो सकती हैं हल हो सकते हैं उनमे से हल ढूंढ़ता हुआ स्त्री विमर्श है ,और निश्चित तौर पर ये सफल हो रही है अगर कोई दीवार २०१ हथौड़ों में टूटती है तो पहले के २०० हथौड़ों के वार को नाकाम नहीं कहा जा सकता |,उन २०० हथौड़ों की मार की वजह से २०१ वा हथौड़ा कामयाब हुआ है |कोई भी समस्या हो इस धरती पर हम सबका योगदान समस्या और समाधान के बीच की दूरी के गप को थोडा कम करने का हो सकता है ,हमारे पास या किसी के पास इन समस्याओं का पूरा हल नहीं होता


आवेश तिवारी -आपको क्या लगता है इस्लाम मुल्लाओं और हिंदुत्व पंडितों के चंगुल से कब तक मुक्त हो पायेगा ,क्या इस स्थिति से आप कभी निराश होती हैं
शीबा असलम फहमी - मै फिर कहूँगी मै बिलकुल निराश नहीं होती.पिछले जमानों में जब हम सोच नहीं सकते थे हमारे पास भाषा नहीं थी अधिकारों की ,मगर आज समय बदल रहा है ,मुझे आपके शब्द पर आपत्ति है जो आपने पंडितवाद कहा ,मुझे ब्राम्हणवाद ज्यादा उपयुक्त शब्द लगता है कई पंडित ऐसे हैं जो खुद ब्राम्हणवाद से पीड़ित हैं ,बहुत से पंडित हैं जो खुद ब्राम्हणवाद के खिलाफ हैं ,इत्फकान हम जिस किसी परिवार में पैदा हुए उसकी वजह से हम उसे कुछ नहीं कह सकते ,यही बात मौलानाओं के सम्बंध में भी मै कहना चाहूंगी कि ये पहचान करनी चाहिए की प्रगतिशील मौलाना कौन हैं ? और वो इसी समाज में हैं ,और बहुत सारे हैं ,अभी जनवरी की बात है अब तक कहा जाता था कि मुसलमान लड़कियां गैर – मुस्लिम लड़कों से शादी नहीं कर सकती ,लेकिन जर्मनी के एक मौलाना ने फतवा दिया की नहीं मुस्लिम लड़कियां अगर किसी ऐसे लड़के से मोहब्बत करती हैं जो इस्लाम से बाहर का है तो वो उससे शादी कर सकती हैं |अगर आप देखें तो ये आज के समय में क्रांतिकारी बात है |मुझे लगता है खासकर औरतें ,समाज का गैर ब्राम्हणवादी तबका जिनमे ब्राह्मण भी हों और मौलाना मिल बैठे तो कई समस्याओं का समाधान संभव है |मुझे लगता है कि इन समस्याओं और इन सस्याओं के हल के जर्नलाइजेशन से परहेज करना चाहिए

आवेश तिवारी -आज देश में मुस्लिम महिलाओं में साक्षरता का प्रतिशत बेहद कम है ,आपको क्या लगता है ऐसा क्यूँ है इसके पीछे कौन सी वजहें हैं
शीबा असलम फहमी -देखिये देश में जो मुस्लिम महिलाओं में साक्षरता का प्रतिशत था वो पहले से बेहतर है ,जब उनको कम्पेयर करते हैं तो हाँ कम हैं ,लेकिन जब हम इनकी पहले कि अपेक्षा बेहतरी को देख रहे हैं तो हमें उन कारणों को चिन्हित करके जिनकी वजह से वो बेहतर हुआ है ,उन पर और काम करना चाहिए ,दूसरी बात ये है कि तमाम पुरुष सत्तात्मक समाज में जहाँ पर अधिकतर सत्ता ख़ास तौर से धार्मिक सत्ता मर्दों के हाँथ में होती है ,औरतों की उपयोगिता इतनी संकुचित कर दी जाती है कि आज भी हमारे मौलाना कह देते हैं कि औरतों को पार्लियामेंट में न जाकर ,पार्लियामेंट में जाने लायक लड़के पैदा करने चाहिए,ये तो प्लूटोनिक तर्क है| प्लूटो ने एक जमाने में कहा था कि औरतों को चाहिए की बलशाली और समाज उपयोगी मर्द पैदा करें |,ये इस्लाम पूर्व की एक धारणा है ,आज मौलाना इसी तरह सोचते हैं ,बात करते हैं, और मीडिया उनको कवर कर रहा है |लेकिन हाँ ,हम बहुत मजबूती के साथ उनका जवाब दे रहे हैं ,उनको मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं, उनको चैलेन्ज कर रहे हैं और उनकी खिल्ली उडा रहे हैं ,ये सच है आज हम जिस स्थिति में हैं उससे बहुत अधिक आशान्वित हैं |

आवेश तिवारी -शीबा अगर हम हिंदुस्तान की बात करें तो आपको क्या लगता है महिलाओं में जो विचारधारा से जुडी गुलामी है वो कब तक ख़त्म हो पायेगी ,इसके लिए किस किस्म के संघर्ष किये जाने की जरुरत है |
शीबा असलम फहमी – मैंने अभी हाल में लिखा है ,समाज जिन हथियारों से लैस करके बेटों को, लड़कों को दुनिया का सामना करने के लिए उतारता है जब उन हथियारों से बेटियों को भी लैस करने लगेंगे तो वो भी उसी मजबूती से दुनिया का सामना करेंगी |जब कोई पुरुष अपने घर ,बाहर या समाज में किसी भी स्तर पर किसी उलझन में फंस जाता है तो वो जिस साहस के साथ और जिस आत्मविश्वास के साथ उन परिस्थितियों का सामना करता है उस साहस और आत्मविश्वास के पीछे जो कारण काम करते हैं अगर औरत के लिए भी उन वजहों से जुडी ताकत होगी तो वो कभी भी अपने आत्मसम्मान के साथ समझौता नहीं करेंगी ,चाहे वो पति के साथ हो ,ससुराल में हो ,सास के साथ हो,काम करने की जगह हो या समाज में कहीं पर भी हो |आप देखिये कि आप लड़कियों को हाथ- पैर तोड़कर लंगड़ा और लूला बनाकर समाज में झोंक देते है कि जाओ समाज का सामना करो ,चाहे उन्हें आप ससुराल भेजते हों या काम करने की जगह पर भेजते हों |आप उसे शिक्षा तो दे देते हैं क्यूंकि सरकारी तौर पर शिक्षा मिल रही हैं आप उसे संपत्ति में हिस्सा क्यूँ नहीं देते ,उसे मजबूत बनाइये उसके पास इतने साधन हों कि कल को अगर उन्हें अपने पति से अलग होना पड़े उन्हें अपना काम छोड़ना पड़े तो कम से कम उनके पास पेट भरने को तो हो ,जब ऐसा हुआ तो वो मजबूती से समाज में उतरेंगे और वो भी मजबूती से अपने से फैसले करेंगी |

आवेश तिवारी -शीबा आज हम अल्पसंख्यक महिलाओं की बात करते हैं शहरों कस्बों की महिलाओं की बात करते हैं उनके सरोकारों उनकी समस्याओं की बात करते हैं ,लेकिन गाँवों में ,टोलों में रहने वाली महिलाएं हैं ,आदिवासी महिलायें हैं उनकी चर्चा बहुत कम होती है आपको क्या लगता है इसकी वजहें क्या हैं ?

शीबा असलम फहमी -देखिये ,नारीवादी आन्दोलन देश की ग्रामीण आबादी में लीडरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम का सफलतापूर्वक क्रियान्वयन कर रहा है| दूर दराज के क्षेत्रों में जाकर वहां की औरतों को उनके अधिकारों को बता रहा है कि जिन विषमताओं से आप गुजर रही हैं वो विषमतायें आपकी किस्मत नहीं हैं,संसाधनों का आप तक नहीं पहुंचना भगवान की परीक्षा नहीं है इसकी वजह सरकार और दुनिया भर के कार्पोरेट्स हैं, इसमें सिर्फ समाज ही शामिल नहीं है |आज राजस्थान में जो पानी की समस्या है वो औरतों से सीधी जुडी समस्या है ,जिसमे कार्पोरेट्स भी शामिल है ,जिस तरह से जंगल ख़त्म हो रहे हैं उनका सीधा असर गाँव की महिलाओं पर पड़ रहा है उनकी रसोई से है |जरुरत इस बात की है कि इन आदिवासी महिलाओं ,गाँव की महिलाओं में नेतृत्व क्षमता विकसित की जाए ,उनका नेता दिल्ली से क्यूँ आएगा, सिविल सोसायटीज को इसके लिए आगे आना होगा |

आवेश तिवारी – शीबा आपको लगता है कि नहीं मीडिया भी महिलाओं को लेकर दोहरे मापदंड अपना रहा है ,नोयडा में किसी देर रात की पार्टी से घर लौट रही महिला के साथ होने वाली छेड़खानी शुर्खियाँ बन जाती हैं लेकिन दूर –दराज के गाँवों कस्बों में रोज बरोज होने वाली महिला उत्पीडन से जुडी गंभीर ख़बरें अन्दर के पेजों पर भी जगह नहीं पाती |आपको क्या लगता है इसकी वजहें क्या हैं और ऐसा है की नहीं ?

शीबा असलम फहमी – मै इसको सिर्फ महिलाओं से जोड़कर नहीं देखती मैं इसको मीडिया के काम करने के तरीके से जोड़ कर देखती हूँ ,मईसको मीडिया की काहिली से भी जोड़कर देखती हूँ ,दिल्ली क्यूँ छाया रहता है ख़बरों में ?दिल्ली इस लिए छाया रहता है क्यूंकि आपको भाग दौड़ नही करनी पड़ती ,आठ दस किलोमीटर जाकर ख़बरें और सुर्खियाँ ले आई जाती हैं ,अब आप देखिये दिल्ली की सर्दी को ही कितना ग्लेमराइस्द किया जाता है जबकि बांदा ,कानपुर ,लखनऊ में पड़ने वाली ठण्ड दिल्ली से कहीं बहुत ज्यादा होती है मीडिया सुविधाभोगी है ,कभी वो संसाधनों का रोना रोता है तो कभी किसी अट्टालिका पर खड़ा होकर तेज हवा को दिखलाता हुआ सर्दी का आतंक बयां करता है जबकि असल शरद जहाँ होती है वहां मौतें भी होती है पर अफ़सोस ख़बरें नहीं होती ,आप किसी उत्पीडित महिला को उनके स्टूडियो पंहुचा दीजिये ,फिर देखिये क्या खबर पैदा होती है .. Read this interview on www.network6.in (Also in Audio)

Sunday, January 09, 2011

अगली बार जब स्त्री-विमर्श सूझे ! -- शीबा असलम फ़हमी (पत्रकार, स्तंभकार, व समाजशास्त्री )

