Friday, March 25, 2011

भूमंडलीकरण के ख़तरे --- सुनील अमर

बीती सदी के उत्तरार्ध्द में हम अगर तेजी के साथ भूमंडलीकरण की तरफ बढ़े थे तो इस सदी के शुरुआती दशक से हम वैश्विक गाँव का आनन्द उठाने लगे हैं। वैचारिक समरसता ही नही, बल्कि रहन-सहन और खान-पान में भी हम विश्व बिरादरी का अंग बने हैं। पढ़ाई-लिखाई और कार्य-व्यापार का क्षेत्र सारी धरती पर फैल जाने के कारण ऐसा लगने लगा कि 'प्लानेट अर्थ' के हम सभी निवासी अब एक ही हैं। इस लिहाज से अगर हम सभी सुख और लाभ में भागीदार होते हैं तो निश्चित ही विपत्ति में भी सहभागी होना पड़ेग़ा। गत सप्ताह जापान में आई लघु प्रलय ने कम से कम यही संदेश दिया है। उस विनाशकारी भूकंप और जल-प्रलय के छीटे अपने देश तक पड़ने की आशंकाऐं तो व्यक्त की ही जा रही हैं, लेकिन शेयर मार्केट जैसे व्यवसाय और दैनिक जीवन की अन्य गतिविधियों पर तो उसका असर तत्क्षण ही पड़ना शुरु हो गया है। यह कहना असंगत न होगा कि आज एक देश की जलवायु भी दूसरे देश पर असर डालने लगी है।

जापान में जो त्रासदी आई हुई है, ऐसी कोई भी प्राकृतिक आपदा दूसरे देषों के व्यापार को ही सबसे पहले प्रभावित करती है। अपने देश में भी एक तरफ हताहतों पर दु:ख और अफसोस जताने के साथ-साथ मदद भेजने की तैयारियाँ हो रही हैं और दूसरी तरफ इस बात के ऑकलन भी किये जा रहे हैं कि वहाँ और यहाँ मिलाकर अपना कितना नुकसान हो रहा है। यहॉ यह समझने की बात है कि भूमंडलीकरण का मुख्य उद्देश्य ही आर्थिक है। बाकी जो कुछ भी सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक या नैतिक-अनैतिक वहॉ से आया या आ रहा है वह इस आर्थिक अभियान की पीठ पर सवार होकर ही आ रहा है। विनाश की पहली खबर के साथ ही यह ऑंकलन देश की मीडिया में आने लगे थे कि जापान में पुनर्निमाण व नवनिर्माण के कार्यों में भारत को काफी बड़ा व्यवसाय मिल सकता है! ये आर्थिक उद्देश्य अगर खत्म कर दिये जाँय तो यकीन मानिये भूमंडलीकरण वापस 30 साल पहले की स्थिति में पहुँच जाय।

इसमें कोई सन्देह नहीं है कि भूमंडलीकरण ने ज्ञान-विज्ञान और रोजगार के असीमित अवसर उपलब्ध कराये हैं। लेकिन इसे लिप्सा ही कहा जाना चाहिए, क्योंकि देश के कार्य-व्यापार तो भूमंडलीकरण से पहले भी चल ही रहे थे। विश्व का शायद ही कोई ऐसा विकसित या विकासशील देश हो जहॉ भारतीय अच्छी-खासी संख्या में न हों। अभी मिस्र और लीबिया आदि देशों में चल रहे सत्ताविरोधी आन्दोलनों के कारण वहॉ संकट में फॅसे भारतीयों को लाने का सिलसिला चल ही रहा है कि इसी बीच जापान में हुई भयानक त्रासदी ने एक और संकट हमारे सामने खड़ा कर दिया। जापान में लगभग 25,000 भारतीय रहते हैं।

अब इधर जैसी कि खबरें आ रही हैं, जबर्दस्त भूकम्प और भयानक समुद्री तूफान यानी सुनामी आने के कारण जापान में भारी तबाही हुई है और जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। परमाणु रिएक्टर्स उड़ गये हैं और विद्युत व्यवस्था चरमरा गई है। इसकी वजह से उत्पादन भी ठप हो गये हैं। अपने देश में मीडिया बता रहा है कि कार, मोटर सायकिल, मशीनरी सामग्री, तथा दवा आदि की आपूर्ति पर भारी असर आने वाले दिनों में पड़ने वाला है। यह भूमंडलीकरण और अर्थ-प्रधान विचारधारा की देन है कि अब बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने कारखानों के तमाम हिस्सों को एक स्थान पर न लगाकर उन अलग-अलग देशों में लगाती हैं जहॉ वैसे उत्पादों के लिए सुविधा व रियायतें हों। मसलन अगर कोई जापानी कम्पनी भारत में कार बनाने का कारखाना लगाये हुए है तो इसका मतलब यह हरगिज नहीं होता कि वह समूची कार यहीं हिंदुस्तान में ही बन रही होगी! हो सकता है कि उसका इंजन जापान में बनता हो, पहिए हिंदुस्तान में, ढ़ाँचा अमेरिका में और आंतरिक सजावट के सामान किसी और देश में। कारखाना लगाने के शुरुआती दौर में तो प्राय: ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अन्य देशों में चल रहे अपने कारखानों का माल मँगाकर मात्र 'असेम्बलिंग' करके ही बेचना शुरु कर देती हैं।

यही हाल दवा कम्पनियों का भी है। आज वैश्विक परिस्थितियाँ जिस तरह हो गई हैं, उसमें यह कहा ही नहीं जा सकता कि कोई भी उत्पादक सिर्फ अपने ही देश के भरोसे काम चला सकता है। आज दवाओं पर खोज कहीं और हो रही है, उनका कच्चा माल कहीं और बन रहा है, दवाऐं कहीं और तैयार हो रही हैं और उनकी बिक्री सारी दुनिया में हो रही है। यह प्रक्रिया एक तरफ सुविधा तो देती है, लेकिन जैसा कि हम देख रहे हैं कि एक देश पर आया प्राकृतिक या मानवकृत संकट कैसे दूसरे अन्य देशों को भी तत्काल प्रभाव में ले लेता है। भूमंडलीकरण के इसी तरह के संकट हाल के डेढ़-दो दशक में हम संक्रामक बीमारियों के सन्दर्भ में देख रहे हैं कि कैसे एक देश में हुई संक्रामक बीमारी वायु-वेग से दुनिया के अन्य देषों में फैल जाती है! मैड काऊ डिजीज हो या बर्ड फ्लू, जापानी इंसेलायटिस हो स्वाइन लू, ऐसी तमाम संक्रामक बीमारियाँ अब देखते ही देखते एक देश से दूसरे देश में फैल जाती हैं और जब तक इनकी पहचान कर बचाव के उपाय तलाशे जाते हैं तब तक सैकड़ों-हजारों बेगुनाह अपनी जान खो बैठे होते हैं।

भूमंडलीकरण ने अपराध की न सिर्फ प्रकृति बदली बल्कि उसे विस्तृत फलक भी दिया है। आज जैसा कि हम अपने देश में देख रहे हैं इसने हर तरह के आर्थिक या अर्थ आधारित अपराध को फैलाने में कारगर भूमिका निभाई है। हालॉकि ऐसा कहने से इसके अन्य तमाम गुणों को अस्वीकृत नहीं किया जा रहा है, लेकिन जिस तरह से आर्थिक अपराधों को शरण देने और वैश्विक आतंकवाद को मदद करने की अंतर्राष्ट्रीय खबरें इन दिनों आती हैं, वह भूमंडलीकरण के ही कारण संभव हो सका है। यह भूमंडलीकरण ही है जो आज असफल, धोखाधड़ी या अपराध में तब्दील हो रहे वैवाहिक सम्बन्धों का पहाड़ खड़ा कर रहा है। खाद्यान्न की किल्लत हो, मँहगाई की सुरसा डायन हो, परमाणु विकिरण का पूरी दुनिया के सिर पर मंडराता खतरा हो या ईंधन का नित नया संकट, इसमें भूमंडलीकरण की भूमिका से कौन इनकार कर सकता है!

वास्तव में, जब हम बहुत तेज चलते हैं तो तेज दुर्घटना की संभावना भी बनी ही रहती है। आज जिस तेज रतार युग में हम प्रवेश कर चुके हैं, वहाँ से वापस लौटना तो मुमकिन नहीं, लेकिन इस बात की आवश्यकता जरुर महसूस होती है कि उड़ान भरने से पहले न सिर्फ अपने परों को तौल लिया जाय बल्कि कहॉ उतरा जायेगा, इसका भी निर्धारण कर लिया जाना चाहिए। विकास की धीमी गति उतनी तकलीफदेह नहीं होती जितनी कि तेज विकास की नियंत्रणहीनता। क्या यह सच नहीं है कि आज उपर वर्णित तमाम व्याधियों के हम स्वयं ही जनक हैं? जापान के ताजा घटनाक्रम के सिलसिले में देश के प्रधानमंत्री का संसद में यह आश्वासन बहुत राहतकारी रहा है कि न सिर्फ जापान में हमारे देश के सभी लोग सुरक्षित हैं, बल्कि देश के भीतर भी हमारे सभी परमाणु उपक्रम पूरी तरह नियंत्रण में हैं। यद्यपि यह एक प्राकृतिक सच है कि विकास हमेशा कीमत मॉगता है लेकिन सतत् सजगता से हम उस कीमत को भी प्राकृतिक बनाकर रख सकते हैं। जापान में विकास की जो कीमत चुकाई जाती हम देख रहे हैं वह बहुत ही आप्राकृतिक है और षायद इसीलिए रौद्र और भयावह भी। समय आ गया है कि विकास से भी पहले इस तरह के विनाश से बचने के उपाय खोजे जॉय।( Published in Humsamvet Features on 21 March 2011)

