Friday, May 02, 2014

ज्यादा गंभीर हैं महिलाओं की सुरक्षा के सवाल ---- सुनील अमर


र्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त जज, एक स्वनामधान्य पत्रकार तथा एक विश्वविद्यालय के विधि विभाग के चेयरमैन के उपर युवतियों से यौन उत्पीड़न अथवा बलात्कार के आरोप इन दिनों चर्चा में हैं। जॉच कमेटी ने उक्त जज को प्रथम दृष्टया दोषी पाया है, पत्रकार न्यायिक हिरासत में हैं और पुलिस उन्हें रिमांड पर लेकर उनकी मेडिकल जाँच व अन्य परीक्षण कर रही है तथा विधि विभाग के चेयरमैन को विश्वविद्यालय प्रशासन ने निलम्बित कर दिया है। बड़ा जज, बड़ा पत्रकार और बड़ा प्रोफेसर, ये समाज के आधार स्तम्भ माने जाते हैं और इन पर इस तरह के संगीन आरोप इशारा करते हैं कि समाज का कैसा विचलन हो रहा है। उक्त प्रकार के मामलों के बाद यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर औरतें सुरक्षित कहाँ हैं? जज के मामले में युवती 'लॉ इंटर्न' है, पत्रकार के मामले में युवती उसी संस्थान में पत्रकार है तथा प्रोफेसर के मामले में युवती एल.एल.एम. की छात्रा है। ये तीनों युवतियाँ कानून-कायदे को जानने वाली तथा खुदमुख्तार हैं, इसीलिए यौन उत्पीड़न के ये मामले प्रकट हो गए।
               किसी मामूली या शोहदे किस्म के व्यक्ति की अपेक्षा जिम्मेदार पद पर बैठे लोगों द्वारा की गई बलात्कार या छेड़छाड़ की घटना कहीं ज्यादा चिंता पैदा करती है। ये ताजा घटनाऐं बताती हैं कि ऐसे अपराधा महज अनपढ़ या गलत सोहबत में रह रहे लोगों द्वारा ही नहीं किये जाते बल्कि खूब पढ़े-लिखे, मुल्क के कायदे-कानून को जानने-समझने वाले तथा ऐसे कृत्यों के परिणाम से वाकिफ लोगों द्वारा भी किये जा रहे हैं। उपर्युक्त मामलों से पता चलता है कि ऐसी घटनाओं को उजागर करने में जितना लड़की के माँ-बाप का हाथ होता है उतना ही लड़की के पढ़े-लिखे और जागरुक होने का। गत सप्ताह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के गुड़गाँव शहर में अपनी मॉ के साथ जा रही एक लड़की पर मोटरसायकिल सवार दो युवकों ने फब्तियाँ कसीं। माँ-बेटी ने तत्काल पुलिस थाने जाकर युवकों की शिनाख्त बताते हुए शिकायत दर्ज करायी और पुलिस ने तुरन्त ही उन दोनों को धार दबोचा। ऐसे मामलों में अदालती सक्रियता बढ़ने के बाद अब पुलिस भी टालमटोल के बजाय कार्यवाही करने लगी है। राष्ट्रीय अपराधा रिकार्ड ब्यूरो के ताजा ऑंकड़े बताते हैं कि जहाँ गत वर्ष जनवरी से अगस्त तक के आठ महीने में दिल्ली में बलात्कार के कुल 468 मामले दर्ज किए गए थे वहीं इस साल इस अवधि में 1121 मामले दर्ज किए गए हैं। यह लगभग तीन गुना की बढ़ोत्तरी इस बात का संकेत है कि अब ऐसे मामलों को छिपाने के बजाय लोग कानून के दायरे में लाने को तैयार हो रहे हैं।
              सवाल यह है कि स्त्रियों के प्रति ऐसे हिंसक व्यवहार की जड़ें कहाँ हैं। यौन शोषण के मामलों पर निगाह डालें तो यह एक आदिम प्रवृत्ति लगती है लेकिन जैसे-जैसे मनुष्य का सामाजिक और मानसिक विकास होता गया, ज्ञान-विज्ञान के साधान उन्नत होते गए, वैसे-वैसे अपेक्षा यह हुई कि लैंगिक और नस्लीय भेदभाव को भूलकर लोग ज्यादा उदार और सह अस्तित्व वाला समाज बनाएंगें। लेकिन यौन अपराधों के मामले में आम आदमी से लेकर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति द्वय- जॉन केनेड़ी और बिल क्लिंटन तक सब एक जैसी मानसिकता के ही लगते हैं। इसी क्रम में एक और चिंतनीय खबर इलाहाबाद उच्च न्यायालय उत्तर प्रदेश की लखनऊ बेंच से आई है जहाँ प्रैक्टिस कर रही कई महिला अधिवक्ताओं ने न्यायालय में अपील की है कि बहुत से पुरुष वकील उनके साथ यौन दुव्यवहार करते हैं। महिला अधिवक्ताओं ने शिकायत की है कि कुछ पुरुष वकील न सिर्फ उनसे अश्लील और भद्दे