याद कीजिये, क्या अपने कभी आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति को किसी बड़े आन्दोलन या सामाजिक बदलाव का नेतृत्व करते देखा है? राजा राम मोहन राय,बाल गंगाधर तिलक, सर सैयद अहमद खान, भीमराव अम्बेडकर,छत्रपति शाहूजी महाराज,ज्योतिबा फुले, मोहनदास करमचंद गाँधी, कांशीराम या महिलाओं में रज़िया सुल्तान,लक्ष्मीबाई, चाँद बीबी, सावित्रीबाई फुले,पंडिता रामाबाई,रकमाबाई, बेगम भोपाल, ज़ीनत महल - कौन थे ये लोग ? ग़रीब-गुरबा? नहीं!
सीधी सी बात है, समाज से भिड़ने के लिए और उसके दबाव को झेलने के लिए जो आर्थिक मज़बूती चाहिए, अगर वह नहीं है तो आपकी सारी 'क्रांति' जिंदा रहने की जुगत के हवाले हो जाती है.खुद को संभाल न पाने वाला इन्सान कैसे किसी आर्थिक-सामाजिक विरोध और असहयोग को झेलकर समाज से टकराएगा ? एक निराश्रित, भूखे, कमजोर से यह उम्मीद कि वह क्रांति की अलख जगाकर परिस्थितियां बदल दे, निहायत मासूमाना मुतालबा है. लेकिन इस मामले को अगर आप स्त्री-विमर्श के हवाले से समझें तो परत-दर-परत एक गहरी होशियारी और आत्मलोभ का कच्चा चिठ्ठा खुलने लगता है.
कौन नहीं जनता कि संपत्ति में बंटवारे को लेकर समाज कितना पुरुषवादी है. बेटियों को हिस्सा देने के नाम पर क़ानूनी बारीकियों के जरिये ख़ुद को फायदे में रखने की ख़ातिर कितने वकीलों-जजों को रोजगार मुहैया कराया जा रहा है और बेटी का 'हिस्सा' तिल-तिल कर दबाया जा रहा है.
इसके बरक्स अगर आप पुरुषों के विमर्श और साहित्य की दुनिया पर नज़र डालें तो शायद ही कोई हो जो यह न मानता हो कि महिलाओं को सशक्तिकरण की ज़रूरत है. जो महिलावादी विमर्श-लेखन में नहीं हैं वे भी और जो बाज़ाब्ता झंडा उठाये हैं वे तो ख़ैर मानते ही हैं कि समाज में औरतों की हालत पतली है.
आजकल तो पुरुषों द्वारा कविता-कहानी के ज़रिये भी स्त्रियों की दयनीयता को महसूसने की कवायद शुरू हो चुकी है.ऐसे में ज़रूरी हो जाता है कि इनसे कहा जाय कि ज़रा आत्मावलोकन करें.अब इस लेखन और स्त्री आन्दोलन में पुरुष सहयोग की भागीदारी उस स्तर पर है कि जिम्मेदारी भी डाली जाय. पिछले तीन-चार सालों से जब से महिला विषयक लेखन से जुड़ी हूँ, तब से ही कुछ ख़ास तरह के साहित्य और विमर्श से दो-चार हूँ. अक्सर तो लेखक-प्रकाशक टिप्पड़ी-समीक्षा के लिए किताबें भेज देते हैं. कुछ इन्टरनेट लिंक और साफ्ट कापी आदि भी आती रही है,जिनमें अक्सर कविताएँ मिलीं जो स्त्री और स्त्री-चरित्रों का आह्वान करती हैं. पिछले लगभग एक साल से ऐसे निजी और सामुदायिक ब्लॉगों की भी भरमार हैजिनमें स्त्री-केन्द्रित कविता-कहानी-विमर्श छाया हुआ है. कुछ कविताएँ अपपनी माँ, नानी, दादी वगैरह को मुखातिब हैं उनकी ज़िन्दगी के उन पहलुओं और हादसों को याद करती हैं जब उन्हें सिर्फ़ बेटी, बहू, माँ, बहन समझा गया, लेकिन इन्सान नहीं. जो ख़ानदान में तयशुदा किरदारों में ढल गयीं और भूल गयीं कि वे अपने आप में एक इन्सान भी हैं. जिनके होने से परिवार-खानदान की कई जिंदगियां तो संवर गईं लेकिन खुद उनका वज़ूद मिट गया. कुछ और इसी तरह के स्त्री-विमर्श पर नज़र डालूं तो,पुरुष-लेखकों का एक और वर्ग है जो अनुभूति के स्तर पर 'स्त्री-मन' में प्रवेश कर, वहाँ उतर जाता है जहाँ से वे खुद औरत बनकर दुनिया देख रहे हैं. उनके भीतर की स्त्री के नजरियों को लेखनी में उतरना और फिर उन बारीकियों को आत्मसात करना.
एक और मिज़ाज है स्त्री-केन्द्रित लेखनी का,जो विमर्श-विश्लेषण द्वारा महिलाओं को बराबरी-इंसाफ़ और हक़ हासिल करने के लिए हांक लगाता है. वहाँ आह्वान के साथ-साथ धिक्कार भी है जो औरत के संकोच, बुज़दिली,धर्मभीरुता,संस्कारी और शुशील बर्ताव को छोड़, आग-ज्वाला बनने का आह्वान करता है, और इसके अभाव को स्त्री की 'गुलामी की मनोदशा' का प्रतीक मानता है.
साहित्य बिरादरी में तो स्त्री-देह को लेकर जो कुछ चल रहा है उस पर सिर्फ़ यही कह कर बात ख़त्म करुँगी कि दैहिक मुक्ति मात्र से सारी दुनिया में स्त्रीवादी क्रांति का सपना देखना अजीब लगता है. और बात जब वेशभूषा, पर्दा-प्रथा या संस्कृति पर आकर टिक जाती है तो और भी सतही हो जाती है. पुरुषों द्वारा इस तरह के स्त्री-विमर्श में भाषणबाजी के तौर पर वह सब कुछ है जो कि हम किसी प्रतिक्रियावादी विमर्श में देखते हैं.और जिसे अंग्रेजी में 'लिप-सर्विस' कहा जाता है, बस.
लेकिन इस हमदर्दी-भरे लेखन-विमर्श और विश्लेषण में ईमानदारी की बेहद कमी है जो किसी से ढंकी-छुपी नहीं है.और जिन पर पुरुष-समाज की मौन स्वीकृति जारी है और जो महिला-सबलीकरण में सबसे बड़ी बाधा है.
महिलाओं की दुर्दशा पर द्रवित साहित्य रचने वालों से लेकर,ठोस, विचारोत्तेजक और रेडिकल विमर्श करने वालों से भी यह पूछा जाना ज़रूरी हो गया है कि वह साहित्य कब रचा जायेगा जिसमें पति,पिता,भाई,पुत्र,पौत्र के असली किरदार उतरेंगें कि कैसे उनके पिता उनकी माँ के साथ खुलकर वह सब करते रहे जिससे वे दया की निरीह पात्र बनती गईं? कैसे उनके दादा-नाना-ताया का रौब-दाब कायम होता रहा? कैसे वे खुद पति के रूप में अपने पूर्वजों का अगला संस्करण बने हुए हैं? आज समाज में जिन स्रोतों से ताकत, सम्मान, आत्मविश्वास हासिल किया जाता है,स्त्री को भी ज़रूरत उन्हीं की है न की दैहिक चिंतन के चक्रव्यूह में फंसकर असली मुद्दों से भटकने की.
जो पुरुष-समाज स्त्री-मुक्ति-विमर्श में शामिल है, उनसे दो टूक सवाल है कि पिता-भाई के रूप में क्या आपने अपनी बेटी और बहन को परिवार की जायदाद में हिस्सा दिया या कन्नी काट गए? अगर पिता-भाई के रूप में पुरुष ईमानदार और न्यायप्रिय नहीं है तो उनकी बेटियां-बहनें अबलायें ही बनी रहेंगीं. पति-ससुराल और समाज में हैसियत-हीन बनने की प्रक्रिया मायके से ही शुरू होती है जब--
(1) विवेकशील होने के लिए शिक्षा नहीं मिलती.
(2) आत्मविश्वासी होने के लिए आज़ादी नहीं मिलती.
(3) आत्मनिर्भर होने के लिए परिवार-पिता की जायदाद में हक़ बराबर हिस्सा नहीं मिलता.
ये तीनों धन बेटियों को पीहर में मिलने चाहिए. अगर औरत इनसे लैस है तो ससुराल-पति क्या पूरे समाज के आगे ससम्मान ज़िन्दगी तय है लेकिन अगर पिता ही ने उसे इनके अभाव में अपाहिज बना दिया है तो क्या मायका, क्या ससुराल और क्या बाहर की दुनिया- सभी जगह उसे समझौते ही करने हैं और आत्मसम्मान, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता पर कितने ही प्रवचन उसका कोई भला नहीं कर सकते.
साहित्य-जगत में स्त्री-सबलीकरण पर आप अगली बार जब भी सोचें, कृपया यहीं से सोचें कि खुद आपने अपनी बेटी-बहन-पत्नी को परिवार की संपत्ति में 'हक़ बराबर' हिस्सा दिया क्या? क्योंकि मध्यवर्ग में स्त्री-शिक्षा पर चेतना तो कमोबेश आ गयी है, दूसरी तरफ सरकारी नीतियों की वजह से भी लड़कियों की शिक्षा आगे बढ़ी है लेकिन मर्द की जहाँ अपनी ताक़त-हैसियत में निजी स्तर पर भागीदारी की बात आती है, वह सरासर मुजरिम की भूमिका में है. तब वह दहेज़,भात, नेग आदि कुरीतियों की आड़ में छुपकर मिमियाता है कि हम बहन-बेटी को ज़िन्दगी भर देते ही हैं. बेटी को दहेज़-भात-नेग में टरकाने वाले यह सब खुद रख लें अपने लिए और जो अपने लिए जायदाद दबा रखी है वह बेटियों-बहनों को दे दें तो चलेगा? क्या वे इस अदला-बदली को तैयार होंगें?
एक और पलायनवादी तर्क यह आता है कि बेटी-बहन को तो ससुराल से भी मिलता है. यह सबसे कुटिल तर्क देते समय वे यह नहीं सोचते कि जब तुम खुद अपने खून, अपनी औलाद को नहीं दे रहे हो तो पराये लोग जो दहेज के बदले उसे ले गए, वह उसके नाम अपनी जायदाद लिखवायेंगें ? या ऐसे पिता-भाई खुद अपनी पत्नियों के नाम जायदाद का कितना हिस्सा चढ़वाते हैं कागज़ों पर?
जिस दिन बेटी के पास पलटकर वापस आने का संबल अपना 'घर' होगा जिस दिन डोली-अर्थी के चक्रव्यूह से वह मुक्त होगी, जिस दिन बुरे वक़्त में संबल बनने के लिए रिश्ते और संसाधन होंगे, उसी दिन से बहुएं-पत्नियाँ आत्मसम्मानी, आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर होंगी.
सवाल यह है कि अपने इस वाजिब हक़ को लेने के लिए प्रेरित करनेवाला न साहित्य है कहीं,न विमर्श, क्योंकि यह किसी सरकारी नीति में हिस्सेदारी का मामला नहीं है, न ही किसी दूसरे की बहन-बेटी को ' स्त्री-देह' की मानसिक जकड़न से मुक्त करवाकर स्वान्तः सुखाय भोग का मामला, इसमें तो खुद अपनी अंटी ढ़ीली करनी पड़ती है, और बैठे-बिठाये बाप की जायदाद से मिलने वाले सुख-संतोष-सुरक्षा से हाथ धोना पड़ता है.
लिहाज़ा इस पर सर्वत्र मौन सधा हुआ है और बहस इस पर जारी है की किस तरह स्त्रियाँ ख्वामख्वाह अपने शारीर के प्रति अत्यधिक सतर्क होकर गुलामी में जकड़ी हुई हैं, कैसे वे शुचितावादी धार्मिक-सांस्कृतिक परम्पराओं को धोकर जीवन-सुख से खुद को वंचित कर रही हैं. कैसे वे समाज की तयशुदा भूमिकाओं में फंसकर रह गयी हैं और एक स्वछंद स्त्री होने के सुख से वंचित हैं.कुल मिलकर वह सारा स्त्री-विमर्श जारी है जिससे खुद मर्द किसी तरह के घाटे में नहीं हैं. वह परिवार की संपत्ति पर, सारे अधिकारों पर और सत्ता पर एकछत्र राजा बना बैठा है. उसकी सत्ता पर कहीं से आंच नहीं आ रही है. वह कमजोर,अधिकारहीन, विवेकहीन, आत्मविश्वासहीन, सम्पत्तिहीन महिलाओं (बेटी, बहन,पत्नी, माँ,रखैल) से घिरा हुआ, खुद को निर्विघ्न सत्ता में बनाये हुए है. और समाज में न्यायप्रिय, आधुनिक प्रगतिशील, स्त्रीवादी दिखने के लिए वह सभी फैशनेबल सिद्धांतों-वादों को अपनी वाणी में आत्मसात कर समय-सम्मत उवाच करता है.
ऐसी सूरत में सिमोन द बाउवार से लेकर प्रभा खेतान तक, और तसलीमा नसरीन से मैत्रेयी पुष्पा तक जो भी समर्थन स्त्री-विमर्श के नाम पर आप दे रहे हैं वह गल-थोथरी से ज्यादा क्या है? और आप ख़ुद जो द्रवित, सूक्ष्म, संवेदनशील साहित्य रच रहे हैं, वह समय को देखते हुए भाषा व शब्दकोष की होशियारी दिखाने से ज्यादा क्या है?
यक़ीन मानिये, इस वक़्त मुझे सामाजिक-साहित्यिक दुनिया के कई चेहरे याद आ रहे हैं जो निजी ज़िन्दगी में पैतृक संपत्ति पर ठाठ के चलते आज सामाजिक जीवन में भी स्त्री-दलित विमर्श पर क्रांतिकारी तजवीजें दे रहे हैं, वे तसलीमा नसरीन को सुरक्षा न दे पाने के लिए भारत सरकार को भी खरी-खरी सुनाते हैं और दलितों के उत्थान के बजाय पार्कों के निर्माण के लिए मायावती को भी आड़े हाथों लेते हैं. पर उनके निजी जीवन में झांकते ही पता चल जायेगा कि जनाब बहनों को केवल दहेज-भात-नेग में टरकाने में यक़ीन रखते हैं. ऐसे सामाजिक चिंतकों के जीवन में न्याय और बराबरी के आदर्शों की जाँच-पड़ताल का समय आ गया है.
महिला-सबलीकरण की मुहिम को संसद के साथ-साथ पीहर में स्थापित करने की ज़रूरत है. और निश्चित रूप से इसमें पुरुष ही कुछ कर सकते हैं. औरतें तो बस उनके ज़मीर को जगाने की कोशिश ही कर सकती हैं. इसलिए महिला-सशक्तिकरण पर अगली बार जब विमर्श करें तो यहीं से शुरू करें कि ख़ुद अपने परिवार-ख़ानदान में सबसे पहले जायदाद में भागीदारी के कागज़ तैयार करवाएं, फिर इस मुहिम को रिश्ते-नाते, पड़ोस-मुहल्ले तक पहुंचाएं.
जिस दिन बेटियां भी बेटों की तरह मजबूत ज़मीन पर खड़ी होंगी, दुनिया हिला देंगी. ( प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ' हँस' के जनवरी २०११ अंक से साभार )

Friday, January 07, 2011

कृषि क्षेत्र की उपेक्षा का नतीजा--सुनील अमर

कुछ ताजा खबरों से पता चलता है कि देश के भीतर सब कुछ कैसे गड्मड चल रहा है। कहा जाता है कि सरकार ने अनाज ज्यादा खरीद लिया और उसे रखने की जगह नहीं है, इसलिए वह सड़ रहा है और देश की सबसे बड़ी अदालत इस पर सरकार से कैफियत तलब करती है कि जब रखने की जगह नहीं है और तमाम देशवासी भूखों मर रहे हैं तो उसे गरीबों और जरूरतमंदों में क्यों नहीं बांट देते? सरकारी विभागों ने ही दो महीने पहले बता दिया था कि प्याज की पैदावार इस साल भारी बरसात के कारण 60 प्रतिशत कम हुई है, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री एक-दूसरे से पूछ और बता रहे हैं कि प्याज की कीमतें आसमान कैसे छूने लगी हैं!

यह भी गौर करने की बात है कि प्याज की कीमतें लगभग साल भर से बढ़ ही रही हैं। अब इधर जब बिचौलिये अपनी तिजोरी भरने में और उजड़े हुए किसान अपनी जान गंवाने में लगे हैं तो सरकार ने ब्रह्मास्त्र चलाते हुए महाराष्ट्र के प्याज-किसानों को 400 करोड़ रुपयों का एक राहत पैकेज देने की घोषणा कर दी है। दूसरी तरफ मंहगी दर पर प्याज खरीद कर उसे सस्ती दर पर जनता को उपलब्ध कराने का खेल भी दिल्ली में शुरू हुआ है। इन सबके साथ-साथ खबर है कि पाकिस्तान से प्याज का आयात हो रहा है और (रोक के बावजूद) देश से प्याज का निर्यात भी बदस्तूर जारी है!

देश की सत्ता को जब संप्रग ने अपनी पहली पारी के रूप में 2004 में संभाला था, तब यह बात बहुत जोर-शोर से प्रचारित की गई थी कि पहली बार ऐसा स्र्वणिम अवसर आया है जब दुनिया के चार वरिष्ठ अर्थशास्त्री भारत सरकार में मौजूद हैं-वे हैं- प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री प्रणव मुर्खजी, गृहमंत्री पी. चिदम्बरम तथा योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया। उस वक्त यह भी याद दिलाया गया था कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए देश में पहली बार नये आर्थिक सुधारो का एजेंडा लागू किया था। तब से अब तक दिल्ली की यमुना में बहुत पानी बह चुका है और देश की गरीब जनता का बहुत सा खून और पसीना भी। सरकार के अपने ही आंकड़ें बताते हैं कि देश की तीन चौथाई आबादी घोर बदहाली में जी रही है और एक दशक में दो लाख से अधिक अन्नदाता हताशा के कारण कीटनाशक पीकर अपनी जान दे चुके हैं। इतने किसानों की आत्महत्याओं के बावजूद हमारे दूरअंदेशी अर्थशास्त्री अहलूवालिया जी का निष्र्कष है कि देश में महंगाई इसलिए बढ़ रही है, क्योंकि गांवाें में अमीरी आ गई है!