Thursday, March 17, 2011

पं. बृजनारायण चकबस्त (अल्लामा इकबाल के दोस्त शायर )  कृष्ण प्रताप सिंह

उर्दू में आधुनिक कवितास्कूल के संस्थापकों में से एक पं. बृजनारायण चकबस्त अल्लामा इकबाल के दोस्त तो थे ही, चकबस्त की रचनाओं के संग्रह ‘सुबह-ए-वतन’ के सम्पादक शशिनारायण ‘स्वाधीन’ की मानें तो ‘इकबाल से कम बड़े शायर भी नहीं थे।’स्वाधीन लिखते हैं, ‘यह अलग बात है कि जिन्दगी उनके लिए छोटी पड़ गयी और उन जैसे शायर की नोटिस जिस तरह से ली जानी चाहिए थी, नहीं ली गयी...... अब तक उनके बारे में बहुत कम लिखा गया है। वे उर्दू शायरी के भविष्य थे। उनमें गजब की सांस्कृतिक निष्ठा थी और उर्दू फारसी पर उन्हें समान अधिकार था।’
इकबाल और चकबस्त में एक और चीज कामन थी: दोनों का सम्बन्ध कश्मीर की जमीन से था। चकबस्त के कश्मीरी मूल के सारस्वत ब्राह्मण पुरखे पन्द्रहवीं शताब्दी में उत्तर भारत में आ बसे थे। उनके पिता पं.उदितनारायण, जो स्वयं भी कविताएं करते थे, फैजाबाद(उ.प्र.) में डिप्टी कलेक्टर थे। अंग्रेजी राज में डिप्टी कलेक्टर वह सर्वोच्च पद था जो किसी भारतीय को मिल सकता था। फैजाबाद में ही 19 जनवरी, 1882 को चकबस्त का जन्म हुआ लेकिन पांच साल बीतते-बीतते 1887 में पिता के देहान्त ने ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दीं कि उनके परिवार को दर-बदर होकर लखनऊ चले जाना पड़ा। वहीं कश्मीरी मुहल्ले में रहते हुए चकबस्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सम्बद्ध कैनिंग कालेज से कानून की पढ़ाई पूरी की। 1905 में विवाह, 1906 में पत्नी की मृत्यु और 1907 में पुनर्विवाह उनके जीवन की इससे पहले की घटनाएं हैं।
जल्दी ही वे लखनऊ के सफल वकीलों में गिने जाने लगे। साहित्य के एक बहुचर्चित मामले में उन्होंने प्रसिद्ध कवि दयाशंकर कौल ‘नसीम’ का बचाव किया था। नसीम पर आरोप था कि वे झूठ-मूठ ही खुद को ‘गुलबकावली’ का रचयिता बताते हैं। वकालत करते हुए चकबस्त ने कई राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में खुलकर भागीदारी की। इनमें स्वराज का आंदोलन भी शामिल था। समाज सुधार के आंदोलनों में उनकी दिलचस्पी इस तथ्य से समझी जा सकती है कि कश्मीरी ब्राह्मणों के समुदाय में पहली बार आगरा में एक विधवा विवाह हुआ तो उन्होंने उसकी प्रशंसा में अपनी ‘बर्के-इस्लाह’ शीर्षक रचना में कहा - गम नहीं दिल को यहां दीन की बरबादी का। बुत सलामत रहे इंसाफ की आजादी का। और देश की आजादी क्या है? उन्हीं से सुनिए: तलब फिजूल है कांटों का फूल के बदले। न लें बहिश्त, मिले होम रुल के बदले।
इस संकल्प के चलते वकालत की सफलता उनको बांध कर नहीं रख सकी। वे स्वतंत्रता संघर्ष और उर्दू साहित्य के विशद अध्ययन में सक्रिय हो गये। खासकर मिर्जा गालिब, मीर अनीस और आतिश की कविताओं से वे बहुत प्रभावित थे। इकबाल तो खैर उनके दोस्त ही थे और इस दोस्ती की हद यह थी कि इकबाल मुम्बई में मालाबार हिल्स पर रहने वाली अपनी प्रेमिका अतिया फैजी (राजा धनराजगीर के सेक्रेटरी अंकल फैजी की बहन) से मिलने जाते तो चकबस्त को साथ ले जाते थे। वहीं धनराज महल में शाम की महफिलें जमतीं तो चकबस्त झूमझूम कर अपने कलाम सुनाते। तब मशहूर वकील तेजबहादुर ‘सप्रू’ अफसोस जताते कि सर मोहम्मद इकबाल और चकबस्त जैसे महानुभावों को अपना समय कानून व कविता के बीच बांटना पड़ता है।
जिन्दगी और मौत को परिभाषित करने वाला चकबस्त का एक शेर आज भी बहुत लोकप्रिय है - जिन्दगी क्या है अनासिर में जहूरे तरतीब। मौत क्या है इन्हीं अजजां का परीशाँ होना। अवध में किसी को अपने ख्यालों की आजादी पर जोर देना होता है तो वह भी ‘चकबस्त’ को ही उद्घृत करता है-जुबां को बन्द करें या मुझे असीर करें मेरे ख्याल को बेड़ी पिन्हा नहीं सकते। इसी सिलसिले में ‘चकबस्त’ आगे कहते हैं- चिराग कौम का रोशन है अर्श पर दिल के। इसे हवा के फरिश्ते बुझा नहीं सकते। और सच पूछिए तो उनकी काव्य प्रतिभा का उत्स उनकी राष्ट्रीयता की इस भावना में ही है। वे राष्ट्रीय चेतना से भर देने वाले ऐसे कवि हैं जो ‘तहजीब के दरख्तों के तवील सायों को’ अपनी कविताओं की शक्ल में हमारे लिए छोड़ गया है। उनके समकालीनों ने उन्हें इसके लिए बहुत सराहा है कि अपने लखनवी होने पर गर्व करने वाले चकबस्त के निकट मुल्क की बरबादी ही अफसोस का सबसे बड़ा वायस थी - गुरूरो जहल ने हिन्दोस्तां को लूट लिया। बजुज निफाक के अब खाक भी वतन में नहीं। देश प्रेम की धुन में उन्होंने पारम्परिक उर्दू कविता के मानकों को दरकिनार कर अपने पाठकों को भावप्रधान कविता का सर्वश्रेष्ठ रूप दिया। उनकी धूम भी मची।
चकबस्त ने मुख्य रूप से नज्में रची हैं, हालांकि गजलों के मश्क को वे मजहबे शायराना कहते थे और मसनवी रचने के साथ उनकी लेखनी से पचास गजलें भी निकलीं। उर्दू के गद्य में भी उन्होंने अपने हाथ आजमाए। उनकी कई रचनाएं अनीस के मर्सिये की याद दिलाती है । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ट्रांसवाल में शासकों से दुखी भारतीयों की दशा सुधारने के प्रयत्नों में लगे हुए थे तो चकबस्त ने ‘फरियादे कौम’ की रचना की। यह रचना छोटी पुस्तिका के रूप में छपी जिस पर गांधी जी का नाम इस प्रकार दिया गया था - महात्मा मोहनदास करम चंद गांधी की सेवा में/निसार है दिले शायर तेरे करीने पर/किया है नाम तेरा नक्श इस नगीने पर।
इससे पहले पं.विशन नारायण दर की याद में लिखी उनकी नज्म ‘नजराना-ए-रूह’ प्रसिद्ध हो चुकी थी। लखनऊ में कश्मीर के नवयुवकों की सभा के आठवें अधिवेशन में उन्होंने अपनी नज्म ‘दर्दे दिल’ पढ़ी तो कहते हैं कि सारे नवयुवकों का दर्द उनकी आंखों में छलक आया था। 3 सितम्बर, 1911 को महामना मदन मोहन मालवीय और उनके समर्थक हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए चंदा मांगने लखनऊ आए और इस अवसर पर एक बड़ा अधिवेशन हुआ तो चकबस्त की नज्म ‘कौमी मुसद्दस’ ने समां बांध दिया था: जो अपने वास्ते मांगे ये वो फकीर नहीं। तमअ में दौलते दुनिया की ये असीर नहीं। तमाम दौलतें जाती लुटा के बैठे हैं। तुम्हारे वास्ते धूनी रमा के बैठे हैं। सवाल इनका है तालीम का बने मंदिर। कलश हो जिसका हिमाला से औज में बरतर। यहां से जायं तो जायें ये झोलियां भरकर। लुटायें इल्म की दौलत तुम्हारे बच्चों पर।
कई पुराने नेता कांग्रेस से अलग हुए तो चकबस्त ने एक शीर्षकहीन नज्म रची - आंसुओं से अपने जो सींचा किये बागे वतन, बेवफाई के उन्हें खिलअत अता होने को है । मादरे नाशाद रोती है कोई सुनता नहीं, दिल जिगर से भाई से भाई जुदा होने को हैं। कौम की लड़कियों से खिताब करते हुए तो वे अपनी भावनाओं को यह कहने से भी नहीं रोक पाये - हम तुम्हें भूल गये उसकी सजा पाते हैं। तुम जरा अपने तईं भूल न जाना हरगिज।
खाके हिन्द, गुलजार ए नसीम, रामायण का एक सीन (मुसद्दस), नाल ए दर्द, नाल ऐ यास और कमला (नाटक) चकबस्त की अन्य प्रमुख रचनाएं हैं। 1983 में उनकी जन्मशंती के अवसर पर उनका गद्य पद्य का समग्र साहित्य ‘कुल्लियाते चकबस्त’ नाम से कालिदास गुप्ता ‘रजा’ के सम्पादन में प्रकाशित हुआ। उम्र ने चकबस्त के साथ बड़ी नाइंसाफी की। 12 फरवरी, 1926 को वे रायबरेली रेलवे स्टेशन के निकट अचानक गिर पड़े तो फिर कभी नहीं उठे। कुछ ही घंटों बाद उन्होंने अंतिम सांस ले ली। तब वे सिर्फ 44 वर्ष के थे। उनकी जन्मस्थली फैजाबाद में स्थित उनके घर के आधे हिस्से में एक स्कूल संचालित है और आधे हिस्से में उनसे नजदीकी का दावा करने वाले कुछ लोग रहते हैं। न स्कूल और न ही इन लोगों को चकबस्त की स्मृतियों और विरासत के संरक्षण से कोई लेना देना है। उनकी स्मृतियों को संजोने का सिर्फ एक उपक्रम है, वह लाइब्रेरी जिस पर मीर अनीस के साथ चकबस्त का नाम भी चस्पा है।
संपर्क- 5/18/35, बछड़ा सुलतानपुर, फैजाबाद-224001 मो.09838950948

Tuesday, March 15, 2011

भारतीय कृषि को पुनर्भाषित करने की जरुरत -- सुनील अमर

एक ऐसे समय में जब कृषि योग्य जमीन लगातार घट रही हो और उस पर निर्भर होने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही हो, यह जरुरी हो जाता है कि कृषि की ढाचागत व्यवस्था को नये सिरे से पारिभाषित किया जाय। देश की खाद्यान्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये हमें कृषि क्षेत्र में 5 प्रतिशत से अधिक विकास दर की आवश्यकता है, जबकि अभी हम इसके आधो से भी पीछे हैं। ताजा ऑंकलन बताते हैं कि चालू वेर्ष में यह स्थिति बेहतर हो सकती है। कृषि विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले 15 वर्षों में खाद्यान्न संकट और बढ़ सकता है तथा उसका मुकाबला करने के लिये कृषि क्षेत्र को सिर्फ पारम्परिक खेती के भरोसे ही नहीं छोड़ा जा सकता। इसमें समावेषी कृषि तथा दुग्ध, फल और मांस जैसे कृषि आधारित कुटीर उद्योगों को शामिल किया जाना आवश्यक हो गया है। चालू बजट से पूर्व आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट में कृषि के बारे में चौंकाने वाले तथ्य पेश करते हुए बताया गया है कि दो दशक के भीतर कृषि योग्य जमीन में 28 लाख हैक्टेयर की कमी आ चुकी है। देश की आबादी के बड़े हिस्से की कृषि पर निर्भरता को देखते हुए यह तथ्य चिंताजनक हैं।

भारतीय कृषि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ विविधीकरण संभव है। यहाँ अगर छह प्रकार की ऋतुऐं हैं तो दर्जनों प्रकार की मिट्टी भी है, जो प्राय: हर प्रकार की फसल का उत्पादन यहाँ सुगम बनाती हैं। भारतीय उप महाद्वीप को छोड़कर विश्व में अन्यत्र यह संभव नहीं। बावजूद इसके भारतीय कृषि अभी बहुत कुछ पारम्परिक तौर-तरीकों पर ही निर्भर है। हालाँकि पारम्परिक तरीकों ने कृषि को चिंतामुक्त और टिकाऊ बना रखा था लेकिन छोटी होती जा रही जोत, आबादी की विस्मयकारी वृध्दि से उत्पन्न आवश्यकताऐं तथा समाज में बढ़ते धन के महत्त्व के कारण किसान भी अब पारम्परिक खेती के भरोसे नहीं रह सकता। इसी क्रम में यह कहा जा सकता है कि कृषि का आधुनिकीकरण भी पूर्णत: सरकार पर ही निर्भर करता है। कृषि में हो रहे क्षरण और आने वाले दिनों की दिक्कतों का आभास तो बजट पूर्व आर्थिक समीक्षा में कराया गया है लेकिन उससे निपटने के उपायों के बारे में नहीं बताया गया है।

18 वीं सदी के प्रख्यात जनगणक थॉमस मैल्थस ने एक दिलचस्प भविष्यवाणी करते हुए कहा था कि आने वाले समय में भुखमरी को रोका नहीं जा सकता क्योंकि आबादी ज्यामितीय तरीके से बढ़ रही है और खाद्यान्न उत्पादन अंकगणतीय तरीके से। मैल्थस के उक्त अनुमान की चाहे जितने तरीके से व्याख्या की जाय लेकिन दुनिया भर में इन दिनों जिस तरह खाद्यान्न संकट दिख रहा है, और जिस तरह इस संकट के हौव्वे की आड़ में मंहगाई बे-रोकटोक बढ़ती जा रही है, उससे निपटने का आधारभूत तरीका कृषि व कृषि आधारित सह-उत्पाद बढ़ाना ही हो सकता है। भारतीय कृषि की एक बिडम्बना यह भी है कि देश का सबसे बड़ा और अति महत्त्वपूर्ण क्षेत्र होने के बावजूद यह अपने विषेशज्ञों पर नहीं बल्कि उन नौकरशहों पर निर्भर है जिनके बारे में यह मान लिया गया है कि देश की समस्त बीमारियों की एकमात्र दवा वही हैं। यह तथ्य चौंकाने वाले हैं कि महत्त्वपूर्ण कृषि नीतियॉ निर्धारित करनी वाली कुर्सियों पर कृषि विषेशज्ञ नहीं आई.ए.एस. अधिकारी बैठे हुए है! ऑल इन्डिया फेडरेशन ऑफ एग्रीकल्चर एसोसियेशन के एक प्रवक्ता का दावा है कि देश में ऐसे एक हजार पदों पर नौकरशह काबिज हैं।

अभी पिछले पखवारे रिजर्व बैंक के गवर्नर डी. सुब्बाराव ने एक बयान में कहा कि खाद्य वस्तुओं में आ रही मंहगाई को रोकने के लिये कृषि उत्पादों को बढ़ाना पड़ेगा और इसके लिये तत्काल कदम उठाये जाने की जरुरत है। इसके साथ उन्होंने एक और हरित क्रांति की वकालत करते हुए कहा कि कृषि में औसत उत्पादकता बढ़ाने की आवशयकता है। उन्होंने पंजाब का हवाला देते हुए कहा कि यदि देश के आधो राज्य भी पंजाब की प्रति हैक्टेयर उत्पादकता को प्राप्त कर लें तो खाद्य वस्तुओं की किल्लत से प्रभावी ढ़ंग से निपटा जा सकता है। यहाँ यह जानना दिलचस्प होगा कि जहाँ कृषि उत्पादकता का राष्ट्रीय औसत 1909 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर है, वहीं पंजाब का खाद्यान्न उत्पादन 4231 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर है! स्वाभाविक ही है कि यदि इतने बड़े अंतर को हम प्राप्त कर लें तो यह राष्ट्रीय कृषि क्रांति नहीं बल्कि विश्व कृषि क्रांति हो सकती है।