मजाक करते हैं बल्कि कोर्टरुम में भी उनके बगल बैठकर उन्हें आपत्तिजनक ढ़ॅंग से छूते हैं। अपील में कहा गया है कि महिला वकीलों को ऐसे पुरुष वकील प्राय: अपने मोबाइल फोन पर अश्लील फिल्में या वीडियो क्लिप दिखाने की कोशिश करते हैं और महिलाऐं विरोधा करने की स्थिति में भी नहीं होतीं। अपील कहती है कि यह तो उच्च न्यायालय परिसर का हाल है। निचली अदालतों में तो महिला वकील और भी बुरी हालत में हैं। संतोषजनक है कि उच्च न्यायालय ने मामले में तत्काल कार्यवाही करते हुए शिकायतों की जाँच के लिए रजिस्ट्रार की अध्यक्षता में एक कमेटी भी गठित की है तथा एक अधिकारी नियुक्त किया है जो महिला वकीलों तथा कोर्ट परिसर में आने वाली महिलाओं की ऐसी शिकायतों को पंजीकृत करेगा।
              समाज में आए त्वरित बदलाव के कारण आज पहले से कहीं ज्यादा संख्या में महिलाऐं घरों से बाहर निकल रही हैं और इस वजह से कहीं पद और प्रभाव की आड़ में पुरुष उनका यौन शोषण करता है तो कहीं शारीरिक ताकत के बल पर। हमारे समाज की ये कैसी विडम्बना है कि बलात्कारी तो सरेआम घूमता है और उसे पहले जैसी सामाजिक स्वीकृति मिली रहती है जबकि बलात्कृत स्त्री को लोग न सिर्फ उपेक्षा की निगाह से देखते हैं बल्कि उसे ही उस अपराधा की जड़ भी मानते हैं। खाप पंचायतों के दृष्टिकोण को इसी प्रसंग में देखा जाता है जहाँ या तो बलात्कार की कीमत देने की बात की जाती है या फिर कई मामलों में तो स्त्री को अपने बलात्कारी से ही शादी करने को भी मजबूर किया जाता है! देखने में यही आ रहा है कि ऐसे मामलों में सभी पुरुष प्राय: एक जैसी अपराधी सोच के ही होते हैं। तहलका के पूर्व सम्पादक तरुण तेजपाल ने पहले तो कहा कि उनसे गलती हुई है और उन्होंने अपनी ही पत्रिका के सम्पादक पद से इस्तीफा भी दिया लेकिन बाद में उन्होंने वे सारे पैंतरे अपनाए जो कथावाचक आसाराम ने अपनाए थे। जो बार-बार हो, वह गलती कैसे हो सकती है? जैसे कि आरोप हैं- आसाराम ने कई बार यौन उत्पीड़न किया, तरुण तेजपाल ने भी पीड़ित लड़की का एकाधिक बार यौन शोषण किया, पूर्व न्यायाधीश ने भी कई लड़कियों के साथ दर्ुव्यवहार किया और उक्त प्रोफेसर ने भी। प्रोफेसर तो पहले भी एक अमेरिकी छात्रा से यौन दुव्यवहार में निलम्बित किए गए थे। यह इन सबकी गलती है या इनका चरित्र?
              हमारे समाज की संरचना और मान्यताऐं ऐसी हैं कि पुरुष जघन्य अपराध करके भी न सिर्फ अपने रुतबे पर कायम रहता है बल्कि कई मायने में उसकी हनक और बढ़ भी जाती है। अपने कुकर्मो में सफल न होने पर पुरुष प्राय: औरतों को डायन और चुड़ैल बताकर उनका जानलेवा उत्पीड़न करते हैं ताकि उनका मनोबल टूट जाय और वे समर्पण कर दें तथा अन्य औरतों को नसीहत मिल जाय कि पुरुषों का विरोधा करने पर उनका भी यही हाल होगा। समाज में पुरुष निर्णायक स्थानों पर काबिज हैं। स्त्री की मजबूरी है कि वह अपने स्थान पर बने रहने या आगे बढ़ने के लिए इन पर निर्भर होती है और इनमें से अधिकांश पुरुष उसकी इस स्थिति का नाजायज लाभ उठाते हैं। यह अराजकता कितनी घातक हो गई है कि महिलाऐं एकांत ही नहीं भीड़भाड़ वाली जगहों पर भी इसकी शिकार हो रही हैं। आखिर तभी तो न सिर्फ महिलाओं के लिए देश के कई शहरों में महिलाओं द्वारा चलाई जाने वाली टैक्सी शुरु की गई हैं बल्कि अभी तो गत माह महिलाओं के लिए अलग से बैंक भी शुरु कर दिया गया है! यह बचाव का रास्ता है, समस्या का निर्मूल करने का नहीं। समस्या तो दृष्टिकोण में ही है। उसे बदलने के कोई प्रयास किए ही नहीं जा रहे हैं, उल्टे स्त्री को खरीदने योग्य वस्तु के रुप में ही पेश करने की कोशिशें परवान चढ़ाई जा रही हैं। यह स्त्री समाज के साथ हो रहा सतत् धोखा है।  0 0 

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