सत्तारूढ़ कांग्रेस ने अपनी स्थापना के 125 र्वष पूरे होने का जश्न हाल ही में अपने 83वें अधिवेशन के रूप में मनाया। अधिवेशन में कृषि संबंधी जो प्रस्ताव पेश किया गया, उसमें बताया गया कि देश में 52 प्रतिशत लोगों को कृषि से रोजगार मिल रहा है, लेकिन इसके विपरीत पिछले महीने ही केन्द्र सरकार के श्रम मंत्रालय ने एक सव्रे रपट जारी की है जिसमें बताया गया है कि कृषि से रोजगार हासिल करने वालों की संख्या घटकर अब सिर्फ 45.5 प्रतिशत रह गयी है तथा बड़ी संख्या में लोग खेती छोड़ रहे हैं! उधर बीते 12 नवम्बर को दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में आयोजित जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन में विश्व नेताओं को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने घोषणा की थी कि देश की अर्थव्यवस्था काफी मजबूत है और शीघ्र ही यह नौ प्रतिशत की विकास दर को छूने वाली है। संयोग देखिए कि उसी के सिर्फ एक दिन पहले श्रम मंत्रालय ने एक सव्रे रपट जारी कर बताया कि राष्ट्रीय सैम्पल सव्रे ने 2007-08 में देश में बेरोजगारों की जो संख्या एक करोड़ बतायी थी, वह अब बढ़कर चार करोड़ से अधिक हो गयी है! इसका क्या मतलब माना जाए कि अपनी ही सरकार की रपट का पता कांग्रेस और उसके प्रधानमंत्री को नहीं है या वह सच्ची रिपोर्ट पेश नहीं करना चाहती ? सचाई यह है कि देश में जब भी इन्फ्रास्ट्रक्चर यानी आधारभूत ढांचे की बात की जाती है तो उसमें कृषि को कोई खास महत्व नहीं दिया जाता। जब कृषि पर निर्भरता 75 प्रतिशत थी तब भी और अब जबकि सरकार 52 प्रतिशत बता रही है तब भी। यही कारण है कि देश के इस सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र की हमेशा उपेक्षा की गई। कांग्रेस ने इस अधिवेशन में कृषि पर पेश प्रस्ताव में भले ही पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का यह र्चचित उद्धरण पेश किया कि ‘..और सभी क्षेत्र प्रतीक्षा कर सकते हैं लेकिन कृषि नहीं।’ लेकिन वास्तविकता यह है कि सिर्फ छंटी-छटाई सैद्धान्तिक बातों के अलावा कृषि की बेहतरी के लिए सरकार के पास न तो कोई विचार हैं और न कोई योजना। केन्द्रीय मंत्री सचिन पायलट ने जरूर कृषि क्षेत्र को लेकर अपनी चिंता और सुझावों से अधिवेशन को अवगत कराया लेकिन इस पर अमल कर पाना उनकी पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार के वश की बात नहीं लगती। श्री पायलट का सुझाव था कि उर्वरक अनुदान (सब्सिडी) के रूप में प्रतिर्वष जो एक लाख करोड़ से ऊपर की धनराशि उर्वरक निर्माताओं को दी जाती है वह सीधे किसानों को दी जाए। इस मुद्दे पर कुछ र्चचा की जा सकती है। दरअसल संप्रग प्रथम ने ही यह तय किया था कि उर्वरकों पर छूट की व्यवस्था में परिर्वतन की आवश्यकता है और छूट की धनराशि के कूपन तैयार कर किसानों को दे दिये जाएं ताकि किसान बाजार भाव पर उर्वरक खरीद कर तथा दुकानदार को छूट का कूपन देकर उसका लाभ प्राप्त कर लें। अभी कुछ माह पहले यह भी तय किया गया था कि छूट के कूपन बैंकों के माध्यम से किसानों को दिये जाएं, लेकिन यह व्यवस्था आज तक लागू नहीं हो पाई है क्योेंकि उर्वरक निर्माताओं की लॉबी बहुत प्रभावशाली है। वहां से लेकर सरकार तक इसमें प्रतिर्वष अरबों रुपयों का खेल होता है। यह जानना दिलचस्प होगा कि पूर्व केन्द्रीय उर्वरक और पेट्रोलियम मंत्री रामविलास पासवान के कार्यकाल में र्वष 2004-05 में जो उर्वरक अनुदान 15,779 करोड़ रुपये का था वह एक साल बाद 2006-07 में बढ़कर 40,338 करोड़ रुपये तथा 2008-09 में तो 1,19772 करोड़ रुपये का हो गया!

आखिर देश में उर्वरकों की खपत कितनी है जो मात्र यूरिया और डीएपी पर ही एक साल में सवा लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी दे दी गई? क्या देश के किसान इतनी खाद इस्तेमाल करने भर के लिए अमीर हो गये हैं? किसानों की बदहाली की दैनिक र्चचाओं के बीच उर्वरक निर्माताओं के इस दुष्प्रचार पर आंख मूंदकर कैसे यकीन कर लिया जाए कि किसान उर्वरको का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं। दरअसल अनुदान लेने के लिए र्फजी उत्पादन दिखाने का जो खेल होता है, वह किसी से छिपा नहीं है। श्री पायलट ने यह भी कहा कि कृषि ऋणों पर ब्याज अब भी बहुत ज्यादा है और इसे कम किया जाना चाहिए। ध्यान रहे कि राष्ट्रीय किसान आयोग के पूर्व अध्यक्ष और प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक डा. स्वामीनाथन ने चार र्वष पूर्व ही सरकार को सुझाव दिया था कि कृषि ऋण पर ब्याज चार प्रतिशत से भी कम रखा जाए लेकिन संप्रग सरकार आज तक इसे क्रियान्वित नहीं कर पाई। महाराष्ट्र के किसानों को बार-बार हजारों करोड़ रुपयों का राहत पैकेज केन्द्र सरकार दे रही है लेकिन क्या किसानों की हालत और आत्महत्याओं के आंकड़ों में कोई सुधार हो रहा है? फिर इस तरह के शोशे छोड़ कर सरकार किसे बहलाना चाह रही है?oo in Rashtriya Sahara on edit page 07-01-2011

Monday, January 03, 2011

बिनायक को सजा दिलाने के लिए भाजपा ने की पैरोकारी ---- शीतला सिंह

छत्तीसगढ़ में रायपुर की एक अदालत ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) के उपाध्यक्ष और सामाजिक कार्यकर्ता बिनायक सेन सहित नक्सल विचारक नारायण सान्याल और कोलकाता के कारोबारी पीयूष गुहा को भारतीय दंड विधान की धारा 124 ए (राजद्रोह) और 120 बी (षडयंत्र) के तहत उम्रकैद की सजा सुनायी है। श्री सेन को 14 मई 2007 को बिलासपुर में गिरफ्तार किया गया था। बिनायक सेन को देश में समाज सेवा के लिए कई सम्मान मिले हैं। कई अन्य देशों में भी विश्व स्वास्थ्य मिशन आदि के लिए उन्हें कई सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उनकी वैचारिक विरोधी रही भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें गंभीर सजा देने के लिए विशेष पैरोकारी की थी।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में राज्य और सरकार दोनों को एक ही नहीं माना जा सकता। राज्य तो स्थायी व्यवस्था है, लेकिन सरकारें देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप आती-जाती रहती हैं। व्यवस्था चलाने के लिए इन सरकारों का विधायी अंग कानून भी बनाता है और जिसके अनुरक्षण का दायित्व स्थायी तत्व के रूप में कार्यरत कार्यपालिका के पास होता है। न्यायपालिका को भी राज्य का अंग ही माना जाता है, क्योंकि उसकी सत्ता अलग से नहीं है।

भारतीय संविधान में नागरिकों को मूल अधिकार दिये गये हैं। उसी के अनुच्छेद 19 (1) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के क्रम में ही राजनीतिक संगठनों के बनाने और चलाने का भी अधिकार है। इस अधिकार में प्रतिबंध केवल उपक्रम के लिए ही लगाया जा सकता है। लोक व्यवस्था कानून व्यवस्था का पर्यायवाची नहीं माना जा सकता, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत 1951 में जो परिवर्तन किये गये थे, वे ही सरकारों को सार्वजनिक व्यवस्था के क्रम में कदम उठाने का भी अधिकार देते हैं, पर यह मूल अधिकारों को समाप्त करके नहीं। अंग्रेजों द्वारा बनायी गयी भारतीय दंड विधि की धारा 124 ए में राजद्रोह को यूं परिभाषित किया गया है- ‘जो कोई व्यक्ति लिखित या मौखिक शब्दों, चिन्हों या दृष्टिगत निरूपण या किसी भी तरह से नफरत या घृणा फैलाता है या फैलाने की कोशिश करता है या भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ विद्रोह भड़काता है या भड़काने की कोशिश करता है, उसे आजीवन कारावास या उससे कुछ कम समय की सजा दी जायेगी, जिसमें जुर्माना भी लगाया जा सकता है या जुर्माना किया जा सकता है।

इसके साथ ही तीन व्याख्याएं भी दी गयी हैं (1) विद्रोह की अभिव्यक्ति में शत्रुता की भावनाएं और अनिष्ठा शामिल है। (2) बिना नफरत फैलाए या नफरत फैलाने की कोशिश किये, अवज्ञा या विद्रोह भड़काए बिना सरकार के कार्यों की आलोचना करने वाले मत प्रकट करना जिसमें कानूनी रूप से उन्हें सुधारने की बात हो, तो यह इस धारा के अंतर्गत अपराध नहीं माना जायेगा। (3) बिना नफरत फैलाये या नफरत फैलाने की कोशिश किये, अवज्ञा या विद्रोह भड़काए बिना प्रशासन या सरकार के किसी अन्य विभाग की आलोचना करने वाले मत प्रकट करना इस धारा के अंतर्गत अपराध नहीं माना जायेगा। इसलिए लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण आंदोलन को राजद्रोह की परिभाषा में नहीं रखा जा सकता। यदि ऐसा करने का अधिकार न होगा तब तो लोकतंत्र जो एक दल या विचारक या कार्यक्रम वाले दल द्वारा चलाया जा रहा हो, उसे फिर कैसे हटाया जायेगा। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने अभिव्यक्ति के प्रतिबंध के संबंध में भी कुछ मानक बनाये हैं- यानी जहां दबाना आवश्यक है, कोई सामुदायिक हित खतरे में है, लेकिन यह खतरा अटकलों पर नहीं होगा बल्कि पब्लिक आर्डर के लिए आंतरिक रूप से खतरनाक होना जरूरी है। इसी प्रकार 124 ए के अंतर्गत विराग (डिसअफेक्शन) कहा जा सकता है। वह भी इससे सीधा सम्बद्ध है।

इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर इस संबंध में जो निर्णय दिये हैं उसे ‘विराग’ को स्नेह या बुरी भावना से अलग किया गया, व्यवस्था या अव्यवस्थाओं में अन्तर किया गया है। विद्रोह उकसाने के लिए किसी व्यक्ति को आरोपित करने हेतु अभिव्यक्ति और सरकार के बीच सीधा संबंध होना जरूरी है। गड़बड़ी की आशंका से विद्रोह को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए सरकार के प्रति अनास्था और उसे बदलने का प्रयत्न दोनों अलग-अलग तत्व हैं। अनास्था को अराजकतावाद कहा जा सकता है, जिसमें तर्क यह है कि सरकार व्यक्ति के मूल और स्वाभाविक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाती है और उसके लिए निरंकुशतापूर्ण हो जाती है। जब यह निरंकुशता प्रतीक बन जाये तब इससे कैसे लड़ा जाये? क्योंकि सारे संहारक अस्त्र तथा उनका संगठित प्रयास सरकार के हाथ में ही होते हैं। इस अराजकतावाद में भी व्यक्ति के सामान्य जीवन व स्थापना का सिद्धान्त अस्वीकार्य नहीं किया गया है।

जब सरकारें होंगी, तब उनके खिलाफ असंतोष भी होगा और वह विभिन्न स्वरूप ग्रहण करेगा। इसके लिए आंदोलन भी होंगे, लेकिन उन्हें कुचलने के लिए राज्य तभी कोई कदम उठा सकता है जब हिंसा को प्रोत्साहित करने के कोई कदम उठाये गये हों। यह केवल भावनाओं पर आधारित नहीं हो सकता। लोकतांत्रिक और निर्वाचित सरकारों के खिलाफ आंदोलन या अभिव्यक्ति को राजद्रोह का कारण मान लिया जायेगा तब तो यह सरकारों की निरंकुशता ही सुदृढ़ करेगा। उनकी असंवेदनशीलता के परिणामों से ग्रस्त होने से बचने के लिए प्रतिरोध ही तो विकल्प होगा। लेकिन बारीक धारा यही है कि वह हिंसक नहीं होना चाहिए।

इसीलिए जब 124 ए की परिभाषाएं की गयी हैं और कहा गया है कि ‘कानून द्वारा स्थापित सरकारों को उन लोगों से अलग होकर देखना चाहिए जो कुछ समय के लिए कार्य कर रहे हों। इसलिए यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति और उसकी सजा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजद्रोह की सीमाएं निर्धारित करता है कि इसका प्रयोग जनता के मूल अधिकारों को समाप्त करने के लिए नहीं हो सकता। इसी प्रकार सरकार का काम विचारों पर प्रतिबंध लगाना नहीं है। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता समाज के विभिन्न अंगों व समुदायों को प्रदान की गयी है। केवल समाचार-पत्रों को ही नहीं है। वे भी आम जन समुदाय की श्रेणी में आते हैं।

इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के क्रम में ही संगठन बनाने और चलाने की आजादी को भी देखा जाना चाहिए। उनकी निष्ठा सरकार के प्रति हो, ऐसा आवश्यक नहीं है। इसलिए इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर अंतिम निर्णय तो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ही होना है। कुल मिलाकर यह निर्णय न केवल भावनाओं, अटकलों और उनके कल्पित परिणामों पर आधारित है, बल्कि अव्यवस्था को साधारण परिभाषा में ही मूल अधिकारों से अलग करके लिया गया है.
(श्री शीतला सिंह जनपद फ़ैजाबाद, उत्तर प्रदेश से प्रकाशित हो रहे सहकारी समाचार पत्र दैनिक जनमोर्चा के मुख्य संपादक हैं और पिछले कई बार से वे भारतीय प्रेस परिषद् के सदस्य हैं! श्री सिंह ने अयोध्या विवाद के समाधान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर बहुत कार्य किया है)

Thursday, December 23, 2010

''नया मिजाज़, नया रंग ,नया तेवर है...... '' --- सुनील अमर

WikiLeaks के खुलासे के बाद अब यह पूरी तरह साफ हो गया है, कि आने वाले दिनों में न सिर्फ़ पत्रकारिता की दशा और दिशा में आमूल-चूल तब्दीलियाँ आने वाली हैं,बल्कि यह दुनिया के तमाम शासकों को भी यह सोचने को मजबूर करेगा कि जो जनता उन्हें अपने ऊपर हुकूमत करने के लिए खुद ही चुनती है, उससे वे कितना छल-कपट कर सकते हैं! इसके अलावा जनता के धन और जनता की सरकार से ही ताकत प्राप्त करके अपने को बड़ा मीडिया घराना और चौथा स्तम्भ मानने वाले कुछ नाखुदाओं को भी '' cut to size '' कर सकती है. यह सब तो होगा ही, सबसे बड़ा काम जो हो सकता है, वह है- व्यवस्था के प्रति विद्रोह रखने वालों को भी एक बड़ा भोंपू उपलब्ध कराना ! भोंपू मैंने लिख दिया है, असहमति रखने वाले इसे बिगुल भी कह सकते हैं.
अब एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि इससे यानी विकिलिकियाई से लाभ किसका होगा? जनता जनार्दन का या फिर उनका, जिनका कि किसी प्रकार से सूचना-स्रोतों पर अधिकार रहेगा ! अभी तक जो कुछ सामने आया है, वह चूँकि पहली बार है, इसलिए हम बहुत आह्लादित से हैं और यह जानना अभी शेष है कि जो दिखाया गया है वह, शो-रूम है कि गोदाम ! अभी तो हम यही मानकर चल रहे हैं कि जुलियन असान्जे ने, जो कुछ भी पाया है वो सब खोल कर रख दिया है! और यह सही भी हो सकता है, अगर उनकी प्रतिबद्धता कोई वैचारिक न होकर सिर्फ़ रहस्योद्घाटन की ही हो ! वैचारिक प्रतिबद्धता होने पर तो सिर्फ़ वही और उतना ही बताया जाता है, जिससे कि अपने विचारों का प्रचार-प्रसार हो. यही कारण है कि वैचारिक प्रतिबद्धता वालों की बातों पर तुरंत या आँख मूंद कर भरोसा नहीं किया जाता!
दूसरों को आईना दिखाने वाला मीडिया इन दिनों खुद आईने के सामने है. अपने को चाँद समझने के मुग़ालते में रहने वाले को अब पता चल रहा है कि उसके ख़ूबसूरत कहे जाने वाले चेहरे पर भी कई बदसूरत दाग और धब्बे हैं! अपने को मीडिया का बड़ा ख़ुदाई फ़ौजदार मानने वाले, इन दाग-धब्बों को क्रमशः छिपाने, मिटाने या चमकाने में लगे हुए हैं! एकाध फ़ौजदार तो इस आधार पर इन दाग-धब्बों को माफ़ कर देने की वक़ालत कर रहे हैं कि अतीत में मीडिया ने बड़े-बड़े घोटालों-भ्रष्टाचारों को उजागर किया है, इसलिए उसकी इस पहली(!) गलती को माफ़ कर दिया जाना चाहिए ! कमाल है! भाई, यही सहूलियत आप और अपराधियों के बारे में क्यों नहीं चाहते ? आखिर वे भी तो अदालतों में कसम खाते हैं कि दुबारा अपराध नहीं करेंगें! या आपने बिल्कुल तय ही कर लिया है कि मीडिया वाले Super -Duper चीज़ हैं! अब तो आप रहम करिए देश की जनता पर और ये फ़ैसला उसे ही करने दीजिये प्लीज़.
WikiLeaks का दिखाया रास्ता बहुत सस्ता, सुलभ, आसान और बेहद असरदार है.लेकिन यह ऐसा ही बना रहने पायेगा, इसमें संदेह है, क्योंकि यह सारी दुनिया के स्थापित तंत्रों के खिलाफ है.और दुनिया भर के शासन-तंत्र और बड़े मीडिया समूह इसका गला घोटने का मंसूबा सरे-आम पाले हुए हैं.फिर भी इस विकिलिकियाई से अगर हमें काफ़ी उम्मीदें हैं तो महज़ इस कारण कि इसका उत्स हम-आप ही हैं.हम-आप अगर चाहेंगें तो यह इस WikiLeaks नहीं तो दूसरे WikiLeaks , तीसरे
WikiLeaks या फिर चौथे WikiLeaks के रूप में सामने आता ही रहेगा ! जाहिर है कि यह '' हल्दी लगे न फिटकरी और रंग चोखा'' टाइप का मामला है! 00