अब मूल प्रश्न यही है कि क्या राष्ट्रीय औसत को पंजाब के औसत तक पहुचाया जा सकता है? असल में कृषि उत्पादन और औद्योगीकरण बढ़ाने के जिस तरह के प्रयास पंजाब में आजादी के तुरन्त बाद से ही किये गये, देश के अन्य हिस्सों में उस तरह नहीं हो सका। दूसरे पंजाब में कृषि जोतों का आकार काफी बड़ा है, वहॉ के निवासियों की अन्यान्य स्रोतों से भी पर्याप्त आय है जिसका निवेश वे कृषि में करते हैं और खेती वहॉ उद्योग सरीखे की जाती है। इन तमाम कारणों में कृषि जोतों का बड़ा होना ही सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। पंजाब में खेती का पर्याप्त मशीनीकरण हो चुका है और आय अधिक होने के कारण वहाँ मानव श्रम पर भी देश के अन्य हिस्से के मुकाबले ज्यादा खर्च किया जाता है। इसके बजाय देश के अन्य हिस्से में स्थिति यह है कि तीन चौथाई से अधिक किसान लघु और सीमान्त कृषक की श्रेणी में आते हैं। इनके लिये खेती बमुश्किल अपने खाने के लिये धान व गेहूं पैदा कर लेना ही है। ऐसी खेती करने वाले अधिकांश किसान अपने खाली समय में मजदूरी भी करते हैं और गणना होते समय वे किसान और मजदूर या श्रमिक दोनो श्रेणियों में गिने जाते हैं! अभी बीते दिसम्बर माह में केन्द्रीय श्रम मंत्रालय ने एक रपट जारी कर कहा कि अब आधे से भी कम लोग यानी सिर्फ साढ़े 45 प्रतिशत लोग ही कृषि पर निर्भर रह गये हैं। यह हालत कृषि के खोखलेपन को बताती है।

सह कृषि के रुप में बागवानी, मत्स्य पालन, पशुपालन, कुक्कुट पालन, मधुमक्खी पालन तथा फूड प्रोसेसिंग आदि अनेक कार्य शामिल हैं जिनसे न सिर्फ पारम्परिक कृषि पर बोझ कम होता है बल्कि वे उत्पादों में भिन्नता लाते हैं और कृषि का विकल्प भी बनते हैं। अफसोस है कि इनमें से अधिकांश पदों पर कृषि विशेषज्ञ नहीं बल्कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी बैठे हुए हैं, जिन्हें खेती-बारी का कोई ज्ञान ही नहीं है। कृषि आज भी देश की प्राथमिक आवश्यकता है और संसद में पेश ताजा ऑंकड़ों के अनुसार देश के कुल 40 करोड़ 22 लाख श्रमिकों में लगभग 57 प्रतिशत लोग कृषि में ही समायोजित हैं ! स्थिति यह है कि देश में इस वक्त कोई किसान आयोग ही नहीं है। कृषि को जब तक लाभकारी नहीं बनाया जाएगा और किसानों को उनकी कृषि योग्य जमीन पर खेती करने के बदले एक निश्चित आमदनी की गारन्टी नहीं दी जायेगी, जैसा कि अमेरिका सहित तमाम विकसित देशों में है, तब तक किसानों को खेती से बाँधकर या खेती की तरफ मोड़कर नहीं किया जा सकता। खेती से होने वाली आमदनी को बढ़ाने के प्रयास इस तरह किये जाने चाहिए कि किसान धीरे-धीरे सरकारी अनुदान से मुक्त होकर खेती पर निर्भर रह सकें। भारतीय कृषि सिर्फ खाद्यान्न उत्पादन योजना भर नहीं बल्कि एक समृध्द परम्परा रही है। इसे सामूहिक खेती के भरोसे भी नहीं छोड़ा जा सकता। राष्ट्र की सामाजिक समरसता इससे बनती है। आज भी देश के गाँवों में जाकर इस संस्कृति को देखा जा सकता है। ( Published in Humsamvet Features on 14 March 2011, humsamvet.org.in )

Thursday, March 10, 2011

मेरी लम्बी कविता - '' इस तरह कहानी बन जाती ....'' के कुछ अंश ---

''...तुम देते मुझको उम्र कैद, आजीवन कारावास मुझे,
मैं सब कुछ सह लेता लेकिन तुम दे डाले वनवास मुझे !
तुम अग्नि-परीक्षा ले लेते, मैं ख़ुशी-ख़ुशी से जल जाता |
इस तरह कहानी बन जाती , कुछ तुम कहती, कुछ मैं कहता |
एक उम्र बिता दी है हमने,दिल में घुट कर, मन में घुटकर,
न चैन तुम्हें, न चैन हमें, क्या कुछ पाए हम-तुम जुड़कर |
मैं गैर सही, पर तुम कहती, तो मैं रस्ते से हट जाता |
इस तरह कहानी ....
मैं लड़ा बहुत इस दुनिया से, सह गया बहुत कड़वे ठोकर,
तुम साथ रहे , मैं जीत गया, पर हार गया तुमको खोकर !
तुम पारस थे गर छू देते, मैं भी कंचन मन हो जाता ||
इस तरह कहानी बन.....'' ( सुनील अमर )

Wednesday, March 09, 2011

डाकघरों पर भी डालें जवाबदेही ----- सुनील अमर

विकास और जन कल्याणकारी योजनाओं के बेहतर और तेज क्रियान्वयन के लिए गत वर्ष केन्द्र सरकार ने यह तय किया था कि देश के ऐसे गांवों को जिनकी आबादी दो हजार से अधिक हो, वहाँ बैंकिंग सेवायें उपलब्ध करायी जांय। लगभग 60,000 ऐसे गांवों को चिन्हित कर सरकार ने बैंकों को हिदायत दी थी कि वे वित्तीय वर्ष 2011-12 की समाप्ति तक ऐसा कर लें। ताजा खबर यह है कि एक साल बीतने के बावजूद बैंकों ने इस दिशा में कुछ नहीं किया है। इसके विपरीत अभी गत माह केन्द्रीय वित्त मंत्री के साथ हुई बैठक में बैंकों ने यह कहते हुए हाथ उठा दिया कि इसमें भारी पूंजीनिवेश की दरकार है और यह कि अगर सरकार ऐसा कराना चाहती है तो पहले इसके संसाधन हेतु पर्याप्त धन उपलब्ध कराये।
मौजूदा समय में किसी भी प्रकार की योजना का क्रियान्वयन बैंकों के सहयोग बगैर संभव नहीं है। इसी के साथ यह भी सच है कि सरकार की मर्जी के बगैर किसी प्रकार की बैंकिंग भी देश के भीतर संभव नहीं है। जहाँ तक राष्ट्रीयकृत बैंकों की बात है, वे सरकार के ही उपक्रम हैं और सरकारी पूँजी से ही संचालित होते हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि आखिर इस प्रसंग में किसकी मंशा खराब है? बैंक, विशेषकर सरकारी बैंक, अब सिर्फ पैसा जमा करने-निकालने या कर्ज देने के ही माध्यम नहीं रह गये हैं, बल्कि जनकल्याण की तमाम योजनाऐं जो केन्द्र या प्रदेश सरकारों द्वारा चलायी जा रही हैं, उनका क्रियान्वयन भी इन्हीं बैंकों द्वारा ही हो रहा है। बात अगर ग्रामीण और कृषि क्षेत्र की करें तो सत्तर के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने जब 23 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया तो उसके बाद ही तमाम कृषि योजनाओं का क्रियान्वयन इन बैंकों की मार्फत हुआ और हरित क्रांति संभव हुई। ‘अधिक अन्न उपजाओ’ उस दौर का बहुत चर्चित सरकारी नारा था।
बीते एक दशक में न सिर्फ बैंकिंग के स्वरुप में आमूल-चूल परिवर्तन आया है, बल्कि सरकारी बैंकों को निजी और भारी भरकम विदेशी बैंकों से तगड़ी चुनौती भी मिली है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकारी बैकों ने भी अपने तौर-तरीकों में निजी क्षेत्र की तरह ही परिवर्तन किये हैं। ये परिवर्तन व्यावसायिक प्रवृत्ति के हैं और इनसे सरकारी मंशाओं को दिक्कत पहुँचती है। सरकारी योजनाऐं, प्रायः ही राजनीतिक लाभ से प्रेरित रहती हैं, इसलिये बैंक प्रबंधन और सरकार के बीच अपने हितों को लेकर अक्सर ही खींच-तान चलती रहती है। ताजा प्रसंग भी इसी नफे-नुकसान पर टिका हुआ है। असल में इधर के दो दशक में कृषि, स्व-रोजगार, लधु-उद्यम और जनकल्याण को लेकर दर्जनों सरकारी योजनाऐं शुरु की गयीं जिनका क्रियान्वयन सरकारी बैंकों की ही मार्फत हो रहा है।
हाल के वर्षों में ग्राम पंचायतों के बैंक खाते, मनरेगा में लाभार्थियों के बैंक खाते, छात्रों के वजीफे, शून्य धनराशि पर सबके खाते खोलने की सरकारी हिदायतें, विधवा और वृद्धावस्था पेंशन, गन्ना किसानों का भुगतान, तथा सरकारी कर्मचारियांे को वेतन और पेंशन आदि के कारण निःसन्देह बैकों की ग्रामीण शाखाओं पर कार्य भार बढ़ा है। इसके विपरीत शाखाओं के कम्प्यूटरीकरण के बहाने शीर्ष प्रबन्धन ने स्टाफ काफी कम कर दिया है। जाहिर है कि इन सबका असर बैंकों के कामकाज पर पड़ रहा है और इधर बैंकों में निष्प्रयोज्य खाते, बिना लेन-देन वाले ऋण खाते (एनपीए- नान परफार्मिंग एकाउन्ट) तथा भारी संख्या में न्यूनतम धनराशि वाले खातों की संख्या में खासी वृद्धि हुई है। इससे बैंकों का काम तो बढ़ा लेकिन लाभ बढ़ने के बजाय घट गया, क्योंकि ऐसे ज्यादातर खातों में पैसा आते ही पूरा का पूरा निकाल लिया जाता है। ऐसे में जब सरकार उनसे ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक शाखा खोलने या गांवों को बैंकों से जोड़ने की बात करती है, तो जाहिर है कि यह घूम-फिर कर सरकार पर ही आयद होता है कि वह इन बैंकों से किस तरह काम लेना चाहती है!
यही हाल बीमा कम्पनियों का भी है। बीते एक दशक से कृषि, स्वास्थ्य, पेंशन और जीवन बीमा को लेकर तमाम सरकारी योजनायें चलायी गयी हैं। इस प्रकार बीमा कम्पनियांे की भी स्थिति बैंकों सरीखी ही हो गयी है। आगामी बजट की तैयारियों के सिलसिले में बीते माह केन्द्रीय वित्त मंत्री के साथ बैंक व बीमा कम्पनियों के शीर्ष अधिकारियों की बैठक में उक्त मसले उठाये गये और मांग की गयी कि आगामी बजट में इसके लिये सरकार प्रावधान करे, जिस पर वित्त मंत्री ने सधा हुआ जबाब दिया कि कुछ किया जाएगा। अब देखना यह है कि यह प्रावधान कृषि के लिए निर्धारित बजट से कटौती करके किया जाएगा या इसके लिये अलग से व्यवस्था की जायेगी। पिछले बजट में कृषि ऋण के लिये महज 3.7 लाख करोड़ की धनराशि का प्रावधान था। इस बार इसमें कुछ खास बढोत्तरी की उम्मीद नहीं है। अब अगर इसी में से सरकार बैंकों और बीमा कम्पनियों को गांवों में उतरने के लिये भी व्यवस्था करेगी तो निश्चित ही दोनों कार्य प्रभावित होंगें। कृषि के लिये बजट में निर्धारित की जाने वाली धनराशि का हाल भी असल में बेहाल ही होता है। इसका ‘किंग साइज’ हमेशा ही वे उद्योंगपति ले जाते है, जो कृषि व्यापार में लगे होते हैं, और जो कृषि में लगे हैं, उन्हें सिर्फ जूठन मिलती है।
बैंकों का तर्कं अपनी जगह सही हो सकता है कि नयी संस्थापनाओं पर खर्च तो आयेगा ही। देश में छह लाख के करीब गाँव हैं। सबको सर्विस उपलब्ध कराना एक बड़ा काम है और निश्चित ही यह सरकारी दखल के बगैर संभव नहीं हो सकता। बैंकों ने फिलहाल एक बीच का रास्ता निकाला है और वे गांवों में शाखा खोलने के बजाय कमीशन एजेन्ट के तौर पर ‘बिजनेस कारेस्पान्डेन्ट’ रख रहे हैं जो ग्रामीण ग्राहकों और बैंकों के बीच माध्यम का काम करेगा। जाहिर है कि अनपढ़ या बैंकिंग न जानने वाले ग्रामीणों के लिये यह शोषण का औजार ही बन जाएगा। इस एजेन्ट पद्धति से सरकारी मंशा फलने-फूलने से रही।
बैंकों की चूडियाँ कसने के बजाय सरकार वही काम डाकखानों से भी ले सकती है। वास्तव में डाकखानों का काम इधर के वर्षों में काफी कम हो गया है। इसका बड़ा कारण निजी कूरियर कम्पनिया और मोबाइल फोन हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में डाकखाने अभी भी मनीआर्डर पहुँचाने का काम बखूबी कर रहे थे, लेकिन मनीआर्डर का बेतहाशा शुल्क और बैंकों की सी.बी.एस. शाखाओं ने उनका यह काम भी हल्का कर दिया है। इधर ग्रामीण क्षेत्रों के डाकखाने भी कम्प्यूटर और डीजल जेनरेटर से लैस हो गये हैं। उनमें विश्वसनीयता है तथा उन्हें थोड़ा सा और ठीक करके सरकार गांवों के मतलब की बैंकिंग उनसे करा सकती है। आज भी सुदूर ग्रामीण इलाकों में डाकखाने ही बैंक हैं और अल्प बचत योजनाओं का सबसे बढ़िया क्रियान्वयन कर रहे हैं। अभी बैंक जिस बिजनेस कारेस्पान्डेन्ट को रखने की योजना बना रहे हैं, वे दशकों से डाकखानों में काम कर रहे हैं। डाकखानों के घटते व्यवसाय से चिन्तित उसके हुक्मरानों ने एक अर्से से पोस्टमैनों की मार्फत मोबाइल सिम व टाप अप, गंगाजल, सोने-चाँदी के सिक्के और न जाने क्या-क्या धंधा करने का ऐलान कर रखा है लेकिन उनकी कोई भी योजना न तो जमीन से जुड़ी है और न परवान ही चढ़ रही है। डाकखाने घाटे में हैं। ऐसे में अगर उन्हें सरकार की ग्रामीण विकास व कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से जोड़ा जा सके तो उचित ही होगा। ( राष्ट्रीय सहारा सम्पादकीय पृष्ठ -- 10 मार्च 2011 )

Tuesday, March 08, 2011

विखंडित होते समाज के खतरे -- सुनील अमर

खबर है कि ताइवान के एक युवा दम्पत्ति को इंटरनेट पर जुआ खेलने की ऐसी लत लग गई कि वे अपने नवजात की देखभाल ही भूल गये और पालने में पड़ी वो एक साल की बच्ची समय पर दूध न पाने की वजह से धीरे-धीरे सूखती हुई मर गयी। पड़ोसियों की शिकायत पर जब पुलिस वहाँ पहुची तो पाया कि मरी हुई बच्ची की बगल में ही उसके माँ-बाप कम्प्यूटर पर जुआ खेलने में खोये हुए थे! बच्ची की ऑखें गड्ढ़े में धँसी लग रही थी और वो सूख कर कंकाल सी हो गयी थी।

इसी के साथ कुछ ताजा देशी खबरें भी हैं - पंजाब पुलिस के एक बर्खास्त डी.एस.पी. ने अपने ही बेटों के साथ मिलकर 40 लड़कियों की अश्लील फिल्म बना डाली! दूसरी तरफ मथुरा के एक कथावाचक ने बीते महीने अपनी ही धर्मपत्नी के साथ अपनी ब्लू-फिल्म बना कर उसकी सीडी तैयार कर ली। पैसे की हवस का आलम यह है कि पंजाब के गुरदास जिले में अपने एन.आर.आई. पति की हत्या के लिये पत्नी ने ढ़ाई लाख रुपये की सुपारी बदमाशों को दे दी जो कि करतूत को अंजाम देने के पहले ही पुलिस के हत्थे चढ़ गये, और बुध्दिजीवियों के अभेद गढ़ कहे जाने वाले जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के एक छात्र ने अपनी दोस्त छात्रा को धोखा देकर छात्रावास में ही उसके साथ अपने शारीरिक संबन्धों की फिल्म बनवा ली!

दैनिक जीवन के विनिमय आसान करने के लिये जिस मुद्रा का आविष्कार किया गया था, वो अब जीवन से भी बढ़कर हो गयी है, ऐसा लगने लगा है। कई बार यह सोचकर हताषा सी होती है कि क्या यह वही समाज है, जिसका निर्माण हम सबका अभीश्ट था? विकास के क्रम में यह अवधारणा मन में थी कि जैसे-जैसे ज्ञान-विज्ञान का प्रसार होगा, हम और ज्यादा सभ्य और संवेदनशील होते जायेंगें और तदनुरुप हमारा समाज भी। ज्ञान-विज्ञान के विकास की स्थिति यह है कि आज अपनी ही आविष्कृत तमाम चीजों को हम स्वयं ही ऑख फाड़कर देखते रहते हैं। लेकिन कमोबेश यही हालत हमने अपने समाज की भी बना ड़ाली है। अब तो नित्य ऐसी खबरें आती रहती हैं कि उन पर सहज ही विश्वास नहीं होता। ताइवान में तो जिस बेपरवाही से माँ-बाप ने अपनी बच्ची की जान ली, वैसा तो पागल भी नहीं करते। पागलों को भी अपने बच्चों से प्यार करते देखा जाता ही है। दूसरी तरफ माँ-बाप ही अपने बच्चों की निर्मम हत्या कर डाल रहे हैं, ऐसी घटनायें भी देखने में आ ही रही हैं।

मनोवैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि लगभग पूरा समाज ही असामान्य मानसिक स्थिति में जी रहा है। भारतीय ग्रन्थों में तो कहा गया है कि 'महाजनो येन गत: स पंथ:' यानी बड़े लोग जिस राह चलें, वही सही राह है, लेकिन समाज के महाजन यानी संत-महात्मा, विचारक, अध्यापक, डाक्टर, वकील, न्यायाधीश, राजनेता और व्यापारी यही सब आज अधिकांश रुप मे जिस तरह का आचरण उपस्थित कर रहे हैं, वह चिन्तनीय है और उसी तरह की दिशा भी समाज को मिल रही है। समाज निर्माण की प्राथमिक और महत्त्वपूर्ण इकाई परिवार और विद्यालयों को माना जाता रहा है क्योंकि वहीं से बच्चों को संस्कार व शिक्षा प्राप्त होती है, जिसे आगे चलकर वे अपने जीवन में व्यवहृत करते हैं। यह प्राथमिक चरण ही आज पूरी दुनिया में व्यवसाय की भेंट चढ़ चुका है। आज स्कूल जाने वाला नन्हा बच्चा भी जानता है कि पैसा क्या चीज है! स्कूल कारखानों में तब्दील हो गये हैं और उनसे निकलने वाले बच्चें एक प्रोडक्ट! पैसे के दम पर तैयार होने वाले अगर आगे चलकर सब कुछ पैसे से ही तौलें तो आश्चर्य कैसा?

वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने पूरी दुनिया को एक गॉव सरीखा बना दिया है। इसमें अच्छाइयों का विकिरण तो कम हुआ लेकिन बुराइयाँ तेजी से फैलीं। आश्चर्य तो इस बात का होता है कि समाज का जो वर्ग कम पढ़ा-लिखा या अनपढ़ है और जिसके बिगड़ने का खतरा ज्यादा समझा जाता रहा, उसकी बजाय हमने देखा कि हर प्रकार से वे लोग ज्यादा बिगड़ गये जो पढ़े-लिखे और सभ्य कहे जाते रहे। क्या यह हैरत की बात नहीं लगती कि डी.एस.पी. स्तर का एक अधिकारी, सैकड़ों लोगो को रोज धर्म-कर्म और संयम का उपदेश देने वाला मथुरा का कथावाचक और जे.एन.यू. जैसी संस्था का एक पोस्टग्रेजुएट छात्र! ये सब पैसा कमाने के लिये उक्त प्रकार के घृणित कार्य करें!

वास्तव में दिन-प्रतिदिन हो रहे आविष्कारों ने जहॉ एक तरफ दैनिक जीवन में सुविधाऐं व सहूलियतें उपलब्ध करायी वहीं उसे हर हाल में प्राप्त करने के लिये लोगो को उकसाया भी। आधुनिक जीवन की आपाधापी और एक-दूसरे से आगे निकल जाने की भावना ने आज तमाम लोगो के मन से उचित-अनुचित का भेद ही मिटा दिया है। विवेक प्राप्त करने के लिये बुध्दि को पहली सीढ़ी माना जाता है लेकिन एक डी.एस.पी., एक स्नातकोत्तर छात्र और एक कथावाचक को बुध्दिहीन तो नहीं कहा जा सकता? फिर इनमें विवेक क्यों नहीं आया?

समाजशास्त्री कहते हैं कि हाल के दो-तीन दशकों में भारतीय समाज में बहुत तेज बदलाव आया है, और इसने खासकर मध्यम वर्ग को तो आमूल-चूल बदल दिया है। इसमें भोगवादी प्रवृत्ति बढ़ी है और तमाम सामाजिक वर्जनाओं को इसने नकार दिया है। जिस सामाजिक दबाव के कारण व्यक्ति समाज विरोधी कार्य करने से डरता था, वह दबाव ही अब प्राय: खत्म हो गया है। संचार क्रांति के कारण अब यह हवा सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों तक जा पहुँची है, और वहाँ भी अब नये और पुराने समाज में जबर्दस्त द्वन्द शुरु हो गया है। बहुत से मामलों में तो यह सरे-आम हत्याओं तक का रुप ले रहा है। समाज वैज्ञानिक कहते हैं कि ऐसे अपराध के मुकदमों के त्वरित गति से निस्तारित न होने या अभियोजन की कमी से सजा से बच जाने के कारण भी अन्य लोगों के मन में गलत रास्तों को शार्ट-कट की तरह इस्तेमाल करने ललक बनती है। अब तो यह भी देखने में आ रहा है कि अपराध करने वाले व्यक्तियों की भी स्वीकार्यता समाज में बन रही है। ऐसे लोग न सिर्फ चुनाव जीतकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सिरमौर बन रहे है बल्कि एक तरह से शरीफ और 'लॉ एबाउन्ड सिटिजन्स'' को इनके नेतृत्व में रहने को विवष होना पड़ रहा है।

आज के आधुनिक समाज में अपने पडोसी से भी कोई मतलब न रखने की प्रवृत्ति ही उपर उध्दृत की गयी घटनाओं को जन्म देने में मदद कर रही है। अत्यधिक सुविधाभोगी सोच ने हालत ये कर दी है एक ही छत के नीचे रहने वाले परिवार के सदस्य भी एक दूसरे की खबर रखना जरुरी नहीं समझ रहे हैं। आज सामाजिक जवाबदेही ही समाप्त होती जा रही है। इसे फिर से स्थापित करना ही होगा। सुनने में अटपटा भले लगे, लेकिन यह कार्य समाज के वरिष्ठ नागरिकों द्वारा ही बेहतर ढ़ॅंग से शुरु किया जा सकता है, विशेष रुप से सेवानिवृत्त लोगों द्वारा। जब एक आदमी समाज से कुछ लेता है तो उसे समाज को कुछ देना भी पड़ेगा, लेकिन इसके लिये जो बाध्यकारी सामाजिक दबाव था, अफसोस है कि वह दिन-प्रतिदिन क्षीण होता जा रहा हैं। हम एक तरह से सामाजिक अराजकता की राह पर चल पड़े हैं। इस दिशा में कुछ करने के लिये आज भी देश की ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था प्रेरणादायी हो सकती है। यह सुखद है कि वहाँ सार्थक सामाजिक हस्तक्षेप आज भी काफी हद तक सक्रिय है। (Published in Hum Samvet Features on 07 March 2011)