Tuesday, December 21, 2010

उप्र भाजपा और उमा भारती की वापसी -- सुनील अमर

पिछले सात-आठ वर्षों से अस्त-व्यस्त पड़ी उ.प्र. भारतीय जनता पार्टी को पुनर्जीवित करने का जिम्मा अब उन उमा भारती को दिया जा रहा है, जिन्हें लगभग 5 वर्ष पूर्व पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाकर निष्कासित कर दिया गया था, और जिन्होंने लगभग उसी वक्त भारतीय जनशक्ति पार्टी यानी भाजपा नाम से ही अपनी नयी पार्टी बना ली थी। भाजपा नेतृत्व का मानना है कि उ.प्र. में पिछड़ों को आकर्षित व उग्र हिन्दुत्व को जीवित रखकर ही फिर से राजनीतिक स्थिरता प्राप्त की जा सकती है और इसके लिए वह उमा भारती सरीखे नेताआं को अब उपयुक्त मान रही है। पार्टी उ.प्र. को लेकर कितनी चिन्तित है, इसका अन्दाज इसी से लगाया जा सकता है कि उमा की वापसी के अलावा पूर्व राष्ट्रीय अधयक्ष राजनाथ सिंह ने अब अपना पूरा समय उ.प्र. में ही लगाने की तथा वर्तमान अधयक्ष गड़करी ने उ.प्र. पर विशेष धयान देने की घोषणा की है। यह तथ्य भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है कि पार्टी के पास उ.प्र. से कई बड़े और कद्दावर नेता हैं।
उमा भारती की भाजपा-वापसी के प्रयास और चर्चाऐं लगभग डेढ़ साल से चल रही हैं। दरअसल, जब एक वक्त के भाजपा के नायक कल्याण सिंह, अपने लम्बे राजनीतिक अनुभव को मिथ्या करार देते हुए अपनी धार विरोधी समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिये तो भाजपा को लगा कि अब पिछड़े वोट सपा के साथ जुड़ जायेंगें। लगभग तभी यह भूमिका बन गई थी कि अब उमा भारती को भाजपा में वापस लाया जाना चाहिए। कल्याण और उमा, ये दोनों भाजपा के पिछड़े वर्ग के दिग्गज नेता रहे हैं। स्वाभाविक ही है कि पार्टी को इनकी कमी खटकती। हालाँकि कल्याण को पार्टी में वापस लाने का प्रयोग एक राजनीतिक भूल ही साबित हुई थी। लेकिन राजनीति, सिर्फ अच्छाइयों और सच्चाइयों पर चलने की चीज तो होती नहीं। इसमें तो बहुत बार जानबूझ कर पिछली भूलों और गल्तियों पर पुन: सवार हुआ जाता है!
उमा भारती को जब भाजपा से निकाला गया था, उस वक्त पार्टी अगर उ.प्र. में ढ़लान पर थी, तो आज वह गिर चुकी है। इस दौरान जितने भी चुनाव और उप-चुनाव हुए, उनमें लगातार इस पार्टी की हालत खराब होती गई, और प्रत्याषियों की जमानत जब्त होने का रिकार्ड बनता गया। आज तो उ.प्र. में स्थिति यह है कि अभी नयी-नयी गठित और नामालूम सी पीस पार्टी के मुकाबले भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी कहीं टिक नहीं पा रही है। अभी गत सप्ताह सम्पन्न जिला पंचायत अधयक्षों के चुनाव में 72 जिलों मे से सिर्फ एक जिले में भाजपा जीत पाई है! पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को आकर्र्षित करने के लिए सपा, बसपा और काँग्रेस कोई कोशिश बाकी नहीं रख रही हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि उ.प्र. में भाजपा के स्वर्णिम दिनों में (वर्श 1992 से लेकर 1999 तक) पिछडे, ख़ासकर कुर्मी और लोधा, इसके प्रमुख वोट बैंक हुआ करते थे। इस वोट बैंक को आकर्शित करने में प्रदेष के कल्याण सिंह, उमा भारती, ओमप्रकाश सिंह, विनय कटियार और गंगाचरण सिंह आदि नेताओं का बहुत योगदान था। लेकिन एक तो राम मंदिर निर्माण के सम्बन्ध में बार-बार की लफाजी और दूसरे उक्त बड़े नेताओं के सत्ता में कई बार रहने के बावजूद पिछड़ों के लिए कोई सार्थक कार्य न किये जाने के कारण यह वोट बैंक भी इससे उदासीन होकर दूसरी तरफ खिसक गया। इसी दौरान भाजपा के षीर्श पुरुश अटल बिहारी वाजपेयी से अपनी मत-भिन्नता के चलते कल्याण सिंह का तथा अन्यान्य कारणों से उमा भारती का जो उत्पीड़न पार्टी द्वारा शुरु हुआ तो इसका भी काफी गलत संदेश पिछड़े वर्ग में गया। भाजपा को इन सबका काफी नुकसान उठाना पड़ा।
भारतीय जनशक्ति पार्टी का गठन कर भाजपा को नेस्तनाबूद कर देने की बार-बार की धमकी और भाजपा प्रत्याशियों के खिलाफ चुनाव लड़ चुकी सुश्री उमा भारती, एक लम्बे समय से भाजपा में आने के जुगाड़ मे लगी थीं। वे अगर सफल नहीं हो पा रही थीं तो इसका साफ मतलब यह था कि पार्टी के भीतर एक बड़ा और प्रभावी तबका इसका विरोध कर रहा था। यह विरोध कितना ताकतवर था, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि लौह-पुरुष आडवाणी के खुलकर चाहने के बावजूद उमा की वापसी नहीं हो पा रही थी। अब अगर उनकी वापसी हो रही है तो यह सिर्फ आडवाणी के चाहने से नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों के चलते हो रही है जिनमें एक तो, संघ के खुले दख़ल से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर नितिन गड़करी की नियुक्ति, दूसरी, भाजपा को एक बार फिर से 1992 की राजनीतिक-धार्मिक कट्टरता के हिसाब से चलाने का संकल्प और तीसरी, अभी-अभी बिहार में सम्पन्न विधान सभा चुनाव के नतीजों की वह व्याख्या कि बैकवर्ड और मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण ने जद-यू और भाजपा गठबंधन को हैरतअंगेज सफलता दिला दी, आदि शामिल हैं। अब भाजपा को लग रहा है कि बिहार की तरह उ.प्र. में भी बैकवर्ड कार्ड खेलकर और 1992 की तरह धार्मिक भावनाओं को उभार कर चुनावी लाभ लिया जा सकता है। हालांकि भाजपा यह भूल रही है कि बिहार का ताजा चुनाव, जाति नहीं विकास के बूते और लालू-राज की वापसी के भय को आधार बना कर लड़ा और जीत गया।
बिहार के जिस ताजा प्रयोग की चर्चा आजकल मीडिया में खूब की जा रही है, उ.प्र. में वर्ष 2007 में वही प्रयोग और वैसी ही हैरतअंगेज सफलता बसपा प्राप्त कर चुकी है। आज भी बसपा अपने उसी स्टैण्ड पर कायम है और आगामी चुनाव भी उसी तरह लड़ने की अपनी मंशा वह जाहिर कर चुकी है। ऐसे में सुश्री उमा भारती के पास वह कौन सा फार्मूला है जिससे वह न सिर्फ पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को आकर्शित कर लेंगीं बल्कि राम मंदिर के नाम पर हिन्दुओं में धार्मिक भावनाओं का उफान लाकर वे वोटों से भाजपा की झोली को भर देंगी? और यह सब, हो सकता है वे कर भी ले जातीं, लेकिन उन्हें उ.प्र. में जो भाजपा संगठन मिल रहा है, वह भी गौर करने लायक है कि क्या वह इतना सक्षम भी है? उ.प्र. में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सूर्यप्रताप शाही हैं, जो लगभग उसी तरह से अक्षम हैं, जैसे पिछले दो-तीन अध्यक्ष होते रहे हैं। निवर्तमान अघ्यक्ष डा. रमापतिराम त्रिपाठी का कार्यकाल तो बहुत ही लचर रहा। संगठन की तमाम बैठके और अधिवेशनं तक में मंच पर ही तू-तू, मैं-मैं का नजारा दिखाई पड़ता रहा। आज भी कमोवेश वही स्थिति बनी हुई है। और तो और, राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर नितिन गड़करी की ताजपोशी को ही लेकर आज तक उ.प्र. भाजपा सहज नहीं हो पाई है। यही वजह है कि देष के सभी राज्यों से अधिक ध्यान उ.प्र. पर देने के बावजूद श्री गड़करी यहॉ कोई भी सुधार कर नहीं पाए हैं।
कल्याण सिंह, साधवी ऋतम्भरा और उमा भारती सरीखे नेता भाजपा के लिए तभी तक मुफीद थे, जब तक वह कट्टर हिन्दुत्व की राह पर चल रही थी। इन सभी नेताओं ने अपने आज तक के राजनीतिक जीवन में 'जय श्री राम' और 'मंदिर वहीं बनायेंगें' के अलावा और कुछ किया नहीं। साधवी तो भाजपा के शासनकाल में काफी जमीन आदि का जुगाड़ बनाकर अब आश्रम व्यवस्था तक ही सीमित रह गई हैं। कल्याण और उमा, भाजपा से निकाले जाने के बाद अपने-अपने राजनीतिक संगठन बनाकर अपनी सामर्थ्य को ऑंक चुके हैं। दरअसल भाजपा को अयोध्या विवाद के फैसले से बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन जब फैसला आया तो उसने सारी उम्मीदों की हवा ही निकाल दी। फिर भाजपा को मुसलमानों से उम्मीद बंधी कि शायद मुसलमान ही फैसले पर प्रतिक्रिया करनी शुरु कर दें लेकिन मुसलमानों ने न्यायिक लड़ाई लड़ने की घोशणा करके अपनी प्रतिक्रिया बेहद संतुलित कर दी। इससे भाजपा और संघ को अपने भविष्य के मंसूबों को धार देने में बहुत निराशा महसूस हो रही हैं। (Published in Hum Samvet Features on 20 December 2010)