Monday, March 07, 2011

शर्म इनको मगर नहीं आती -- शीबा असलम फ़हमी

अगर किसी सामान्य अपराधी, व्यभिचारी, ज़लिम, हत्यारे, लोभी, झूठे से यह पूछना होता कि भाई तुम ख़ुद ही बता दो कि तुम्हारे साथ कैसे पेश आया जाय, तो उम्मीद थी कि वह थोड़ा-बहुत तो ख़ुद को समझते हुए जवाब देता, लेकिन कठमुल्लों से तो आप उम्मीद कर सकते हैं कि वे कह देंगे कि हम तो अल्लाह की भेजी गई नेमत हैं इंसानियत के लिए, हमसे वही सुलूक हो जो अवतारों के साथ होता है।
यानी हम तो बे-रोक, बेधड़क दूसरे के विश्वासों की खिल्ली उड़ायेंगें, अपनी सुविधावादी दलीलों से अपने ‘विश्वास’ को ‘वैज्ञानिक’ बतायेंगें, अपनी धार्मिक पुस्तक को दैवीय साबित करेंगें, अपने पैग़म्बर को ही आख़िरी और ईश्वर का सबसे प्रिय बताएंगे, अपनी हिंसा को ‘जेहाद’ बताऐंगे, अपनी मक्कारियों को ‘तक़य्या’ कहेंगे लेकिन जब दूसरे धर्म के मानने वाले यही सब हमारे साथ करे तो हम सुविधावादियों को मानवाधिकार, प्रजातांत्रिक मूल्य, संविधान प्रदत्त अधिकार, इंसाफ़, समानता, स्वतंत्रता, बहुसंस्कृतिवाद, राष्ट्रीय संप्रभुता और इन सबसे बढ़कर ‘धर्मनिरपेक्षता’ जैसे शब्द-स्वर याद आने लगते हैं। कठमुल्ला वर्ग बड़ी बेशर्मी से फ्रांस के बुर्क़ा-बैन पर टीवी, अख़बार आदि में अवतरित होकर फ़्रांस की सरकार को लोकतांत्रिक मूल्य की याद दिलाने लगता है। तब इन्हें ज़रा शर्म नहीं आती कि जिस मुंह से यह ज़बर्दस्ती बुरक़ा उतारने को बुरा कह रहे हैं ‘चुनाव की आज़ादी’ के आधार पर, उसी मुंह से इन्हें अरब-ईरान आदि देशों में ज़बरदस्ती औरतों को बुर्क़ा पहनाने की भर्त्सना भी तो करनी चाहिए, जो उतना ही चुनाव के अधिकार का हनन है। लेकिन नहीं, इन्हें अरब-ईरान पर उॅंगली उठाने की ज़रुरत महसूस नहीं होती क्योंकि वहाँ की ज़बरदस्ती इन्हें जायज़ लगती है।
ये ख़ुद तो यह मानेंगें की इनके पैग़म्बर इस श्रृंखला के आख़िरी पैग़म्बर हैं और यदि कोई उनके बाद पैग़म्बरी का दावा करे तो उसे जान से मार देना चाहिए। लेकिन यहूदी-ईसाई भी अगर अपने मसीह और पैग़म्बर पर यही विश्वास रखें तो यह उन्हें ‘नामूस-ए-रिसालत’ के क़ानून में मौत की सज़ा सुना देंगें। अगर सरकार कोई रेआयत दिखाए तो इनके अपने फ़तवे तो हैं ही, मारने वाले को लाखों के इनाम की घोषणा के साथ।
ये अपने अल्पसंख्यकों के साथ तो एल्बर्ट ( गोजरा ) और आसिया बीबी वाला सुलूक करेंगे। वह इनके बर्तन में पानी पी ले तो उसे इसाई होने के आधार पर ‘अछूत’ कहकर उसके आत्म-सम्मान को रोंदेंगे, वह मुक़ाबला करे तो उसे झूठे केस में फॅंसाकर सज़ा-ए-मौत तक पहॅुंचा देंगे, लेकिन ख़ुद ये जहाँ अल्पसंख्यक हैं, वहाँ इन्हें अपने भले के लिए विशेष प्रावधान चाहिए।
यूरोप-अमरीका-आस्ट्रेलिया मे तो ये मैकडोनल्ड, के एफ़ सी, पित्ज़ा हट जहाँ ‘पेपरानी’, ‘सलामी’,‘बेकन’ बेचा जाता है, वहाँ नौकरी कर लेंगे लेकिन अपने मुल्क में एक इसाई को अछूत बनाकर रखेंगे।
दूसरों की इबादतगाहों को नेस्तनाबूद करने को इस दौर में भी एक बहादुरी के कारनामे की तरह शाबाशी के साथ दरसी किताबों में दर्ज करेंगे, लेकिन अगर इनकी इबादतगाह ख़त्म कर दी जाए तो ये उसे लोकतंत्र की हत्या और अक़लियत के अधिकारों का हनन बताएंगे। इन्हें ये नहीं समझ में आता कि भाई जो अपनी विजयगाथाऐं तुम मदरसों में पढ़ा रहे हो, वह दूसरे द्वारा इबादतगाह शहीद करने की ज़रा पुरानी कहानी है, और बाबरी मस्जिद वाली ज़रा नई। अगर पुरानी वाली को ग़लत नहीं कहोगे तो नई वाली को कैसे ग़लत कह सकते हो?

ये इतने भोले हैं कि ख़ुद तो यूरोप, अमरीका, दक्षिणपूर्व एशिया, अफ्रीक़ा में तबलीग़ के जत्थे के जत्थे लेकर जायेंगे और वहाँ के इसाइयों को बताएंगे कि ईसा मसीह आख़िरी पैगम्बर नहीं, मुहम्मद साहब आख़िरी हैं, लेकिन अगर इनके मुल्क में कोई मसीही अपने विश्वास को सर्वोच्च माने तो उसके ऊपर तहाफुज़-ए-नामूस-ए-रिसालत कानून ठोंककर उसे मौत के घाट उतार देंगें। इन लोगों की कैसी तार्किकता है जो यह नहीं समझ पाती कि भाई एक इसाई तो ईसा मसीह को ही सर्वोच्च मानेगा, न कि वह भी मुहम्मद साहब की तारीफ़ करेगा? वह तो अपने दीन और दीनी शख़स्यात को ही आला तरीन समझेगा न? इसके लिए उसे जेल, जुर्माना सज़ा-ए-मौत का मतलब तो यही हुआ कि जहाँ आप हुकूमत में हैं वहाँ ग़ैर-मुस्लिम को मज़हबी आज़ादी नहीं?

इनके अपने टाइप के इस्लाम (अल्लाह बेहतर जाने वो कौन-सा है?) के अलावा शिया, आग़ाख़ानी, बोहरा, अहले हदीस, देवबंदी, वहाबी, सलफ़ी सब आपस में सिर-फुटव्वल करेंगे लेकिन कानून बनाएंगे कि दूसरे मज़हब वालों को कुछ-कुछ ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ेगा। इसके पीछे का तर्क है कि हम सोसायटी में अमन चाहते हैं, इसलिए ‘एक मज़हब’ होगा और उसके अलावा कोई आएगा या होगा तो उसके लिए कुछ शर्तें होंगी। मतलब यह कि क़ादयानी, बहाई, हिंदू, सिक्ख, इसाई, पारसी क़ौमों को क़ानूनी हदबंदी मे रखा जाएगा और ये लोग अपनी इबादतगाहों, मज़हबी अरकान वगैरह को छुपा कर करें। वरना ब्लासफेमी क़ानून इन्हें ठिकाने लगा देगा। लेकिन सबसे मज़े की बात यह है कि यह अक़्ल के अंधे पाकिस्तान में ही मज़हबी-दीनी आज़ादी होने का दावा करते हैं। हिन्दुस्तान से लेकर अमरीका तक मुसलमान-इसाई-हिंदू-सिक्ख सभी अपने-अपने दीन की तब्लीग़ कर सकते हैं, और इसे कहते हैं मज़हबी-दीनी-आज़ादी। लेकिन ईरान में बहाई-पारसी किस हाल में हैं या पाकिस्तान में शिया-क़ादयानी, बहाई, पारसी किस हाल में हैं, यह किसी से छुपा नहीं। इसमें एक मज़े की बात यह है की अगर आप हिन्दुस्तानी शिया कट्टरवादी से बात करें तो वह पाकिस्तान में चल रहे शिया-मुख़ालिफ़ हरकतों पर तो आंसू बहाएगा, लेकिन इरान में पारसियों, ईसाईयों, क़द्यानियों के प्रति जो असहिष्णुता है उस के पक्ष में तर्क देने लगेगा. यह अजीब समझ है इंसाफ़ और बराबरी की.?

पाकिस्तान का ब्लासफ़ेमी या कुफ्ऱ क़ानून में नामूस-ए-रिसालत का क़ानून इतना गै़र मुकम्मल है कि उसमें कोई भी ग़ैर मुस्लिम महज़ अपना अक़ीदा मानने के लिए कभी भी फंसाया जा सकता है। इसमें ‘तौहीन-ए-रिसालत’ टर्म (अभिव्यक्ति) की कोई परिभाषा या तारीफ़ नहीं बताई गई है। यानी कि हर केस में हर बार नई बहस और नए तर्कों से जुर्म साबित किया जाएगा। एक और बात यह कि आरोपी के कहे गए शब्द कभी दोहराए नहीं जाते इसलिए कोई नहीं जानता कि असल में कहा क्या गया है, जिससे सही फ़ैसला मुमकिन नहीं, तिस पर यह कि इस क़ानून में फंसने-फंसाए जाने वाले को अगर अदालत बरी भी कर दे तो समाजी तौर पर शिद्दतपसंद उसे जीने नहीं देते। वह या तो जेल में मार दिया जाता है, या अदालत के ठीक बाहर, या फिर रास्ता चलते। एक बार इस क़ानून में फंसने के बाद मुल्ज़िम की ज़िन्दिगी बहरहाल तबाह हो जाती है क्योंकि वह समाज से ख़ारिज कर दिया जाता है।
अगर वह ‘ग़ैर-मुस्लिम’ है तो उसके पूरे मुहल्ले-बस्ती पर ये आगज़नी, लूट, क़त्लेआम करते हैं। ख़ुद पाकिस्तान मानवाधिकार कमिशन की रिपोर्ट बताती है कि गोजरा (2010) में तो मस्जिद से एलान हुआ कि इसाइयों का ‘क़ीमा बना दो।’ और यह सब हुआ एक सरासर झूठे आरोप में, जब अख़बार के पन्नों को क़ुरान के पन्ने बताकर क़त्ल-ग़ारत शुरु की गई। ऐसे हालात में जब पूरी कौम एक मज़हब है और मुट्ठी भर लोग ग़ैर-मज़हबी, वहाँ क्या बहुसंख्यको को ही अपने दीन की हिफ़ाज़त के क़ानून चाहिए? ये कैसे तर्क हैं जो ज़ालिम को हिफ़ाज़त देते हैं और मज़लूम को बेबस छोड़ देते हैं?
इसमें एक तथ्य यह भी है कि 1986 में जब से कठमुल्ले राष्ट्रपति ज़ियाउलहक़ ने ये क़ानून बनाये तब से ही अचानक कुफ्ऱ के मुजरिम कैसे बढ़ गए? क्या सख़्त क़ानून बन जाने से कोई जुर्म बढ़ जाता है या घटता है?

सीधी सी बात है कि इस क़ानून का इस्तेमाल - जायदाद, पड़ोसी, कारोबारी रंजिशों का बदला लेने के लिए हो रहा है, लेकिन कठमुल्लों, तालिबानों, सिपाह-ए-सहाबा और अनगिनत इस्लामी जमातों की गिरफ़्त के अंधेरे कुंए में गिरता पाकिस्तान इस वक़्त लाचारी की मिसाल बन चुका है जहाँ सही-ग़लत का शऊर ही नहीं बचा। मक़्तूल गवर्नर सलमान तासीर ने क़त्ल से कुछ वक़्त पहले ही अपने 24 दिसम्बर, 2010 के ट्वीट में लिखा था कि ‘‘एक इंसान और मुल्क को इस बिना पर इंसाफ़-पसंद समझा जाएगा कि वह अपने से कमज़ोर के साथ कैसा था, न कि ताक़तवर के साथ।’’ इसी तरह के दूसरे मामलों के मद्देनज़र मौजूदा सरकार तो इस लचर और अन्यायी क़ानून में बदलाव चाहती है पर कूढ़मग़ज़ कठमुल्लों, जो अब वहां बहुसंख्या में हैं, के आगे वह नतमस्तक है।
इसलिए पाकिस्तान की मौजूदा सूरतेहाल का मामला क़ौमी न होकर सारी दुनिया के मुसलमानों को असरअंदाज़ करता है, ख़ासकर उन मुसलमानों को जो इस्लामी मुल्कों में नहीं रहते। और दूसरी कौमें, दीन, अक़ीदे उनकी इबादत में, रहन-सहन मे रोड़े नहीं अटकाते। लेहाज़ा हिंदुस्तानी मुसलमानों, ख़ासकर आलिमों का यह फ़र्ज़ बनता है कि कठमुल्लों द्वारा कुफ्ऱ के नाम पर जो गै़र इस्लामी हरकतें ताक़त के ज़ोर पर की जा रही हैं, उन पर खुलकर अपनी राय दें, उनकी इसलाह करें और इसे साबित करें कि कैसे यह ग़ैर मुकम्मल क़ानून इस्लाम को शर्मिंदा कर रहा है।
इन मसलों पर चुप रहना या बोलना अब अपनी सुविधा का मामला नहीं रह गया है। यह हर उस मुसलमान का फ़र्ज़ है, जो दूसरे मुल्कों में हर तरह की आज़ादी का फ़ायदा उठा रहा है। हिंदुस्तानी मुसलमान/उलेमा/इदारे/तन्ज़ीमें अगर इस पर ख़ामोश रहे तो उन्हें बाबरी मस्जिद, सच्चर कमेटी, रंगनाथ मिश्र आयोग, और आज़ादी, हक़, इंसाफ़ पर भी ख़ामोश हो जाना चाहिए।
हिंदुस्तानी मौलानाओं को यह समझना पड़ेगा कि पाकिस्तान में असहिष्णुता के इस दौर में उन्हें सीधे-सीधे हस्तक्षेप कर उस सहिष्णु इस्लाम को स्थापित करवाने में रोल अदा करना है जिसका हवाला वे भारत में सरकार, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, मीडिया और सिविल सोसायटी को देते रहते हैं क्योंकि सेक्यूलरिज़्म यह नहीं होता कि आप जहां अल्पसंख्यक हैं वहां दूसरे मज़हबों के प्रति सहिष्णु हैं बल्कि सेक्यूलरिज़्म वह होता है जहां आप बहुसंख्यक हैं वहां दूसरे मज़हबों को कितनी जगह और इज़्ज़त देते हैं। आपके लिए यही समय है ख़ुद को, अपने मज़हब को सहिष्णु और इंसाफ़पसंद साबित करने का।