Monday, December 13, 2010

भयादोहन करती विज्ञापनों की भाषा -- सुनील अमर

टी.वी.चैनलों पर इन दिनों एक विज्ञापन आता है, जिसमें साफ,सुन्दर और मजबूत दाँतों वाली एक युवा लड़की को एक टूथ पेस्ट कम्पनी का सेल्समैन बताता है कि उसके दाँतों में बहुत ज्यादा कीटाणु हैं और वह उसे एक अजीबो-गरीब पैमाने से नापकर दिखाता है, जिसमें ढ़ेर सारे बैक्टीरिया दिखायी पड़ते हैं लेकिन जब वह लड़की सेल्समैन की कम्पनी का टूथ पेस्ट कर लेती है, तो तुरन्त ही उसके दाँतों से कीटाणु गायब हो जाते हैं! सेल्समैन बताता है कि सबके मुँह में इसी तरह कीटाणु होते हैं, जो दाँतों और मसूढ़ों को सड़ा डालते हैं। तात्पर्य यह है कि उस कम्पनी का टूथ पेस्ट जरुर करना चाहिए। साबुनों का भी विज्ञापन इसी तरह आता है कि यदि अला-फला कम्पनी के साबुनों का इस्तेमाल न किया गया तो कपड़े खतरनाक कीटाणुओं से भरे रहेंगें और तमाम भयानक बीमारियाँ होती रहेंगीं। एक साबुन कम्पनी तो अपनी एक ऐसी प्रयोगशाला दिखाती है, जैसी कि बड़ी-बड़ी दवा कम्पनियों में भी क्या होती होगी! दर्शक, स्वाभाविक ही बड़े पशो-पेश में पड़ जाता है कि क्या वास्तव में उसके कपड़े कीटाणुओं से भरे पड़े हैं?
भूमंडलीकरण ने जिस उपभोक्ता-संस्कृति या उपभोगवाद को जन्म दिया है, यह विज्ञापनी कुचक्र उसी का प्रतिफलन है। दरअसल डर को बेचना बहुत आसान होता है, बशर्ते ग्राहक को ठीक से डरा दिया जाय। डरा हुआ आदमी कुछ भी कर सकता है क्योंकि उसके विवेक पर डर हाबी हुआ रहता है। ऐसे में उसे डर से मुक्ति का जो उपाय बताया जाता है वह सहज ही उसे अपना लेता है। वस्तुओं की बिक्री बढ़ाने के लिए विवेकहीन ग्राहक से अच्छा और क्या हो सकता है! सो येन-केन-प्रकारेण ग्राहकों को डराने का यह गैर-कानूनी कार्य सरे-आम और निर्बाध रुप से चल रहा है। अब ऐसा नहीं है कि डराने का यह खेल सिर्फ उपभोक्ता वस्तुओं के लिए ही किया जा रहा है, बल्कि इसका दायरा काफी विस्तृत हो चुका है। इसमें पहले भूत-प्रेत की कपोल-कल्पित कहानियों पर आधारित धारावाहिकों को दिखाकर भयभीत ग्राहक तैयार किये जाते हैं, तत्पश्चात उनके उपचारार्थ ढ़ोंगी बाबाओं, तांत्रिकों और तथाकथित धर्मगुरुओं को टी.वी. चैनलों पर पेशकर उनकी दुकान चलवाई जाती है। यह ध्यान दिला देना उचित ही होगा कि भयादोहन के इस व्यापार में सिर्फ उपदेश ही नहीं बिकता बल्कि करोड़ों-अरबों रुपये की पूजा सामग्रियों और चढ़ावे का भी वारा-न्यारा होता है। इस प्रकार यह एक सुनियोजित व्यापार है।
टी.वी. पर आने वाले विज्ञापनों पर अगर गौर करें तो पता चलता है कि इनका सहज निशाना मुख्य तौर पर महिलाऐं और बच्चे होते हैं। इन्हीं को लक्ष्य कर विज्ञापनों का निर्माण किया जाता है। इसके पीछे का मनोविज्ञान भी बिल्कुल साफ है-घर चलाने और उसके लिए सामान खरीदने की जिम्मेदारी गृहणी की होती है तथा प्रत्येक बच्चा अपने माँ-बाप की कमजोरी होता है। बच्चे की सलामती और उसके खुशहाल भविष्य के लिये मॉ-बाप कुछ भी करने के लिए हमेशा ही हो जाते हैं, और इसीलिए वे धंधोबाजों के निशाने पर आ जाते हैं। धंधा करने के लिए पहले भ्रान्तियाँ पैदा की जाती हैं, तत्पश्चात उसके निवारण के सामान उपलब्ध कराये जाते हैं। अभी कुछ दिन पहले एक विज्ञापन आता था जिसमें एक स्त्री दूसरी से कहती थी कि- साफ तो है लेकिन स्वच्छ नहीं। अब जब तक आम दर्शक इस व्याकरण में पड़े कि साफ और स्वच्छ का फर्क क्या हुआ तब तक उसे बता दिया जाता था कि साफ तो किसी भी उत्पाद से किया जा सकता है लेकिन स्वच्छता तो सिर्फ उसी कम्पनी के उत्पाद से आ सकती है! एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने अपने साबुन के प्रचार के लिए एक समय तो एक नया शब्द ही गढ़ लिया था-चमकार! अब आप शब्दकोश में तलाशते रहिये यह शब्द और इसका मतलब! दिक्कत किसी वस्तु के प्रचार में नहीं बल्कि उसे जबरन बेचने में है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ दृष्य या श्रव्य माध्यमों पर ही ऐसा हो रहा है। प्रिन्ट माध्यम मे भी यह खेल उसी रफ्तार से हो रहा है जैसे दृष्य-श्रव्य में। यहाँ न सिर्फ शब्दों की बाजीगरी है बल्कि कानूनी शिकन्जे से अपनी गर्दन बचाये रखने के लिए अपठनीय बारीक अक्षरों में हिदायतें छापने की चालाकी भी रहती है। यह सभी जानते हैं कि सफाई अच्छी बात है लेकिन सफाई का आतंक पैदाकर कोई वस्तु विशेष बेचने का प्रयास करना तो गैर कानूनी ही कहा जाएगा। बच्चों के लिए एक विज्ञापन में दिखाया जाता है कि गर्मी के दिनों में सूर्य देवता बाकायदा एक पाइप उनके सिर पर लगाकर सारी ताकत चूस लेते हैं। धूप में लड़खड़ाता हुआ एक बच्चा और उसके सिर पर चिपकी एक पाइप से शरीर की सारी ताकत खींचती कोई आसमानी शक्ति! और फिर यह आदेशात्मक सुझाव कि सिर्फ उनकी कम्पनी का फलां पेय पदार्थ ही इससे बच्चे की सुरक्षा कर सकता है। अब बच्चे तो बच्चे, बड़ों को भी यह विज्ञापन ऐसा विचलित करता है कि वे भी अपने नन्हें-मुन्नों की सलामती के लिए चिन्तित हो जायँ। और वास्तव में यही चिन्ता पैदा कर देना ही तो करोड़ों में बनने वाले इन विज्ञापनों की सफलता है! जब आप चिन्तित हो जायेंगें तभी तो चिन्ता दूर करने का उपाय करेंगें!
दुनिया में धन केन्द्रित व्यवस्था और 'इस्तेमाल करो और फेंको' की पनपती संस्कृति ने निश्चित ही पुराने आदर्शों और मान्यताओं को ढहाया है। यही कारण है कि आज के समाज में तमाम ऐसे भी व्यवसाय हो गये हैं जो लोगों की भावनाओं को क्षति पहुँचाकर ही किये जाते हैं। इसके प्रतिफलन में भावनाऐं और संवेदनाऐं भी धीरे-धीरे दम तोड़ती जा रही हैं। यह सहज ही सोचने वाली बात है कि जिस तरह से विज्ञापनों में बताया जाता है कि काम करने से हाथों में कीटाणु, सांस लेने से शरीर के भीतर कीटाणु, कपड़ों में कीटाणु, दॉतों में कीटाणु, हर प्रकार के खाद्य पदार्थों में कीटाणु और गरज़ यह कि चारों तरफ कीटाणु ही कीटाणु भरे पड़े हैं, ऐसे में तो दुनिया के हर आदमी का जीवन ही दुश्वार हो जाना चाहिए था! लेकिन ऐसा नहीं है, लोग जी रहे है बल्कि हो यह रहा है कि आज अमीरों द्वारा संक्रमण और बीमारियॉ ज्यादा फैलायी जा रही हैं। बीते दिनों में हमने देखा कि वैश्वीकरण के चलते 'मैड काउ डिजीज','बर्ड फ्लू' और 'स्वाइन फ्लू', जैसी घातक संक्रामक बीमारियाँ गरीबों की देन नहीं थीं बल्कि जो सम्पन्न वर्ग है और जो खान-पान और रहन-सहन के सारे विज्ञापनी एहतियात बरत सकता है, वही पहले-पहल इन सबकी चपेट में आया और फिर बाकी लोगों को आना ही था। ये विज्ञापनी सावधानियॉ जाहिर है कि धंधेबाज हैं और इनका मकसद सिर्फ लोगों की जेब से पैसा खींचना भर ही हैं। फिर भी यह सवाल अपनी जगह रह ही जाता है कि लोगों को बहला-फुसला कर, दिग्भ्रमित कर अपना उल्लू सीधा करना कहाँ तक उचित है?
--- सुनील अमर ( Published in HumSamvet Features 13December2010)

Friday, December 10, 2010

पैसे के खेल से जो पत्रकारिता चलेगी, वो पैसे का ही खेल करेगी --- सुनील अमर

इन दिनों मीडिया में भ्रष्टाचार को लेकर बड़ा स्यापा हो रहा है. जिससे भी जितना बन पड़ रहा है, उतना विलाप वो कर रहा है. दू:खी लोग कह रहे हैं कि बड़ा भ्रष्टाचार हो गया है! उनके कहने से ऐसा लग रहा है कि जैसे किन्हीं छोटे लोगों ने अपनी औकात भूल कर कोई बड़ी वारदात कर दी है! अरे भाई! जब बड़े लोगों ने की है तो बड़ी वारदात ही तो करेंगें! आखिर इतनी सड़ांध आने के बावजूद अभी भी तो बदस्तूर कहा ही जा रहा है कि देश के दो बड़े पत्रकार ....!
ये बड़े पत्रकार क्या होते हैं भला ? जाहिर है कि यहाँ लम्बाई तो नापी नहीं जा रही है. उन्हें मिले ईनामों-इकरामों को भी नहीं गिना जा रहा है. जो मिले या अपने गढ़े किन्हीं बड़े पदों पर आसीन हैं, उन्हें ही रवायत के लिहाज़ से बड़ा कहा जाता है,वरना बड़प्पन नापने के लिए अगर आदर्श पैमानों का इस्तेमाल किया जाता तो लिस्ट ऊपर से नीचे को पलट सकती है.अब निश्चिंतता इसी बात को लेकर है कि ऐसा होना ही नहीं है ! दरअसल जो लोग रोना रो रहे हैं, वो कोई 50 साल पुराना एक आईना लिए हैं, उसी में वो अपना भी मुंह देखते रहते हैं और दूसरों को भी वही दिखाने की कोशिश करते रहते हैं! इस सच्चाई को जान-बूझ कर भूलते हुए कि आज के बड़ी कुर्सी पर बैठे हुए पत्रकार, ऐसे आईने को देखना ही नहीं चाहते,क्योंकि इसकी उन्हें जरुरत भी नहीं है और यह उन्हें डराता भी है!
जिन बड़े पत्रकारों की नैतिक और आर्थिक फिसलन पर इतना स्यापा किया जा रहा है, अब तो उनका लगभग समूचा परिवेश ही जानकारी में है ! वे किसी मिशनरी के प्रोडक्ट नहीं हैं, और न ही वे किसी प्रकार का गणवेश धारण कर कोई समाज-सेवा करने की घोषणा करके इस मैदान में उतरे ही थे.वे जिस खेत के उत्पाद हैं वहाँ यही सब जोता-बोया जाता है, जिसकी फसल उन्होंने काटी है !
ये विलाप माने रख सकता था, असर डाल सकता था, अगर हम ज्यादा नहीं सिर्फ़ 20 साल पहले के समय में होते . जब एक स्वाभाविक लगन,एक स्वतः स्फूर्त समाज बदलने की ललक और समाज के महाजनों द्वारा स्थापित आदर्शों को अपनाने का एक दृढ निश्चय लेकर कोई युवा (प्रायः मध्यम वर्ग से) पत्रकारिता के विकट जंगल में उतरता था.एक समय में तो ऐसा आह्वान किया जाता था कि (पत्रकारिता के लिए ) ऐसे नवजवानों कि आवश्यकता है जिन्हें खाने के लिए दो सूखी रोटियां और रहने के लिए जेल उपलब्ध रहेगी. और यह भी सुखद इतिहास रहा है कि नवजवानों की कभी कमी नहीं पड़ी.
लेकिन आज ? कस्बाई स्तर पर भी किसी अख़बार का संवाददाता बनने के लिए क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं और क्या-क्या लेन-देन करना पड़ता है, इसे सिर्फ़ कोई भुक्तभोगी ही बता सकता है.और जिन्हें आज मीडिया घराना कहा जाता है, उनमें प्रवेश पाने के लिए तो पत्रकारिता या प्रबंधन या फिर दोनों की वो डिग्रियां होनी चाहिए जो लाखों रूपये फीस देने के बाद मिलती है.और एक गलाकाट प्रतियोगिता अलग से पार करनी पड़ती है. जिन महापुरुषों के भ्रष्ट हो जाने का स्यापा हो रहा है, वे दो सूखी रोटी का इश्तहार देख कर पत्रकारिता में नहीं कूद पड़े थे! वे सब एक योजनाबद्ध ढंग से इसकी तैयारी और इसके नफ़े-नुकसान का गुणा-भाग कर के आये थे. आज अरबों रुपयों से तैयार बड़े और भारी-भरकम पत्रकारिता संस्थानों से 'दीक्षित' होकर जो फ़ौज निकल रही है, ज़रा वहाँ के माहौल का भी जायजा लेना चाहिए कि हमारे भविष्य के कर्णधार किस मानसिकता के साथ तैयार किये जा रहे हैं! जब पत्रकारिता को हमने कैरियर बना दिया है, तो जो ऐब-ओ-हुनर कैरियर वालों में होते हैं, वो सब अपने विकृत रूप में इनमें भी आयेंगें ही.
पत्रकारों को काबू में रखने के लिए, अनुशासित करने के लिए और मर्यादित रहने के लिए नियम-कानूनों की बातें की जा रही हैं, जैसे यह देश में कोई नया प्रयोग होगा! आखिर पत्रकारों को छोड़ कर शेष सभी के लिए तो बने ही हैं तमाम नियम-कानून. कौन सा नतीजा दे रही हैं ये बंदिशें? हद तो यह है कि हम पहले तो एक काजल की कोठरी तैयार करते हैं फिर कुछ लोगों से अपेक्षा रखते हैं कि वे किसी मदारी के करतब को दिखाकर बेदाग उसमें आया-जाया करें! आज पत्रकारिता का समूचा तंत्र ही क्या विशाल पूंजी के नियोजन से नहीं चल रहा है ?बड़ी-बड़ी सेलरी, बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ और बड़ी-बड़ी कोठियां, जिन पत्रकारों के पास हैं (और जिन्हें हमीं स्यापा करने वाले लोग हर छोटे-बड़े कार्यक्रमों में आज तक देवता समझ कर बुलाने की जुगत करते रहे हैं ) ये सब क्या गंगाजल से रोज आचमन करने से आ जाती हैं? आखिर किसको मूर्ख बनाने के लिए यह प्रलाप किये जा रहे हैं?एक महापुरुष ने तो प्रायश्चित के तौर पर अपना कालम कुछ दिनों के लिए बंद करने की घोषणा कर दी है, मानों कह रहे हों कि-लो,अब जब कालम के बिना तुम सब चिल्लाओगे तब तुम्हारी समझ में आयेगी मेरी अहमियत! दूसरी ओर एक महास्त्री हैं जो घूम-घूम कर प्रतिप्रश्न कर रही हैं कि जब ऐसा-ऐसा और ऐसा हुआ था तो क्यों नहीं स्यापा किये थे आप सब?
बिडम्बना देखिये कि जो महा-जन कभी दबे-कुचलों की बात करने के लिए विचारधारा-विशेष की ध्वजा उठाये फिरते थे, वे साफ-साफ और सरे-आम बिके और रातों-रात नौकर( संपादक) से मालिक बन गए,लेकिन हम उन्हें देवता ही मानते रहे! आज उन्हीं देवताओं की जूठन को प्रसाद के बजाय बिष्टा कह रहे हैं! क्यों भाई?
पैसे के खेल से जो पत्रकारिता चलेगी, वो पैसे का ही खेल करेगी. अब इसे जो भोले-बलम लोग नहीं मानना चाहते, वो कृपया कुछ दिनों के लिए किसी पहाड़ी की गुफा में चले जांय और वहाँ अपने मन को साध कर कोई फार्मूला ले आयें जो पैसे के खेल में भी चाल-चरित्र और चेहरा आदर्श बना कर रख सकता हो! पत्रकार तो आज भी दो सूखी रोटी के ऐलान पर तमाम मिल जायेंगें लेकिन ऐसा ऐलान करने वाला कोई मालिक भी तो निकले! और अगर नहीं , तो आगे तमाम संघवी और तमाम बरखायें आपको कीचड़ में लथपथ दिखाई पड़ेंगें क्योंकि सत्ता-तंत्र राडियाओं से अटा पड़ा है.
मालिक-विहीन अख़बार यानी सहकारी समितियों द्वारा अख़बार चलाने की अवधारणा की गयी थी, कई विफल प्रयोग भी किये गए देश में. उ.प्र. के फ़ैजाबाद जिले से जनमोर्चा नामक एक हिंदी दैनिक सहकारिता के ही आधार पर पिछले 53 वर्षों से नियमित चल भी रहा है, लेकिन कर्मचारी बताते हैं कि वहाँ भी सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है. तो असल चीज नीयत है और जब नीयत में खोट आ जाय तो लोकतंत्र से बढ़िया चरागाह और कहाँ मिल सकता है?
लेकिन इतिहास गवाह है कि आदर्शों और मूल्यों की बुझी हुई राख से ही बहुत बार ऐसी चिंगारियां निकली हैं कि सोने की बड़ी-बड़ी लंकाएं जल कर खाक़ हो गयी हैं. जब आप चिंता कर रहे हैं, हम चिंता कर रहे हैं, हम-सब चिंता कर रहे हैं, तो इस लंका को तो जलना ही है एक दिन!
कैफ़ी आज़मी की एक नज़्म ऐसे माहौल में बड़ी राहत दे रही है -- '' आज की रात बड़ी गर्म हवा चलती है, ..... तुम उठो, तुम भी उठो, तुम भी उठो.तुम भी उठो , इसी दीवार में इक राह निकल आयेगी .......''
राह जरूर निकलेगी दोस्तों ! और वो हमें ही निकालनी होगी,
आमीन !

Wednesday, November 24, 2010

''शर्म हमको मगर नहीं आती '' -- सुनील अमर

क़ाबलियत और हुनर नापने के पैमाने भी किस तरह राजनीति के मोहताज़ होते हैं, इसे TIMES पत्रिका के ताज़ा फ़ैसलों से जाना जा सकता है. लेकिन इसमें उनका कोई दोष नहीं, क्योंकि वे पश्चिम में रहकर भी पूरब की तरफ नहीं देखते, और हम पूरब वालों को, पश्चिम के सिवा और कोई दिशा मालूम ही नहीं है!
इंदिरा गाँधी और हिलेरी क्लिंटन की भला क्या तुलना हो सकती है ? नेट पर तो बहुत से भाई विदेश मामलों के जानकर भी होंगे, उनसे मेरी गुज़ारिश है कि अगर हिलेरी, इंदिरा गाँधी से 20 ठहरती हों तो कृपया मेरा भी ज्ञानवर्धन करें! हिलेरी छठे स्थान पर और इंदिरा गाँधी 9वें स्थान पर ! बेशर्मी की भी हद होनी चाहिए या नहीं? जिस सदी की चर्चा की गयी है, उसमें क्या थीं हिलेरी ? याद है किसी को ? हाँ, उनकी एक बात ज़रूर याद है कि उन्होंने किस तरह चेहरे पर भारी शर्मिंदगी का भाव लिए हुए अमेरिकन टीवी पर अपने लम्पट पति (और तब राष्ट्रपति भी ) की लम्पटता को माफ़ कर अपने परिवार को टूटने से बचा लिया था !
लेकिन काहे की बेशर्मी ,जब अभी कुछ महीनों पहले इससे भी ज्यादा बेशर्मी करके नोबल वाले हटे हैं ! इराक,अफ़गानिस्तान को ठंडा करने, पाकिस्तान को उजाड़ने,भारत को अस्थिर करने और इरान तथा कोरिया आदि को लगातार हड्काने के कारण अमेरिका के राष्ट्रपति को उन्होंने विश्व शांति का नोबल दे दिया है ! अब इसके बाद भी शर्म नाम की चीज के लिए क्या कोई जगह बचनी चाहिए? ज़रा गौर करिए , मदर टेरेसा अगर भारत की न होकर किसी पश्चिमी देश में पैदा हुई होतीं तो क्या वे 22वें स्थान पर रखी गयी होतीं? यकीन मानिये,वे जेन अडम्स के स्थान यानि पहले नंबर पर होतीं, लेकिन क्या करें ये times वाले, कहाँ से लायें वह आँख जो सही देख सके !
और उनको ज़रूरत भी क्या है ऎसी परवाह करने की ? पाँव तक सर झुका कर उनके हर काम पर कोर्निश करने के लिए हम हमेशा तैयार जो रहते हैं!
शर्म तो, वास्तव में हमें आनी चाहिए, लेकिन आती ही नहीं ! शायद शरमाती है भारत आने में ! 00

Monday, November 22, 2010

किसी को भी बोलने से नहीं रोका जाना चाहिए ---- सुनील अमर

संघ परिवार वैसे तो अपने स्थापना-काल से ही मार-पीट और खून-खराबे में विश्वास रखता रहा है, लेकिन 06 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस और वहां प्रेस वालों से मार-पीट करने के बाद से संघ ने इसे अपना एक मात्र ट्रेंड ही बना लिया है. अब किसी भी वैचारिक विरोध के स्थान पर संघ के लठैत मार-काट पर ही उतारू हो जाते हैं, ऐसा देखने में आ रहा है. अब क्योंकि कोई भी सत्तारूढ़ राजनीतिक दल संघ के ऐसे गुंडों पर सख्ती नहीं करता, इसलिए यह गुंडागर्दी बढ़ती ही जा रही है.
इस देश में सुश्री अरुंधती रॉय को किसी भी विषय पर बोलने का उतना ही अधिकार है,जितना देश के किसी भी नागरिक को, और रॉय उतनी ही अपने क्रिया-कलापों के लिए स्वतंत्र हैं, जितना संघ प्रमुख मोहन भागवत अपने को समझते हैं. भागवत की मर्जी , वे चाहें तो अपने को कम स्वतंत्र समझें, लेकिन अरुंधती रॉय या जो कोई भी भारतीय अपने विचार प्रकट करना चाहे, उसे देश के संविधान ने यह आज़ादी दे रखी है, और वह ऐसी आज़ादी के लिए किन्हीं भागवतों का मोहताज नहीं है!
बुद्धि का जवाब बुद्धि से दिया जाना चाहिए, लेकिन जब बुद्धि ख़त्म हो जाती है तो स्वाभाविक ही हाथ-लात और डंडा-गोली चलने लगती है. सुश्री अरुंधती की बहुत सी बातों से बहुत से लोग सहमत नहीं हैं ( मैं खुद भी ) लेकिन संघ या कहीं के गुंडे अपने डंडे के बल पर किसी का बोलना या देश में कहीं आना-जाना रोक दें, यह प्रशासन के मुंह पर तमाचा है,और यह अगर शासन की मर्जी नहीं है तो बार-बार ऐसी वारदातें क्यों हो रही हैं देश भर में? जितना सुश्री अरुंधती बोलती हैं, उसका हज़ार गुना तो स्वयं संघ बोलता रहता है, और ऐसा नहीं है कि संघ को देशवासियों ने कोई अलग से अधिकार दे रखा है! संघ की स्थिति भी देश में वैसी ही है, जैसी कि सुश्री रॉय या देश के अन्य निवासियों की.
संघ को अगर गलत फ़हमी है कि वह एक बड़ा संगठन है, तो उसे जानना चाहिए कि देश और संविधान सबसे बड़े संगठन है. बोलने का हक़ ही तो लोकतंत्र है !

Wednesday, November 17, 2010

मोहल्ला ब्लॉग-- पुलिस की साजिश को आप साफ साफ देख सकते हैं

17 NOVEMBER 2010
♦ विनीता पांडे

(मेरे बचपन के साथी हेम चंद्र पांडे की हत्या को सरकार सही ठहराने की कोशिश कर रही है। खुफिया एजेंसियों की तरफ से भाड़े पर लगाये गये पत्रकार अपने काम में जुटे हैं। इसलिए हेम की पत्नी बबीता के बयानों को ज्यादा अखबारों में जगह नहीं मिल पायी। सभी दोस्तों से अपील है कि नीचे दिये गये बबीता के इस बयान को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं। अगर आप पत्रकार हैं, तो इसे जगह-जगह प्रकाशित करने की कोशिश भी करें : भूपेन)


आंध्रप्रदेश पुलिस मेरे पति हेम चंद्र पांडे के बारे में दुष्प्रचार कर फर्जी मुठभेड़ में की गयी उनकी हत्या पर पर्दा डालने का काम कर रही है। इस मामले में न्यायिक जांच किये जाने के बजाय लगातार मुझे परेशान करने की कोशिश की जा रही है। पुलिस ने शास्‍त्रीनगर स्थित हमारे किराये के घर में बिना मुझे बताये छापा मारा है और वहां से कई तरह की आपत्तिजनक चीजों की बरामदगी दिखायी है। आंध्रप्रदेश पुलिस का ये दावा बिल्कुल झूठा है कि मैंने उन्हें अपने घर का पता नहीं बताया। पुलिस के पास मेरे घर का पता भी था और मेरा फोन नंबर भी लेकिन उन्होंने छापा मारने से पहले मुझे सूचित करना जरूरी नहीं समझा।

मैं अपने पति हेमचंद्र पाडे के साथ A- 96, शास्त्री नगर में रहती थी। हेम एक प्रगतिशील पत्रकार थे। साहित्य और राजनीति में उनकी गहरी दिलचस्पी थी। उनके पास मक्सिम गोर्की के उपन्यास और उत्तराखंड के जनकवि गिर्दा जैसे रचनाकारों की ढेर सारी रचनाएं थीं। इसके अलावा मार्क्सवादी राजनीति की कई किताबें भी हमारे घर में थीं। मैं पूछना चाहती हूं कि क्या मार्क्सवाद का अध्ययन करना कोई अपराध है? पुलिस जिन आपत्तिजनक दस्तावेजों की बात कर रही है, उनके हमारे घर में होने की कोई जानकारी मुझे नहीं है। मेरे पति का एक डेस्कटॉप कंप्‍यूटर था लेकिन उनके पास कोई लैपटॉप नहीं था। उनके पास फैक्स मशीन जैसी भी कोई चीज नहीं थी। वहां गोपनीय दस्तावेज होने की बात पूरी तरह मनगढ़ंत है। मुझे लगता है कि पुलिस मेरे पति की हत्या की न्यायिक जांच की मांग को भटकाने के लिए इस तरह के काम कर रही है। मैं पूछना चाहती हूं कि सरकार क्यों नहीं न्यायिक जांच के लिए तैयार हो रही है?

मैं अपने पति की हत्या के बाद काफी दुखी थी, इस वजह से मैं शास्त्रीनगर के अपने किराये के घर में नहीं गयी। मैं कुछ दिन अपनी सास के साथ उत्तराखंड के हलद्वानी और अपनी मां के पास पिथौरागढ़ में थी। मकान मालकिन का फोन आने पर मैंने उन्हें बताया था कि मैं वापस आने पर उनका सारा किराया चुका दूंगी। अगर उन्हें जल्द घर खाली कराना है तो मेरा सामान निकालकर अपने पास रख लें। मैं बाद में उनसे अपना सामान ले लूंगी। अगर हमारे घर में कोई भी आपत्तिजनक सामान होता, तो मैं उनसे ऐसा बिल्कुल भी नहीं कहती।

मेरी समझ में ये नहीं आ रहा है कि पुलिस इस तरह की अफवाह फैलाकर क्या साबित करना चाह रही है। मुझे शक है कि वो मेरे पति की हत्या को सही ठहराने के लिए ही ये सारे हथकंडे अपना रही है। मैं मीडिया से अपील करना चाहती हूं कि वो आंध्रप्रदेश पुलिस के दुष्प्रचार में न आएं और मेरे पति के हत्यारों को सजा दिलाने में मेरी मदद करे..

Monday, November 15, 2010

:- इसी बहाने -: आज राष्ट्रीय प्रेस दिवस

आज राष्ट्रीय प्रेस दिवस है! तो इसी बहाने प्रेस की आज़ादी पर थोड़ी सी चर्चा क्यों न कर ली जाय? रिवाज भी पूरा हो जाय और फैशन तो आजकल ये है ही !
आज़ादी एक बहु आयामी शब्द है, लेकिन कुल मिला कर आज़ादी तो आज़ादी ही है और इसका कोई विकल्प नहीं होता!
इसी तरह ये भी समझ लेना जरूरी है कि आज़ादी दी नहीं जा सकती, हमेशा उसे लेना ही पड़ता है, बना कर रखना पड़ता है ! जहाँ तक प्रेस का सवाल है,तो अगर आप प्रेस के मालिक हैं,तो अलग चीज हैं, अगर मालिक नहीं हैं तो आपको भी अपनी आज़ादी लेनी पड़ेगी. मालिक आज़ादी दे ही नहीं सकता. आज़ादी ही देनी हो तो काहे का मालिक !
पाठक और पत्रकार, यही प्रेस की आज़ादी के पहलू हैं और ये खुद को आज़ाद कर लें तो फिर सभी मालिक बेचारे ही हो जाएँ. मालिक की अपनी आज़ादी बनी रहे, इसके लिए वह पाठक और पत्रकार के बीच तमाम तरह की दुरभिसंधियां करता रहता है. सरकारें भी मालिक ही होती हैं, और मालिक, मालिक का साथ देगा ही ! लेकिन इसके उलट प्राय: पत्रकार और पाठक का साथ बन नहीं पाता. और यही प्रेस की आज़ादी का वास्तविक संकट है !
पाठक जब तक पत्रकार की आज़ादी की रक्षा करता रहेगा, पत्रकार भी स्वाभाविक रूप से उसकी रक्षा करता रहेगा. लेकिन इसके लिए जागरूक पाठक होना जरूरी है, पाठकों को जागरूक करने के प्रयास चलते ही रहने चाहिए. और यही प्रेस की आज़ादी की वास्तविक चौकीदारी है ! इसमें अगर गफ़लत हुई तो कभी कुछ और भी सोचना पड़ सकता है .........
इस शे'र के साथ अपनी बात पूरी करना चाहूँगा-- '' वो धूप ही अच्छी थी इस छांव सुहानी से , वह जिस्म जलाती थी, यह रूह जलाती है !! आमीन !
---- सुनील अमर 09235728753

बेचारे अमर सिंह ! ---- -- सुनील अमर

पता नहीं त्रिशंकु की कथा सिर्फ़ मिथक ही है या कोई सच्चाई भी, लेकिन जिस किसी को भी त्रिशंकु का दर्द या छटपटाहट महसूस करने की ललक हो, उसे इन दिनों पूर्व सपा नेता अमर सिंह के भाषणों को जाकर सुनना चाहिए. यह उन लोगों के लिए भी सुअवसर है जो दुखांत कथानकों में रूचि लेते हैं. खीझ, गुस्सा, बेबसी, कुछ बिगाड़ न पाने की लाचारी और '' जो मेरे साथ नहीं वो मेरा दुश्मन '' मार्का अभियान इन दिनों चलाकर नि:संदेह अमर सिंह उन सब में सबसे ऊपर अपना मुकाम बना लिए हैं, जो अब तक तमाम राजनीतिक पार्टियों से निकाले गए हैं. इतना खर्चीला और इतना समर्पित जड़-खोदू कार्यक्रम अभी तक किसी भी निष्कासित नेता ने नहीं चलाया था, अमर सिंह के राजनीतिक पूर्वजों में अब तो शरद पवार, संगमा, नारायणदत्त तिवारी, अर्जुन सिंह, कल्याण सिंह, उमा भारती, वेनी वर्मा, आज़म खां आदि पता नहीं कितने नाम हैं, लेकिन इन सबमें वह आग कहाँ जो अमर सिंह में है! और यदि आग थी भी तो उससे इन लोगों ने अपनी राह रोशन करने का काम किया, किसी को पलीता लगाने का नहीं. वैसे इन सबमें एक फ़र्क तो है जिसे मैं शायद अंडर इस्टीमेट कर रहा हूँ -- बाकी सबके मूंछें नहीं हैं, लेकिन अमर सिंह के बड़ी-बड़ी हैं! मेरे एक मित्र ने एक बार मूंछों की महत्ता के बारे में बताते हुए कहा था कि ब्रह्मा जी जब सबको अक्ल बाँट रहे थे, तो कुछ खूब बड़ी-बड़ी मूंछ वाले सज्जनों का नंबर आया. ब्रह्मा जी ने कहा कि आप सब भी अक्ल ले लीजिये. उन लोगों ने पूछा कि यह कहाँ रहेगी ? ब्रह्मा जी ने इशारे से बताया कि सिर में. इस पर वे सब बेहद खफ़ा हो गए! नाराज होकर बोले कि -- मूंछ के ऊपर कुछ नहीं. और वे सब क्रोध में भन्नाते हुए लौट गए. ( वैसे इस घटना की सत्यता परख कर ही आप सब बिश्वास कीजियेगा) .
कल इलाहाबाद में अमर सिंह ने जया भादुड़ी बच्चन की जम कर खिंचाई की और उन्हें बिगडैल बताया. उन्होंने क्रोध पूर्वक आश्चर्य व्यक्त किया कि उनके सपा छोड़ने (?) के बाद जया (अमिताभ वाली) ने भी सपा क्यों नहीं छोड़ दी? उन्होंने फैसला भी सुनाया कि इस जया का समर्पण रिश्तों में नहीं बल्कि राजनीति में है! बेचारे अमर सिंह! उनके सामान्य ज्ञान में शायद यह होगा कि जया नाम की सारी स्त्रियाँ एक जैसी ही होती हैं!
लोग कई तरह से अमर सिंह की आलोचना करते हैं, लेकिन उनकी एक खासियत को बिलकुल ही भूल जाते हैं कि वे सूरदास की काली कम्बली हैं जिस पर दूजा रंग नहीं चढ़ता ! 15 साल राजनीति में रहने के बाद भी वे राजनीतिक नहीं हो पाए ! क्या लड़कपन है उनके अन्दर! हालाँकि इसका रहस्य भी वे एक बार बता चुके हैं कि अभी पिछले दिनों उन्होंने एक 16 साल के लड़के का गुर्दा जो लगवा लिया है!
बेचारे अमर सिंह ! जितना श्रम-समय और साधन वे लगभग साल भर से मुलायम सिंह को गरियाने में लगा रहे हैं, उससे अब तक तो वे कोई Political - Outfit खड़ा कर रहे होते. पार्टी से निकाले गए हर नेता के साथ लोगों की सहानुभूति कुछ दिन रहती ही है, चतुर नेता इस समय का लाभ उठा कर अपना राजनीतिक आधार बनाते हैं, लेकिन अमर सिंह जैसे नेता इसका इस्तेमाल सौतिया -डाह निकलने में करते हैं, और जब तक वे इससे छुट्टी पाते हैं , जनता उनकी छुट्टी कर चुकी होती है ! 00