आसिया बीबी का मामला

आसिया बीबी पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की एक इसाई मज़दूर महिला है, जो इस वक़्त कुफ्ऱ-क़ानून के तहत सज़ा-ए-मौत की ज़द में है। पंजाब की अदालत ने सज़ा-ए-मौत देकर उसके बेक़ुसूर होने की हर शक ओ शुब्हा की गुंजाइश ख़त्म कर दी।
आसिया बीबी का मामला यह है कि उसने एक आम कुएं से पानी लेकर उस प्याले में पिया जो वहां बहरहाल सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए रखा रहता था। उसके पानी पीने पर वहां मौजूद दूसरी औरतों ने सख़्त एतराज़ किया कि वह ग़ैर मज़हब है और काफ़िर है। इस बात का विरोध करते हुए आसिया ने प्रतिवाद में इस्लामी मान्यताओं का ज़िक्र किया। उन औरतों का आरोप है कि आसिया बीबी ने मुहम्मद साहब की शान में गुस्ताख़ी की।
जबकि आसिया ने अपने दर्ज बयान में इसका खण्डन किया है और यह भी कहा कि उसको इस कानून में उसके इसाई होने की वजह से फंसाया जा रहा है।
ख़ैर, मामला दर्ज हुआ और मुकदमा चला। अदालत में उसे कुफ्ऱ का दोषी मानकर सज़ा-ए-मौत सुना दी गई। इस बीच ख़ुद पाकिस्तान की सिविल सोसायटी ने इस फ़ैसले के खि़लाफ़ तेज़ आवाज़ उठाई है।
लेकिन गवर्नर सलमान तासीर की जुर्रतमन्दाना हत्या की वजह से सेक्यूलर हलक़े दहशत में हैं। दूसरी तरफ़ कठमुल्लों के हौसले बुलंद हैं। मीडिया, इंटरनेट आदि पर इसके द्वारा बाक़ायदा अपील जारी की जा रही है कि पाकिस्तानी सरकार सेक्युलर जमातों और अल्पसंख्यकों के दबाव में आकर कहीं सज़ा-ए-मौत को कम न कर दे।
अल्पसंख्यकों और सेक्युलर जमातों की दलील है कि -
- आसिया बीबी और उस पर इल्ज़ाम लगाने वाले, दोनों ही ग़रीब, जाहिल और मज़दूर तबक़े से हैं इसलिए इनमें ब्लासफ़ेमी-ला की बारीकियों की बेदारी बहुत ज़्यादा नहीं रही होगी।
- दूसरे यह कि आसिया बीबी एक ग़रीब इसाई ख़ातून है, उसे अपने हालात का बेहतर अहसास है, भला वह कैसे बहुसंख्यक ग्रुप के सामने इतनी सीनाजोरी कर सकती है, जबकि वह ऐसा करने से इंकार भी कर रही है।
-तीसरी बात यह कि ख़ुद ब्लासफ़ेीम-ला अरसे से सवालों के घेरे में है क्योंकि वह न सिर्फ़ मज़हबी अल्पसंख्यकों बल्कि ख़ुद कमज़ोर सुन्नी मुसलमानों को भी क़ानूनी शिकंजे में फंसाने के लिए कई बार इस्तेमाल किया गया है।
यही नहीं, जायदाद हड़पने, ज़ाति-रंजिश और सियासी पटखनी देने के लिए भी इस क़ानून का बे-जा इस्तेमाल होता रहा है। आसिया बीबी की गुर्बत, माइनारिटी स्टेटस और महिला होने के नाते साफ़ ज़ाहिर है कि वह एक संगीन आरोप और हालात का सामना कर रही है।
इंसानियत-पसंद समाज को चाहिए कि वह न सिर्फ़ उसे सज़ा-ए-मौत से बचाने के इंतज़ाम करे बल्कि उसे जेल या बाहर जो भी ख़तरा है उसे देखते हुए, उसे, उसकी दो बेटियों व पति को किसी दूसरे सेक्युलर मुल्क में शरण लेने का भी बंदोबस्त करे, जिससे आसिया बीबी और उसके परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

गोजरा मामला

31 जुलाई 2009 को पंजाब के गोजरा इलाके़ में एक शादी में शराब पीकर हंगामा कर रहे युवक को रोकने से पैदा हुए बवाल को कुरान की बेहुर्मती का मामला बताकर ईसाई बस्ती के 50 से अधिक घर जला दिए गए, 9 ईसाइयों को मौत के घाट दिया गया। सरकार ने प्रभावशाली क़दम उठाते हुए 61 दंगाइयों को गिरफ़्तार किया और पीड़ितों को मुआवज़ा दिया।

हैदराबाद मामला

दिसंबर 2010, हैदराबाद के जाने-माने डॉक्टर नौशाद अली वलीयानी के पास मुहम्मद फ़ैज़ान नाम का मेडिकल रिप्रेज़ेनटेटिव अपने विज़िटिंग कार्ड पेश करता है। डाक्टर वलियानी उसे कूड़े के डिब्बे में डाल देते हैं। अगले दिन फ़ैज़ान और उस के साथी डॉक्टर के दफ़्तर पर ही उसे बुरी तरह पीटते हैं और फिर पुलिस के हवाले कर देते हैं कि इसने पैग़म्बर इस्लाम के नाम को कूड़े में डाला। लेकिन शहरी तन्ज़ीमों के दबाव के चलते उस पर ब्लासफ़ेमी के आरोप हटाने पड़े।

ब्लासफ़ेमी क़ानून से सम्बंधित आंकड़े-
1986 - 2005 तक के आंकड़े
धर्म..................आरोपी..............................मामले..................संदेहास्पद................कुल.................प्रतिशत
मुसलमान..........286................................170 ........................90.........................376.................... 50
अहमदी .............259 ................................79..........................04.........................263.....................35
इसाई................80..................................70............................09.........................89......................12
हिंदू..................12..................................07..........................................................12.......................2
अतिरिक्त..........04..................................04............................02...........................06......................1

इस क़ानून के बनने से पहले 1947 से 1985 तक महज़ 7 मामले ही आए थे, जिनमें तौहीन-ए-रिसालत का मामला उठा था।
-- प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका 'हंस' फ़रवरी 2011 से साभार.

Friday, February 25, 2011

'' कहाँ पहले जैसे जमाने रहे अब ! '' -- सुनील अमर

न शिकवे, शिकायत, बहाने रहे अब,
कहाँ पहले जैसे जमाने रहे अब !

वो ख्वाबों में मिलना, किताबो में मिलना,
वो चंदा पे मिलना, सितारों पे मिलना ,
वो मिलने के सौ-सौ बहाने भी गढ़ना ,
वो अपनों से बचना, वो गैरों से बचना ।

हर इक साँस में तुम, हर इक आस में तुम,
वो रो-रो के हॅंसना, वो हॅंस कर सिसकना।

बहकती सी पुरवा जो आई हुई है,
मिलन का संदेशा ये लाई हुई है ,
तेरे ज़िस्म को छूकर आई हुई है,
ये महकी है, थोड़ा लजाई हुई है।

न दिन-रात अपने, न जज्ब़ात अपने ,
न ख्वाबों पे बस, न ख्यालात अपने ।
अज़ब सा नशा एक तारी हुआ था
मेरे होश पर खूब भारी हुआ था ,
कहाँ इल्म था ये गुलाबों का टुकड़ा,
मेरी जिन्दगी पर दुधारी हुआ था ।

अचानक कि जैसे कहर टूटता है ,
शबे-वस्ल पर ज्यूं सहर टूटता है,
ये बरसों का रिश्ता भी कुछ ऐसे टूटा,
हवाओं से जैसे शज़र टूटता है ।


वो बचकर निकलना, वो कतरा के जाना,
वो रस्ते में मिलने पे आखें चुराना ,
वो खुद से सहमना, वो खुद में सिमटना ,
वो सूखे गले से बहाने बनाना ।

मैं सबसे परेशां , तू मुझसे परेशां ,
अचानक हुआ क्या, तू गाफ़िल, मैं हैरां !


ये बरसों की चाहत को बस गर्द समझा,
मेरे दिल के ज़ज्बात को सर्द समझा ,
न हमराज समझा , न हमदर्द समझा ,
मुझे तुमने इस दर्जा खुदग़र्ज समझा !

जरुरी नहीं था कि हम साथ रहते,
मुहब्बत पे रिश्तों का कुछ नाम रखते,
मुझे तेरी खुशियों से निस्बत थी हमदम,
ये जां भी मैं देता , तुम इक बार कहते !
ये दिल टूटने पर मैं रो भी न पाया,
जो भर आयीं आँखें तो आंसू छिपाया,
तुम्हारी कसम थी, सो उसको निभाया,
कहो तुम, कोई आज तक जान पाया ?

बहुत सोचता हूँ तुम्हें भूल जाऊॅं,
तुम्हारी तरह, कोई दुनिया बसाऊॅं,
तुम्हारी तरह ही हॅंसू, खिलखिलाऊॅं,
मैं खुश हूँ , बहुत खुश हूँ ,सबको दिखाऊॅं,

मगर दिल है अब भी तुम्हें चाहता है,
तुम्हें चाहता है............
तुम्हें चाहता है........

मैं फ़नकार, अब अपना फ़न बेचता हूँ ,
मैं नाकाम उल्फ़त का तन बेचता हूँ ,
ये ग़ज़लें , ये नज़्में , क़ता ये रुबाई ,
ये लिख-लिख के मैं अपना मन बेचता हूँ ।



ये सदमा मेरे दिल में घुटता रहा है,
ग़ज़ल बन के लफ़्जों में ढ़लता रहा है,
यही मेरा रोना है - गाना यही है ,
मेरी जिन्दगी का तराना यही है ।

कहाँ मेरे जैसे दीवाने रहे अब !
कहाँ पहले जैसे जमाने रहे अब !
न शिकवे, शिकायत, बहाने रहे अब !!
oooo

Thursday, February 24, 2011

लौह-पुरुष और उनका ब्लॉग ! -- सुनील अमर

लोहे में ही जंग लगता है, यह सनातनी जानकारी मैं उन लोगों को दे रहा हूँ जो लोहे को ही सर्व शक्तिमान मान कर अपने आदर्श पुरुषों को '' लौह-पुरुष'' की उपाधि से विभूषित कर देते हैं! बाद में इस लोहे में जंग लगा देखकर वे छि-छि कर दूर खड़े होते हैं कि कहीं उनका दामन भी गन्दा न हो जाये इस बुढ़ाते हुए लोहे के कारण !
इस 125 करोड़ की महा आबादी वाले देश में सिर्फ एक लौह-पुरुष और उनकी भी यह गति !
वर्ष 2004 में जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन अपने भारत का उदय कराने में असफल हो गया तो राजग के चतुर-सुजान लोगों ने ''भागते भूत की लंगोटी ही सही '' की तर्ज पर नेता-प्रतिपक्ष की कुर्सी हथियाने के लिए आपस में ही घुटना-टेक लड़ाई लड़ी.कायदे से यह कुर्सी भाजपा के वट-बृक्ष अटल बिहारी वाजपेयी को मिलनी चाहिए थी लेकिन प्रतिघात में चूँकि लौह-पुरुष का कोई जबाब नहीं,इसलिए वे यह कुर्सी झटक ले गए! उस वक़्त जिन लोगों ने अटल और अडवाणी को आमने-सामने खड़े देखा रहा होगा, उन्हें वाजपेयी के चेहरे की कातरता और अडवाणी के चेहरे की कुटिलता भी अच्छी तरह याद होगी. जिन लोगों ने शेक्सपियर का प्रसिद्द नाटक '' जुलिअस-सीजर पढ़ा है, उन्हें अवश्य ही वह दृश्य याद आ गया होगा जिसमे तलवार की चोट खाने के बाद सीजर अपने परम विश्वस्त ब्रुट्स से कहता है कि '' ब्रुट्स यु टू!'' कातर वाजपेयी की आँखें भी उस वक़्त मानों यही कह रही थीं कि '' आडवाणी, यू टू!'' '' अरे! सबने धोखा किया, सो किया लेकिन आडवानी तुम भी?''
समय का पहिया अगर गतिमान न होता और इतिहास अपने को दुहराता न होता तो भला लोहे में कभी जंग लग सकता था !
इस लोहे में जंग लगने की शुरुआत संभवतः 2005 में ही शुरू हुई, जिन्ना की समाधि से,
पत्रकारिता,राजनीति और पठन-पाठन के क्षेत्र में जो लोग हैं उन्हें जरुर याद होगा कि यही वह वक़्त था जब बाजपेयी की याददास्त ने साथ छोड़ना शुरू किया था और लौह-पुरुष की याददास्त ने जोर पकड़ना! लौह पुरुष को लाहौर में याद आया कि जिन्ना धर्मनिरपेक्ष थे और 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में हुआ बाबरी मस्जिद का विध्वंस बहुत गलत था! बाजपेयी की डूबती याददास्त से वे चौकन्ने थे, सो भूल न जाय , इसलिए उन्होंने कायदे-आज़म की समाधि पर रखे रजिस्टर में बाकायदा इसे लिख दिया ताकि सनद रहे और वक़्त पर काम आये !
तो दोस्तों! वक़्त भी आया और जो लिखा था वह काम भी आया!!
नागपुर ने इस लोहे में लग रहे जंग को गंभीरता से लिया और रेगमाल उठा कर साफ करना शुरू कर दिया.
नागपुर??
दुनिया में कुछ स्थान ऐसे हैं जो शक्ति-पुंज के तौर पर जाने जाते हैं.इनका नाम ही इनकी ताकत का पर्याय है. जैसे -- 10 डाउनिंग स्ट्रीट, व्हाईट हॉउस, 10 जनपथ, क्रेमलिन आदि. उसी तरह नागपुर भी है, यह संघ का मुख्यालय होने के साथ-साथ भाजपा का हवाई अड्डा भी है.इसकी सभी उड़ानें यहीं से नियंत्रित होती हैं.इधर इसने भाजपा के लिए पायलट भी देना शुरू कर दिया है. तो किस्सा-कोताह यह कि पहले लौह-पुरुष की अध्यक्षी गयी फिर वो कुर्सी जिसके लिए वो ''ब्रुट्स'' तक बन गए थे !
बेचारे लौह-पुरुष !!
फिर एक वक़्त ऐसा भी आया कि मक्खन सी मुलायम एक महिला ने इस लोहे की सारी अकड़ निकालते हुए संसद का वह कक्ष भी हथिया लिया जिसमें लौह-पुरुष बैठा करते थे. यह दुर्दिन !!
भारतीय राजनीति में जिसकी दशा '' भीलन लूटीं गोपिका,वहि अर्जुन,वहि बान '' सरीखी हो जाती है, वह पत्र-वत्र लिखने लगता है.जब कोई सुनता ही नहीं तो किया क्या जाय ? राम जेठ मलानी ने तो एक बार पत्र लिखने का ऐसा सिलसिला शुरू किया था कि मामला मार-कुटाई पर जाकर शांत हुआ था. अपनी-अपनी पसंद !
इधर जमाना बदल गया है और पत्र-वत्र न तो कोई लिखना चाहता है और न ही कोई पढ़ना चाहता है. अब ट्विट और ब्लॉग लिखा जाता है. हो सकता है कि दो-चार साल पहले का समय होता तो लौह-पुरुष पत्र ही लिखते लेकिन प्रचलित रिवाज के हिसाब से उन्होंने ब्लॉग लिखा और जिसे-जिसे पढ़ना ज़रूरी था, उन्होंने उसे पढ़ा भी ! उमा भारती ने भी पढ़ा और कल्याण सिंह ने भी .
नागपुर शायद ब्लॉग भी नहीं पढ़ता ! कौन फंसे विदेशी संस्कृति में!
उमा भारती ने तो तुरंत ही भोपाल से लेकर राम जन्म भूमि तक का एक चक्कर लगा लिया. यह एक टेस्ट-फ्लाईट थी. लेकिन नागपुर के ATC (वायु-यातायात नियंत्रक) ने उसे नोटिस में ही नहीं लिया!
बेचारी उमा भारती ! फिर उन्होंने खिसियाकर कहा कि अभी तो उन्होंने अपनी पार्टी से कोई सलाह-मशविरा किया ही नहीं है कि भाजपा में जाना है कि नहीं ! अरसा हुआ उनके यह कहे. अभी शायद वह अपनी पार्टी को खोज रही होंगी! मिले तो राय-मशविरा करें!
और लौह-पुरुष !
ब्लॉग और ट्विट लिखकर भी कई नेताओं ने अपना भविष्य बनाया है -- जैसे शशि थरूर !
ख़ैर ! यह कहने में कोई एतराज तो नहीं होना चाहिए कि --- '' गर्व से कहो ,मैं ब्लोगर हूँ !'' oo

Tuesday, February 22, 2011

ग्रामीण स्वास्थ्य के लिये तैयार होंगे ग्रामीण डाक्टर्स ---- सुनील अमर

देश के ग्रामीण क्षेत्र की बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं में आमूल-चूल परिवर्तन लाने के लिए केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया ने तीन वर्षीय पाठय-क्रम की जिस योजना पर काम शुरु किया है, वह अगर ठीक से परवान चढ़ सकी तो निश्चित ही कारगर साबित होगी। आश्चर्यजनक है कि इस योजना की रुपरेखा तैयार करने वाले सज्जन और खुद डाक्टर ही इस योजना का विरोध कर रहे हैं। हालाँकि डाक्टरों के ही एक कार्यक्रम में राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने इसे उपयोगी करार देकर तमाम अटकलों पर एक तरह से विराम लगा दिया है। यह किसी से छिपा नहीं है कि गॉवों में सरकारी और प्रशिक्षित दोनों तरह के डॉक्टरों की बेहद कमी है, जिसका नतीजा है कि वहाँ अकुशल या जिन्हें झोला छाप कहा जाता है, ऐसे डाक्टरों की भरमार है जो प्राय: ही जानलेवा साबित होते रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी चिकित्सालयों में जिन डाक्टरों की तैनाती की जाती है वे शायद ही वहाँ कभी रात्रि निवास करते हों, क्योंकि तमाम प्रकार की आवासीय दिक्कतों के कारण ऐसे डॉक्टर निकटवर्ती शहरों में अपना आवास बना लेते है और बहुत आवश्यक होने पर ही वे अपनी तैनाती के अस्पताल पर जाते हैं।

ग्रामीण इलाकों में मुख्य रुप से तीन तरह की चिकित्सा संबंधी समस्याऐं हैं। एक तो योग्य चिकित्सकों का अभाव, दूसरे, इसी वजह से तथाकथित झोला छाप डाक्टरों की भरमार तथा तीसरे, योग्य और सरकारी चिकित्सकों द्वारा अन्यान्य प्रलोभनवश महंगी दवाओं को लिखकर इलाज करना। यहाँ यह चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है कि देश के सरकारी अस्पतालों में प्रति व्यक्ति कितने रुपये का औसत बजट इलाज के लिए पड़ता है। ग्रामीण इलाकों में चिकित्सा में आने वाली सबसे बड़ी बाधा सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों का न रहना है। उनकी गैर मौजूदगी में कम्पाउन्डर ही डाक्टर का काम करते हैं। अब जो मरीज कम्पाउन्डर को नहीं दिखाना चाहते वे मजबूरी में प्रायवेट चिकित्सकों के पास जाते हैं, भले ही वह झोला छाप हो। ऐसे बहुत से नीम हकीम ख़तरे-जान लोगों ने बाकायदा नर्सिंग होम्स तक खोल रखा है! केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की गत वर्ष की रपट बताती है कि आजादी मिलने के समय देश में निजी अस्पतालों की जो संख्या मात्र 8 प्रतिशत थी, वो अब बढ़कर 68 प्रतिशत हो गयी है!

स्वास्थ्य मंत्रालय की इस नयी योजना में देश में मेडिकल स्कूलों की स्थापना की जानी है। जैसे कि नाम से ही स्पष्ट है, ये मेडिकल कॉलेज नहीं होंगें। यहॉ से पॉच साल के बजाय सिर्फ तीन साल में ही अपनी पढ़ाई पूरी कर एक नये तरह के डाक्टरों की खेप निकलेगी जो देश के देहाती क्षेत्रों को अपनी सेवायें देगी। ऐसे डॉक्टरों को बी.आर.एच.सी (बैचलर ऑफ रुरल हेल्थ कोर्स) की डिग्री मिलेगी। उनके पंजीकरण में ही इस तरह की बाध्यता होगी कि वे एक निश्चित परिधि या क्षेत्र में ही नौकरी या मेडिकल प्रैक्टिस कर सकेंगें। वैसे तो यह संकल्पना ही एक तरह का क्षोभ पैदा करती है कि देश में दो तरह की स्वास्थ्य सेवायें रखी जायं-शहरी लोगों के लिए उत्कृष्ट किस्म की और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए दोयम दर्जे की! फिर भी यह माना जा सकता है कि देश में संसाधनों की जो स्थिति है, उसमें अभी इस तरह की ही व्यवस्थाऐं हो सकती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जिस तरह से फर्जी डाक्टरों की भरमार है, उसके बजाय अगर बी.आर.एच.सी वहॉ उपलब्ध रहेंगें तो यह एक तरह से ठीक ही रहेगा।

लेकिन मूल समस्या सिर्फ इतनी सी ही नहीं है। अभी जिन सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों पर चिकित्सक मौजूद भी रहते हैं, मसलन, जिला चिकित्सालयों में, वहाँ का तजुर्बा भी मरीजों के लिए यही है कि या तो डाक्टरों द्वारा उन्हें बाहर से खरीदने के लिए मंहगी दवाऐं लिख दी जाती हैं, या यही काम मरीजों को घर बुलाकर किया जाता है और साथ में तमाम तरह की जॉच का पर्चा भी थमाकर। अध्ययन बताते हैं कि जॉच और मंहगी दवा के दुश्चक्र के कारण मरीज को दस गुना तक ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है। यही कारण है कि गरीब मरीज बीच में ही इलाज छोड़ देने को मजबूर हो जाते हैं। यह बीमारी किस तरह से दूर होगी, सरकार को इस पर भी विचार करना चाहिए। हालॉकि डाक्टरों को निर्देश हैं कि वे बाहर से खरीदनें के लिए दवा का पर्चा न बनायें लेकिन इलाज के लिए ड़ॉक्टर के पास गया मरीज उसकी बात मानेगा या सरकार की! दूसरी मुख्य समस्या है प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर डाक्टरों के रात्रि निवास न करने की। इसे कैसे बाध्यकारी किया जा सकता है, इस पर विचार किये जाने की आवश्यकता है। तीसरी और अहम् समस्या है मंहगे इलाज की। दवाओं की कम उपलब्धता और उनका घटिया होना भी एक चिकित्सक को बाहर की दवायें लिखने को प्रेरित करता है क्योंकि वह मरीज को ठीक करना चाहता है। ऐसे में एक परेशान हाल मरीज दवा कम्पनियों के दलालों और डाक्टरों की दुरभिसंन्धि का बेरहमी से शिकार बन जाता है। यह जानना दिलचस्प होगा कि दवा कम्पनियां अपनी दवाओं का ब्रान्ड नाम बनाती हैं और उनके प्रचार-प्रसार में बहुत धन खर्च करती हैं। इस प्रकार लागत और डाक्टर-स्टोरवालों का कमीशन जोड़कर ये दवाऐं खासी मंहगी हो जाती हैं, जबकि वही दवा जो जेनरिक यानी बिना ब्रांड-नाम के बाजार में उपलब्ध रहती है, उसकी कीमत चौथाई ही रहती है! छोटी दवा कम्पनियों के संघों का तो यहाँ तक कहना है कि यदि किसी प्रकार डाक्टरों और दवा विक्रेताओं को उपहार और कमीशन देने की प्रथा बंद हो जाय तो दवाओं की कीमत अपने आप आधी हो जाय! इसी क्रम में यह भी सोचने वाली बात है कि चिकित्सा के कार्य ने बीते दो दशक में उद्योग का रुप ले लिया है। मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी से लेकर पढ़ाई और नर्सिंग होम की स्थापना तक का कार्य अब भारी पूंजी का मोहताज हो चुका है। ऐसे में निजी चिकित्सा क्षेत्र से किसी रहम या खैरात की उम्मीद करना बेमानी ही होगा।

तीन वर्षीय बी.आर.एच.सी. डॉक्टर तैयार करने की केन्द्र सरकार की योजना वास्तव में देश के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित और स्थापित होने वाले सरकारी अस्पतालों के लिये डाक्टर उपलब्ध कराने की है। जब तक उपर वर्णित शेष दोनों व्याधियाँ भी न दूर की जायें, स्पष्ट है कि कोई खास सुधार हो नहीं पायेगा। जैसी कि योजना है, 200 बेड वाले जिला चिकित्सालयों में ही ऐसे स्कूल चलाये जायेंगें और उन्हें वहीं के सेवारत डाक्टर पढ़ायेंगें। इसमें शिक्षण कक्ष व छात्रावास आदि बनाने हेतु केन्द्र सरकार प्रति जिला चिकित्सालय 20 करोड़ रुपया देगी। उसका कहना है कि राजीव गाँधी राश्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अन्तर्गत राज्यों को जो धनराशि दी जा रही है वह डाक्टरों की कमी के कारण अस्पतालों में खर्च ही नहीं हो पा रही है। इस योजना का खाका वास्तव में मेडिकल काउन्सिल ऑफ इन्डिया के तत्कालीन अध्यक्ष डा. केतन देसाई ने तैयार करके केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद को दिया था। बाद में जब डा. देसाई को एमसीआई से निकाल बाहर कर दिया गया तो अब वे इसका विरोध करने लगे है।