Sunday, November 14, 2010

अथ श्री सुदर्शन जी !! ----- सुनील अमर

महत्वाकांक्षा कितनी ख़राब चीज है, इसे अपने देश के सठियाये और कब्र में पैर लटकाए नेताओं को देख कर जाना जा सकता है. पूर्व संघ प्रमुख सुदर्शन ने भी वही किया है जो इसके पहले संघ ब्रिगांड भैरव सिंह शेखावत, कल्याण सिंह, उमा भारती, जसवंत सिंह और किन्हीं अर्थों में लौह पुरुष भी एक समय में कर चुके हैं. और तो और, कभी संघ के थिंक टैंक रहे (और अब दूध की मक्खी!) गोविन्दाचार्य भी ऐसे काफी काम कर चुके हैं जो संघ की निगाह में उसके लिए नुकसानदेह थे. सुदर्शन संघ जैसे ताकतवर संगठन के प्रमुख रहकर जो रुतबा और हनक भोग चुके हैं, उसकी ललक मन से आसानी से जाती नहीं है.बुढ्ढे हो गए, लेकिन देख रहे है कि उनसे भी ज्यादा बुढ्ढे अभी संगठन में मलाईदार पदों पर काबिज हैं, तो खीज होनी स्वाभाविक ही है.ग़ालिब ने यही तो कहा है कि--'' गो हाथ में जुम्बिश नहीं, आँखों में तो दम है. रहने दो अभी सागरो-मीना मेरे आगे !'' अटल बिहारी बाजपेयी को कितने दिनों से आपने देखा-सुना नहीं है? उनकी स्मरण-शक्ति ख़त्म बताई जाती है, वे अब घर से निकलने की स्थिति में भी नहीं हैं लेकिन वे भी भाजपा में शीर्ष पदाधिकारी हैं इन दिनों!
ऐसा नहीं है कि सुदर्शन ने किसी सनक में बयान जारी कर दिया है! बयान जारी करते ही उनकी उम्र बीती है.कैसा असर पाने के लिए कैसा बयान जारी करना चाहिए,ये उनसे बेहतर तो भागवत भी नहीं जानते होंगे! और बात जब सोनिया जैसी महिला की हो, तो सुदर्शन का बयान तो संघ का स्टैंड ही माना जाना चाहिए ! आखिर इससे पहले सुब्रमण्यम स्वामी औए सुषमा स्वराज आदि यही सब तो कह कर हटे हैं !सुषमा तो अपनी सुन्दरता और अपने धर्म की परवाह किये बगैर ही सर घुटाने तक की शर्त लगा चुकी थीं !
एक मुद्दत हो गयी थी सुदर्शन को लाईम-लाईट से लापता हुए.आखिर कब तक वे गुमनामी बाबा बनकर रहते? अब उनके लाइट में आने से संघ को तकलीफ होती है तो उनकी बला से ! सुदर्शन अगर कभी दुष्यंत को पढ़े होंगें तो मन ही मन गुनगुना रहे होंगें -- '' हर तरफ ऐतराज होता है, जब भी मैं रौशनी में आता हूँ !''

Wednesday, November 10, 2010

जानिए इन रंगे सियारों की हकीकत ! -- सुनील अमर

कश्मीर पर इन दिनों नए सिरे से कुछ हल्ला मचाने की कोशिश हो रही है. '' नील: श्रंगाल:'' की कहानी आपने पढ़ी है? वही जिसमे एक सियार का रंग नील से भरे बर्तन में गिर जाने के कारण जब बदल गया तो उसे ये भ्रम हो गया कि अब वह कोई सुपर-नेचुरल चीज हो गया है. बाद में उसी के भाई बंधुओं ने पीट-पीट कर उसकी अक्ल ठिकाने की, और वह फिर से अपने को सियार समझने लगा. देश में इन दिनों कुछ '' नील: श्रंगाल:'' निकल आये हैं और वे अपनी समझ से कुछ बहुत उम्दा किस्म की आवाजें निकल रहे हैं, लेकिन सबको पता है कि वे हुआं-हुआं ही कर रहे हैं. इतिहास गवाह है कि इस तरह का हुआना देर तक नहीं चलता. अंग्रेज चले गए, लेकिन कुछ काले अंग्रेज अब भी इस भ्रम में हैं कि कश्मीर पर वार्ता करनी हो या हिंदुस्तान की सरहद तय करनी हो, खुदाई फौजदार यही लोग हैं !
सब जानते हैं कि कश्मीर की समस्या भारत की वजह से नहीं, पाकिस्तान और पाकिस्तान परस्तों की वजह से है. कश्मीर का विलय भारत में कैसे और किन परिस्थितियों में हुआ, इस पर काफी श्रम-समय और साधन (यानि मीडिया ) खर्च किये जा चुके हैं. अब जिसे विलय का इतिहास पढ़ने का शौक हो , उसके लिए पर्याप्त load पुस्तकालयों में उपलब्ध है .विलय का इतिहास गिलानी और अरुंधती जैसों से पढ़ना तो ''नानी के आगे ननिहाल के बखान '' वाले मुहावरे जैसा ही है.
दुनिया में 200 के करीब देश हैं. आपको याद आता है कि कोई देश ऐसा हो जहाँ पूरी तरह से सुख-शांति और अमन-चैन हो? हिंदुस्तान के एकाध जिले जितने बड़े देश भी इस दुनिया में है,लेकिन वे भी अशांति और खूंरेजी से ग्रस्त हैं ! कश्मीर को आज़ाद करा कर जिनकी गोंद में उपहार स्वरुप डालने की कोशिश चंद '' नील: श्रंगाल:'' कर रहे हैं, उससे बदतर हालात अगर दुनिया में कहीं हो, तो ये सियार लोग ज़रा हुआं करके ही बताएं ! राष्ट्र विरोधी आन्दोलन चलाने के लिए ये जिन लोकतान्त्रिक देशों का हवाला देकर वहाँ से ऑक्सीजन प्राप्त कर रहे हैं,वहाँ भी शक के आधार पर गोली मार देने तथा जार्ज फर्नांडीज जैसे रक्षा मंत्री और शाहरुख़ खान जैसे सुपर स्टार की नंगी-तलाशी लेने का कार्यक्रम बाकायदा चलता रहता है, अब ये हो सकता है कि हुँवाने वालों को वहाँ कुछ छूट मिली हुई हो !
एक नया शिगूफा छोड़ा जा रहा है कि इस देश में अभी ''राष्ट्र'' की समझ विकसित नहीं हो पाई है! इनका मतलब है कि कश्मीर में जो सेना-पुलिस द्वारा हिंसा की जा रही है, वह एक राष्ट्र का परिचायक नहीं है, हम पूछते हैं कि ब्रिटेन, अमेरिका, श्रीलंका, नेपाल और खुद पाकिस्तान में क्या हो रहा है, दुनिया के और देशों की बात छोड़ ही दीजिये ! राष्ट्र तो है ही हिंसा का पर्याय ! जब आप राज्य की कल्पना करते हैं तो क्या वह हिंसा के बिना संभव है? जब आप किसी भी राष्ट्र-राज्य में रहने का निर्णय करते हैं, तो आप उसकी न्यूनतम-अधिकतम हिंसा को भी कबूल करते हैं, जिसे वह अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए प्रयोग करता है. परिवार को एक रखने के लिए घर का मुखिया भी तमाम यत्न करता ही है. और अगर कश्मीर की जनता अलग होने पर उतर ही आयेगी तो एक नहीं सौ हिंदुस्तान भी अपनी फ़ौज-फाटा लेकर उसे रोक नहीं पाएंगे ! जिनके राज में सूरज नहीं डूबता था, उंनसे लड़ कर एक नंगे फकीर ने हिंदुस्तान को आजाद करा लिया था, क्योंकि जनता भी ऐसा चाहने लगी थी ! लेकिन ये सब क्रांतिकारियों के बल पर होता है, khadyantrakariyon के बल पर पर नहीं !
किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में यदि परिवर्तन करना हो, तो जनता-जनार्दन से अनुमति लेकर आप सही जगह पहुँचिए और फिर अपने विजन का इस्तेमाल करिए. लेकिन यह पैर का पसीना सर चढ़ाने वाला काम है, इतना आसान नहीं की कहीं से फंडिंग होती रहे और हवाई दौरे होते रहें. बीच-बीच में हुँवाने का काम भी होता रहे !
कई बार शक होता है कि कहीं यह भगवा ब्रिगेड की माया से तो नहीं हुंवा रहे हैं ? जिन लोगों ने राम को बेंच लिया, राम-मंदिर को बेंच लिया और अपने वर्तमान को भी बेंच खाए, उन्हें अब कश्मीर ही शायद बढ़िया दुकान दिख रही हो ! किसी तरह तो मुसलमान बरगलाये जाएँ ! कोर्ट के फैसले से तो मुसलमान लड़े नहीं, कश्मीर अलग कराने के नाम पर ही शायद लड़ पड़ें ! तीनों का भला हो जाये-- सपा,भाजपा और पाकिस्तान का ! '' नील: श्रंगाल:'' की तो पांचो घी में औए सर कढ़ाई में है ही ! और सबसे बड़ा मदारी तो कांग्रेस है , जिसने चादर फैला दी है और अब निगाह लगाये खामोश बैठी है कि देखें अपने हिस्से में कितना आता है !!

Tuesday, November 09, 2010

अमीरी बढ़ रही तो गरीबी क्यों नहीं घटती -- Sunil Amar in Rashtriya Sahara 10 Nov.2010

देश के गरीब इन दिनोंे राजनेताओं के फोकस पर है। क्या सत्तापक्ष और क्या विपक्ष, सबकी एक ही चिंता है कि गरीबों के लिए ज्यादा से ज्यादा क्या किया जा सकता है। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी तो खैर एक अरसे से देश के गरीबों को जानने-समझने के अपने अभियान पर है ही, अब उनके चचेरे भाई और भाजपा सांसद वरुण गांधी भी गरीबों की चिंता में दुबले होने शुरू हो गये है। यह चिंता एकाध बार तो बड़ी विरोधाभासी भी हो रही है, जब सरकार की तरफ से मोंटेक सिंह अहलुवालिया जैसे बड़े मुंह भी अचानक खुल जाते है। सरकारी योजनाओं में गरीबों के उत्थान की लगातार चर्चा है, तो गैर सरकारी स्तर पर तमाम संगठन इस बात का कयास लगा रहे है कि देश के इतने तीा- गति और विस्मयकारी विकास तथा करोड़ों टन अनाज फालतू (यानी सड़ने के लिए मौजूद) होने के बावजूद गरीबों और भुखमरों की संख्या क्यों बढ़ती जा रही है? देश में किस तरह की आर्थिक नीतियोंे को हमने अपनाया है, इसे दो रपटों से आसानी से समझा जा सकता है। पहली रपट जस्टिस अजरुन सेनगुप्ता आयोग की है जिसने लगभग दो वर्ष पूर्व यह खुलासा किया था कि देश में कुल 83 करोड़, 60 लाख लोग ऐसे है जिनकी औसत दैनिक कमाई मात्र 9 रुपये से लेकर 20 रुपये की ही है। दूसरी रपट नेशनल कौसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च की है जिसने मार्च 2010 तक के दस वषोर्ं का अध्ययन कर गत दिनों एक तथ्य उजागर किया है कि मध्य वर्ग से छलांग लगाकर उच्च वर्ग में प्रवेश करने वालों की संख्या में चार गुने की अभूातपूर्व वृद्धि हो गई है। इस आंकड़ेबाजी का सीधा सा मतलब यह हुआ कि देश मेंे गरीब और गरीब हुआ है, तो अमीर और अमीर हुए है। दरअसल हमारी आर्थिक नीतियां ही ऐसी है कि उनसे पहले तो गरीब पैदा होते है, फिर उनको दांये-बांयें से मदद पहुंचाकर सरकार गरीब बनाकर रखती है। एक और उदाहरण देखिये - केंद्र की संप्रग सरकार ने फरवरी 2006 में रोजगार सम्बंधी दुनिया की सबसे अनोखी और एकमात्र योजना राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना प्रारम्भ की। सभी जानते है कि इसमें वर्ष में 100 दिनों का सुनिश्चित रोजगार या फिर भत्ता सरकार देती है। सरकार का मानना था कि ऐसा हो जाने से गांव के बेरोजगारों को घर पर ही रोजगार मिल जाएगा तथा देश के अन्य राज्यों की तरफ उनका पलायन भी रुक सकेगा। नि:संदेह ऐसा हुआ भी है, लेकिन अब एक बड़ा प्रश्न यह भी आ खड़ा हुआ है कि साल के बाकी 265 दिन ऐसे लोग क्या करें? क्योंकि स्थानीय स्तर पर उन्हें दूसरा कोई रोजगार सुलभ नहीं होता। नरेगा का कार्य ऐसा भी नहीं है कि पात्र लोगों को सौ दिन इकट्ठे ही मिल जाता हो और फिर वे किसी अन्य काम की तलाश में कहीं और जा सकें। लिहाजा ऐसे लोग सौ दिन के काम के चक्कर में पूरा साल बिता देते है। इस प्रकार नरेगा, जो कि अब महात्मा गांधी नरेगा कही जाती है, में एक व्यक्ति की औसत दैनिक आमदनी 30 रुपये से भी कम पड़ती है। इस योजना के साथ अगर यह सोचा गया होता कि ऐसे बेरोजगारों को उनके क्षेत्रों में कुटीर-उद्योग स्थापित कर उन्हें पार्ट टाइम कार्य करने की सहूलियत भी दी जाय तो यह औसत दैनिक आमदनी कम से कम सौ रुपये प्रतिदिन की जा सकती थी। कुटीर उद्योगों की स्थापना में असमर्थता के चलते ऐसे लोगों को गाय-भैस, बकरी पालन, कुक्कुट पालन, आदि छोटे-मोटे स्व-रोजगार करने को मदद दी जा सकती है, लेकिन यहां फिर वही नीतिगत बाधाएं आ जाती है कि सरकार ऐसे गरीबों को तो गाय-भैस पालने को कर्ज देगी और सारी सरकारी सहूलियत डेयरी कम्पनियों को दे देगी! इसका सबसे घातक नतीजा यह होता है कि ऐसे गरीबों और बड़ी कम्पनियों के बीच ग्राहक और बाजार को लेकर रस्साकसी छिड़ जाती है। नतीजा सबको पता है!

सरकारें शायद ही कभी इस तरह के तर्को को संज्ञान में लेती हों कि आखिर जिस रफ्तार से अमीरों की अमीरी बढ़ रही है उसी रफ्तार से गरीबों की गरीबी क्यों नहीं कम हो रही है। एक तरफ अजरुन सेनगुप्ता आयोग की रपट कहती है कि लगभग 85 करोड़ लोगों की दैनिक आमदनी 20 रुपये से भी कम है, तो दूसरी तरफ योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया कहते है कि गांवों में अमीरी बढ़ रही है, इसलिए महंगाई पर काबू नहीं पाया जा रहा है! ऐसे में चाहिए तो यह कि या तो राहुल गांधी मोंटेक सिंह से जानकारी प्राप्त करने के बाद ही गांव और गरीबों के अभियान पर निकलें या फिर अहलुवालिया ही राहुल गांधी द्वारा गरीबों के बीच रहकर हासिल किये गये तजुब से कोई सबक लेकर अपना मंतव्य जाहिर किया करें। साधन होने भर से ही साध्य हासिल नहीं हो जाता। साधन के साथ-साथ सलाहियत भी होनी चाहिए
गरीबों की गरीबी दूर करने के तमाम प्रयास सरकारें करती हैं, लेकिन लाभ वे लोग उठा लेते हैं जिनके पास संसाधन होते हैं. इसे ऐसे समझा जा सकता है की देश में लम्बे समय से जातिगत आरक्षण व्यवस्था लागू है लेकिन इसका सर्वाधिक लाभ वे लोग ही उठा रहे हैं जिनके पास ऐसे संसाधन यानि क्षमता मौजूद हैं. आखिर यही कारण तो है की सरकार इनमे से हमेशा क्रीमी लेएर छांटने की बात करती रहती है. सरकार गरीबों की एक पक्षीय मदद करती है, यही कारण है कि गरीबी ख़त्म नहीं होती.मसलन गरीबों को छोटे-छोटे कर्ज काम ब्याज पर देकर ही सरकार आपने कर्तब्यों कि इतिश्री समझ लेती है. उनके उत्पादों के लिए बाज़ार और वहाँ कि गलाकाट प्रतियोगिता के लिए संरक्षण भी चाहिए, इससे वह कोई मतलब ही नहीं रखती! किसान आत्महत्याएं क्यों कर रहे हैं? सरकार कि मेहरबानी से पहले तो बाजार में हाईब्रिड बीज आ जायेंगें, और जब किसान उनसे अधिक मात्र में पैदावार कर लेगा, तो बाजार भाव ईतना गिर जायेगा कि उसका न बेचना भला! आखिर बाजार पर नियंत्रण रखना किसकी जिम्मेदारी है? हो सकता ही कि किसी दिन मोंटेक सिंह यह भी कह दें कि भारतीय खाद्य निगम के भंडारों में जो 7000 टन अनाज सडा है (जैसा कि भारत के अतीरिक्त सालिसिटर जनरल मोहन परसन ने गत दिनों सर्वोच्च न्यायलय में बयान दिया ) वह भी किसानों के ज्यादा अनाज पैदा कर देने के कारण सडा है !
दुनिया के हर देश में गरीब हैं, लेकिन जो बिसंगति भारतीय ग़रीबों के साथ है, वह अन्यत्र दुर्लभ है! पाकिस्तान बगल में ही है लेकिन उसकी गरीबी और दुर्व्यवस्था पर किसे हैरत होती है? किन्तु भारत में, जहाँ आमिर लोग साल भर में 2 लाख 50 हजार करोड़ रुपया भगवानों कि पूजा पर खर्च करते हों ( ध्यान रहे कि मनरेगा का पूरे देश का साल भर का बजट सिर्फ़ एक लाख करोड़ का ही है!), जहाँ 25 करोड़ लोग रोज भूखे सो जाते हों लेकिन 7000 टन अनाज यूँ ही सड़ जाता हो, जहाँ 78000 करोड़ रुपया एक झटके में ही कामनबेल्थ खेलों पर लुटा दिया जाता हो,और जहाँ 45000 करोड़ रुपया इंडियन एयर लाईन्स को घटे से उबरने के लिए दे दिया जाता हो ताकि आमिर लोग सस्ती हवाई यात्रायें कर सकें, वहां जब ऐसी रपटें आती हैं कि गरीब और गरीब ही नहीं बल्कि भुखमरी के कारण भी मर रहे हैं तो व्यवस्था पर अचरज नहीं क्रोध आता है, और क्रोध राहुल, वरुण और अहलुवालिया सरीखे मुन्गेरिलालों पर भी आता है ..
(Sunil Amar in Rashtriya Sahara Delhi on 10 Nov. 2010)

अब मीडिया पर स्यापा क्यों !--- Sunil Amar


अंग्रेजी की ख्यातिलब्ध लेखिका , सामाजिक कार्यकर्त्री (और साथ ही साथ अभिनेत्री भी !) सुश्री अरुंधती रॉय के घर पर एक राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया और जैसा कि रॉय कह रही हैं कि उन लोगों ने तोड़ - फोड़ भी की. उन्होंने सबूत के तौर पर एक फोटो भी ऊपर लेख में लगाया हुआ है , जिसमे मिटटी की एक हँड़िया टूटी हुई दिख भी रही है.हालाँकि कोई भी उस हँड़िया को देख कर कह सकता है कि वह तोड़ने से नहीं बल्कि गिर कर टूटी हुई ज्यादा लग रही है .खैर ! रॉय ने तोड़ - फोड़ और मीडिया द्वारा इस उपद्रव की अडवांस कबरेज की तैयारी , दोनों की निंदा तुरंत ही की. लेकिन अगले ही दिन से वे सिर्फ़ मीडिया पर फोकस हो गयीं, उन्होंने फैसला कर दिया कि मीडिया अब अपराध का औजार बन गया है. उनकी बड़ी भोली सी शिकायत है कि मीडिया को सब पता था कि कुछ लोग प्रदर्शन के बहाने तोड़-फोड़ करने आ रहे हैं, लेकिन मीडिया ने उन्हें पूर्व सूचना क्यों नहीं दी !
कोई राबड़ी देवी सरीखी महिला ऐसा भोलापन दिखाए, तो हंसी और तरस , दोनों एक साथ आ सकता है.आनी तो नही चाहिए , लेकिन अज्ञानता पर कभी-कभी बेसाख्ता हंसी आ ही जाती है, भले लोग बाद में पछताते भी हैं, तो क्या अरुंधती इतनी अज्ञानी हैं, कि उन्हें मीडिया के दायित्वों और क्रियाकलापों के बारे में कुछ भी पता नहीं है ? क्या मीडिया का काम यही है कि वह अपनी जानकारियों को अपने अख़बार या चैनल में इस्तेमाल करने से भी पहले भोंपू लगाकर चारों तरफ बाँट दे ? फ़र्ज कीजिये कि पुलिस किसी खूंखार अपराधी को पकड़ने जा रही है,और किसी अख़बार वाले को यह पता है तो उसका क्या फ़र्ज बनता है कि वह उस अपराधी को सचेत कर दे कि भाई निकल लो ,पुलिस आ रही है ? तमाम घटनाएँ ऐसी होती हैं, जहाँ पहले से ही मीडिया वाले अड्डा लगा कर बैठ जाते हैं. तो क्या यह बंद हो जाना चाहिए ? या अरुंधती रॉय ऐसा कोई कायदा सिर्फ़ अपने लिए चाहती हैं, कि उनके घर पर कोई प्रदर्शन होना हो, गिरफ़्तारी होनी हो या उनकी मर्जी के खिलाफ कोई बात होनी हो तो मीडिया का कुत्ता पहले ही भौं-भौं करके उन्हें सचेत कर दे ? आप जंग लड़ कर फतह का तमगा भी हासिल करना चाहती हैं और चाहती हैं कि धूल तक न लगे ! हिंदी तो आपको नहीं आती होगी फिर भी किसी से पाठ कराकर श्रद्धेय भगवती चरण वर्मा कि मशहूर कहानी -- दो बाँके -- सुन लीजिये !आप जैसे लोगों के लिए ही लिखा है उन्होंने. नक्सलियों और आदिवासियों जैसों चिरकुटों के बीच रहकर यह महारानियों वाली ठसक कहाँ से आ गयी आपके स्वभाव में ? या यही हकीकत है ? या अब आप अपनी निगाह में ऐसी शख्सियत बन गयी हैं कि हिंदुस्तान के मीडिया को आपका पी. आर . ओ. बन कर ख़ुशी महसूस करनी चाहिए !
मीडिया पेड न्यूज़ छाप रहा है, मीडिया अपराध का औजार बन गया है, मीडिया हर प्रकार से भ्रष्ट बन गया है, मीडिया बड़े लोगों का भोंपू बन गया है, ये सारी गालियाँ कबूल कर ली जाएँगी बस आप इतना भर बता दीजिये कि समाज के किस हिस्से को आपने आदर्श पैमाना मन कर मीडिया वालों को इतनी बेरहमी से नापा है ? सुश्री अरुंधती रॉय ! जिस प्रकार बड़ी पूँजी बिना अपराध के इकठ्ठा नहीं होती, उसी प्रकार बड़े मीडिया तंत्र भी गंगाजल से धुले रुपयों से नही खड़े किये जाते, और इन्ही बड़े मीडिया तंत्र में आपकी जान बसती है, क्योंकि यही आप जैसों को अरुंधती रॉय बनाते हैं, आप बाई-काट क्यों नहीं कर देती इस अपराधी मीडिया का ! आमीन !!

Sunday, November 07, 2010

आखिर चाहती क्या हैं अरुंधती राय ? sunil amar

'' अरुंधती राय को पढ़ने,जानने और उनकी हालिया गतिविधियाँ देखने के बाद अक्सर यह सवाल मन में आता है कि क्या वे दिग्भ्रमित हो गयी हैं ? उनकी पुस्तक ' द गाड ऑफ़ स्माल थिंग्स ' जिसे बुकर पुरस्कार मिला था, से पहले उन्हें लेखन ,समाज सेवा या अभिनय आदि हलकों में कोई जानता नहीं था .बुकर के बाद वे अचानक एक्टिविस्ट हो गयी ,अभिनेत्री हो गयी और इधर कुछ वर्षों से उन्होंने राष्ट्र,संप्रभुता , अखंडता और संविधान आदि पर नुकसान पहुँचाने वाला हमला बोलना शुरू कर दिया है .अरुंधती , जब नक्सलियों की हिमायत करती थी, तो उनके प्रति सहज आदर उत्पन्न हो जाता था कि वे शोषितों ,मजलूमों और बेदखल लोगों की लडाई को अपने रसूख और रुतबे की मदद दे रही हैं,और इक्त्फाक से हमारे हुक्मरान जिस जुबान को पढ़ते - समझते हैं , अरुंधती उसी भाषा में लिखती है !और ये भी कि, वे जिस जुबान की प्रोडक्ट हैं, उस जुबान के अख़बार और पत्रिकाएं उन्हें सर -माथे लेती हैं .
लेकिन ये सब बड़ी धीमी गति से प्रतिफल देने वाली क्रियाएं हैं ! उन्हें तो रातों-रात शोहरत की बलंदी चाहिए ,जिसकी कि उन्हें बुकर ने आदत डाल दी थी ! अब बुकर जैसे शाहाकार तो रोज हो नहीं सकते , उसके लिए खून - पसीना जो एक करना पड़ता है , वो तो है ही, उससे भी ज्यादा खून- पसीना उस जुगाड़ में लगाना पड़ता है , जो बुकर दिलाता है .और बुकर की भी तो एक सीमा है. भारत जैसे देश में बुकर और मैग्सेसे को जानने वाले कितने हज़ार लोग होंगे भला ! इससे वह प्यास नहीं मिटती जो बुकर और अंग्रेजी मीडिया ने जगा दी ! वो जैसा अभिनय करती हैं , उसका भी दायरा बुकर जैसा ही है. यह बताने की जरूरत नहीं कि देश में कैसी हीरोइनों को लोकप्रियता मिलती है !
तो फिर लोकप्रियता कि भूख मिटे कैसे ? जाहिर है उलटवांसी करके ! बहुत से लोग चर्चा में आने के लिए ऐसा ऊट-पटांग करते ही रहते हैं- पढ़े - लिखे भी और मूर्ख भी . अभी पिछले ही साल तो हमने देखा , कि जसवंत सिंह ने नरसिम्हाराव के कार्यकाल में पीएमओ में सीआईए का जासूस होने की बात कही थी और प्रमाण देने को भी कहा था . जब उनकी खासी चर्चा हो गयी , तो वे प्रमाण देने से साफ मुकर गए .ऐसी कई कथाएं हैं इस देश में ! अरुंधती को भी ऐसा ही शार्ट-कट चाहिए ! पहले वे नक्सलियों पर लगीं , लेकिन नक्सलियों और भुक्खड़ आदिवासियों को समाज का वह तबका कोई भाव ही नहीं देता , जिस सोसायटी को वे बिलोंग करती हैं.आप सबमे से कोई बताये कि नक्सलियों - आदिवासियों पर काम करने से आज तक किसे और कौन सा पुरस्कार मिला है ?गोली के अलावा ! तो फिर ऐसा कोई मुद्दा होना चाहिए जिस पर समाज का प्रभु - वर्ग अस -अस कह उठे ! यह मुद्दा हो सकता है -- शासन -सत्ता -संविधान और भगवान को गरियाने का .
अरुंधती राय तो कश्मीर को इस देश का हिस्सा नहीं मान रही हैं ( कुछ दिन पूर्व उन्होंने अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक में भी सबसे बड़ा लेख ऐसा ही लिखा था , जैसा अभी वे बोली हैं , लेकिन उनकी वो कोशिश परवान नहीं चढ़ सकी .) कश्मीर को अलग कराने के उनके अभियान का यह ताज़ा प्रयास है . इस तरह के अभियान का एक फायदा उन्हें यह भी मिल जाता है कि पाकिस्तान और अमेरिका तथा अमेरिका के कुछ पिछलग्गू देशों में भी वे चर्चा में आ जाती हैं ! लेकिन अरुंधती जैसी सोच रखने वाले अन्य लोगों को भी एक बात समझ लेनी चाहिए कि उन्ही की सोच वाले कई भाई - बन्धु ऐसे भी हैं जो इस देश का ही अस्तित्व मिटाने की कसम खाए बैठे हैं,और कामयाब नहीं हो रहे हैं ! किसी भी लोकतान्त्रिक देश में संसद से बड़ी जगह और क्या हो सकती है ? अलगाववादियों और आतंकवादियों ने उस पर भी हमला करके देख लिया . क्या बिगाड़ लिए वो भारत नामक इस देश का ?
अरुंधती की योजना एक बार गिरफ्तार होने की है , ऐसा मंतव्य वे कई बार प्रकट भी कर चुकी हैं .नक्सलियों के मुद्दे पर उन्होंने कहा ही था कि चाहे पुलिस उन्हें गिरफ्तार ही कर ले ! दरअसल वे नेताओं की जुबान बोलती हैं , वैसे ही जैसे कि मुलायम सिंह , मुख्यमंत्री मायावती से कहते हैं या मायावती मुख्यमंत्री मुलायम सिंह से कहती हैं ! वे सब जानते हैं कि गिरफ्तार तो होना ही नही है ,और अगर हो भी गए तो बे-शुमार फायदा मिलेगा ! अरुंधती भारत के प्रभु-वर्ग से सम्बन्ध रखती हैं , ये लोग जल्दी गिरफ्तार नहीं होते , होते भी हैं तो सोच-समझ कर , नफा- नुकसान का गुणा - भाग करके ! इनकी बातों को वैसे ही छोड़ देना चाहिए जैसे विभूति राय जैसे छिनरों को .कुछ दिन में ये अपनी गति को पहुँच ही जाते हैं !