आश्चर्यजनक यह है कि इस योजना के विरुध्द स्वयं डाक्टर्स ही हो गये है और वे 20 फरवरी को दिल्ली में प्रदर्शन करने पर आमादा हैं! वह तो अच्छा रहा कि एक्स रे एवं एम.आर.आई. डॉक्टरों के सम्मेलन में बीती 29 जनवरी को स्वयं राष्ट्रपति ने ही साफ कर दिया कि गॉवों को सस्ती चिकित्सा और डाक्टर सुलभ होने ही चाहिए। ( Also published in HAMSAMVET Features on 21 February 2011.May be clicked on humsamvet.org.in )

Tuesday, February 01, 2011

धर्म-परिवर्तन और वह भी खाली पेट का ! इससे बड़ा प्रहसन और क्या हो सकता है भला? -- सुनील अमर

प्रिय संपादक जी ,

संजय दिवेदी जी का लेख पढ़ा, बल्कि दो बार पढ़ा! बहुत करीने से , बहुत विस्तार से और बहुत सिलसिलेवार व्याख्या की है उन्होंने धर्म-परिवर्तन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर. वर्तमान से होते हुए अतीत तक जाकर उन्होंने यह बताया है कि धर्म कैसे एक निहायत व्यक्तिगत मामला है और कैसे प्रजा से लेकर राजाओं तक ने अपनी मर्जी और पसंद के मुताबिक धर्म-परिवर्तन किया है! अच्छा लगा!
लेख जब पढ़ना शुरू किया तो लगा था कि आदिवासियों पर संघ द्वारा किये जा रहे तमाम कार्यक्रमों को लेकर एक आदिवासी-बहुल इलाके में जो कुम्भ सरीखा आयोजन होने जा रहा है, जरुर ही उसमें उन्ही को केन्द्रीय तत्व के तौर पर रखा गया होगा . लेख का शीर्षक भी यह बताता लग रहा था कि अवश्य ही इसमें आदिवासियों की मूलभूत समस्याओं पर चर्चा होगी, लेकिन यह चर्चा -जल, जंगल, जमीन जैसी संज्ञाओं से आगे नहीं गयी! मैं बहुत आशान्वित था कि तथाकथित विकास के नाम पर आदिवासियों का जिस तरह उच्छेदन किया जा रहा है, और जिस वजह से वे नक्सालियों से सहानुभूति रखने को विवश हैं , उस पर भी रौशनी जरुर डाली गयी होगी, लेकिन निराश ही हुआ! यहाँ मैं यह कहना चाहता हूँ कि आदिवासियों की समस्याएँ सिर्फ जल-जंगल-जमीन तक ही सीमित नहीं हैं. उनके साथ भी उसी तरह का दोहरा अत्याचार हो रहा है, जैसा कि जम्मू-कश्मीर के निवासियों के साथ आतंकवादी और सेना के जवान कर रहे हैं !संपादक जी , मैं संजय जी से कहना चाहता हूँ कि आदिवासियों का मूल सवाल धर्म-परिवर्तन है ही नहीं ! धर्म रोटी से बढ़कर नहीं हो सकता ! रोटी के बाद ही धर्म का नंबर आता है! और आदिवासियों की मूल समस्या तो Survival यानि जीवन-संग्राम में टिके रहने की है !
क्या ही अच्छा होता, अगर इस मौके पर इन्ही मूल समस्याओं को लेकर एक Eye -Opener मार्का लेख लिखा गया होता, जो हो सकता है कि महा-कुम्भ में कुछ लोगों की निगाह से जरुर गुज़रता और अपना काम कर जाता!
मैं संजय जी की कई बातों से बहुत संजीदगी से सहमत हूँ, जैसे इस लेख का अंतिम पैराग्राफ ! वास्तव में इस लेख का उपसंहार ही इसका समूचा धड़ बन गया है! संजय जी अगर अन्यथा न लें तो मैं आग्रह करना चाहता हूँ कि वे, जब भी समय और सहूलियत पायें, इस पैराग्राफ को अपनी लेखनी चलाकर जरा बड़ा फलक दें तो हम लोग उस पर नए सिरे से बहस शुरू करें!
धर्म-परिवर्तन और वह भी खाली पेट का ! इससे बड़ा प्रहसन और क्या हो सकता है भला? यह दूसरे धर्म के प्रति ललक नहीं बल्कि एक सड़े धर्म से उपजी जुगुप्सा पर प्रतिक्रिया और कहीं रोटी मिल जाने की उम्मीद भर ही है! जहाँ भी यह उम्मीद दिखेगी, जुगुप्सित और भूखे लोग वहां-वहां आते-जाते रहेंगें ! उन्हें कोई भी मिशनरी या संघ रोक नहीं पायेगा.
संजय जी को साधुवाद ! बहुत सही समय पर उन्होंने एक राष्ट्रीय मसले को बहस की शक्ल दी है. उम्मीद है कि उक्त कार्यक्रम संपन्न हो जाने के बाद एक बार फिर उनकी प्रतिक्रिया जानने को मिलेगी!(यह लेख pravakta.com पर छपे श्री संजय द्विवेदी के लेख की प्रतिक्रिया में है )

Wednesday, January 26, 2011

बच्चों में बढ़ती क्रोध और आत्महत्या की प्रवृत्ति --- सुनील अमर

सुश्री शीबा फ़हमी
दिल्ली में कक्षा दो में पढ़ने वाले आठ वर्षीय एक बालक ने गत सप्ताह माँ द्वारा खेलने से मना किये जाने पर फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली। बीते एक पखवारे में ही देश के कई शहरों से बच्चों द्वारा आत्महत्या कर लेने की कई घटनायें प्रकाश में आई हैं। ज्यादा चिंतनीय यह है कि ये बच्चे दस साल से भी कम उम्र के थे। एक ऐसी उम्र, जिसमें माना जाता है कि बच्चा खाने और खेलने के अलावा कुछ जानता ही नहीं, और इसी उम्र में ही जिन्दगी के खिलाफ इतना बड़ा फैसला! देश में लगभग एक दशक पहले जब टी.वी. चैनलों पर धारावाहिकों का तूफानी दौर जारी हुआ, ऐसे तमाम विज्ञापन और कथाऐं आईं, जिनकी नकल में बहुत से मासूम बच्चे अपनी जान गवाँ बैठे। ऐसे कार्यक्रमों पर उस वक्त रोक लगाने की माँग भी देश में उठी और उनमें परिवर्तन भी हुए। वे घटनायें नकल में थीं इसलिए चिंताऐं भी हल्की थीं कि नकल के स्रोत जब बंद कर दिये जाऐंगें तो बच्चों की यह प्रवृत्ति भी रुक जायेगी। आगे चलकर कुछ हद तक ऐसा हुआ भी, लेकिन माँ-बाप के डॉटने या रोक लगाने से आहत होकर मासूम बच्चे गले में फंदा डालने जैसे हौलनाक काम को अंजाम देने लगें तो यह किसी भी जागरुकऔर सामाजिक व्यक्ति की नींद उड़ा देने वाली घटनाऐं हैं! ये घटनाऐं यह सवाल उठा रही हैं कि जिस समाज में हम जी रहे हैं और जिस समाज का निर्माण हम कर रहे हैं, क्या वह यही समाज है?

यह कहा जा सकता है कि आत्महत्या की प्रवृत्ति पूरी दुनिया में लगातार बढ़ी है और न सिर्फ साधारण, बल्कि अपनी काबलियत, सफलता और समझ-बूझ की धाक जमा चुके लोगों द्वारा भी खुदकुशी की जा रही है। लेकिन इसके कारण और निवारण दूसरी तरह के हैं जबकि नन्हें-मुन्नों में पनप रही इस प्रवृत्ति के सर्वथा दूसरी तरह के और ज्यादा चिन्तनीय भी। आत्महत्याओं पर हुए मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय अध्ययन बताते हैं कि जिन्दगी जीने के सारे रास्तों के बंद हो जाने का विश्वास ही किसी व्यक्ति को खुदकुशी के मुकाम तक ले जाता है। लेकिन इस तरह का विश्वास किसी छह साल, आठ साल के बच्चे में आने लगे, जिसे अभी यही नहीं पता कि जिन्दगी क्या है और जिन्दगी जीने के तरीके और रास्ते क्या होते हैं तो किसी भी देश-समाज के लिए इससे ज्यादा चिंतनीय बात और क्या हो सकती है?

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय की फेलो, पत्रकार और समाजशास्त्री सुश्री शीबा फ़हमी कहती हैं कि इस उम्र के बच्चों में 'सेल्फ रेस्पेक्ट' यानी आत्म-आदर की प्रवृत्ति बहुत ज्यादा होती है। होता यह है कि कई बार माँ-बाप अपने बच्चों को सबके सामने विशेषकर उनके दोस्तों के सामने बुरी तरह झिड़क, डॉट या मार देते हैं, इससे बच्चा आहत हो जाता है और बाद में उसके ऐसे ही दोस्त उसको चिढ़ाने या मजाक बनाने लगते हैं तो खिसियाहट के फलस्वरुप बच्चे में आत्मघाती सोच बनने लगती है और आगे की कोई ऐसी ही झिड़क या डाँट बच्चे को जीने-मरने के मुकाम पर ला खड़ा कर देती है। शीबा कहती हैं कि हममें यानी समाज में एक बच्चे की 'इन्डिविजुअल्टी'(वैयक्तिता) स्वीकारने की आदत ही नहीं है। हम यह मानते ही नहीं कि बच्चे का भी कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व है। हम अपने बड़े होने, माँ-बाप होने के घमंड में ही चूर रहते हैं। जब तक औलाद मुंह बंद कर देने लायक कमाई न करने लगे, हम उसकी हैसियत ही नहीं समझते।

संयुक्त परिवारों के विघटन ने इस बीमारी को और घातक कर दिया। सुश्री शीबा कहती हैं कि आज हममें निजता बहुत ज्यादा आ गई है। पहले बच्चे एक तरह से कम्युनिटी में पलते थे और सब एक-दूसरे के बारे में जानते रहते थे। आज जब परिवार का तात्पर्य सिर्फ माँ-बाप और बच्चों से ही रह गया है तो ऐसे में बच्चों में भी एकांतता और निजता घर करती जा रही है। उनमें असुरक्षा की घातक भावना पैदा हो रही है। ऐसे माहौल में पलने वाले बच्चे बहुत जल्द ही मायूस हो जाते हैं।

अभी ज्यादा अरसा नहीं हुआ जब यह कहा जाता था कि संयुक्त परिवार या यों कहें कि परिवार में दादी-दादा का होना बहुत ही आवश्यक होता है, खासकर बच्चों के संदर्भ में, लेकिन समाजशास्त्री शीबा कहती हैं कि यह कुछ हद तक ही सही और उपयोगी है। वे कहती हैं कि दादी-दादा से सुकुन और छाया मिलने वाली स्थितियों में इसलिए बदलाव आ गया है कि अब खुद दादी-दादा ही पहले जैसे नहीं रह गये हैं, क्योंकि आज की युवा कुंठित और भटकी कही जाने वाली पीढ़ी ही तो आगे चलकर दादी-दादा की भूमिका में आ रही है! शीबा कहती हैं - इसका दूसरा पहलू यह है कि यही दादी-दादा तो घर में सास-ससुर की भूमिका में भी रहते हैं और बच्चे की माँ का तमाम प्रकार से जानलेवा उत्पीड़न करते रहते हैं! घर का मासूम बच्चा विस्फारित नेत्रों से यह सब कुछ भी तो देखता रहता है। उसके लिये ये दादी-दादा कितना आश्वासनकारी हो सकते हैं? इस चिन्ता का एक दूसरा कारक स्कूल और वहाँ दी जाने वाली शिक्षा का मौजूदा तौर-तरीका भी है। घर से भी ज्यादा तनावपूर्ण माहौल आजकल बच्चों को स्कूल में मिलता है। प्राय: ऐसा होता है कि घर से राजी-खुशी स्कूल गया हुआ बच्चा रोनी सूरत बनाये हुये घर लौटता है। कई बार तो वह ऐसा गुमसुम होता है कि अपने में ही मशगूल रहने वाले मॉ-बाप उसे साधारण तौर से बीमार मानकर उसका इलाज कराने लगते हैं, जबकि उसकी बीमारी की जड़ और दवा वास्तव में वे खुद ही होते हैं! लेकिन बीमारी में सबसे आसान काम तो डाक्टर के पास जाना होता है, बाकी सारे काम कठिन ही होते हैं! इधर के दो दशक में हमारे समाज की संरचना और उसकी जरुरत जिस तरह और जिस तेजी से बदली है, ऐसा पहले कभी नहीं था। समाज में आ रहे आमूल-चूल बदलाव के लिहाज़ से जीवन के जो क्षेत्र अपने को साध नहीं पा रहे हैं, मातृत्व-पितृत्व भी उन्हीं में से एक है। सुश्री शीबा कहती हैं कि खाना, कपड़ा, छत और स्कूल मुहैया करा देना ही माँ-बाप के मायने नहीं हैं। यह काम तो यतीमखाने भी कमो-बेश करते ही हैं। असल चीज है यह जानना कि बच्चों का लालन-पालन कैसे किया जाय। इसके लिए जरुरी है कि युवा जब शादी करने की स्टेज में हों तो उन्हें 'पैरेन्टिंग' यानी मातृत्व-पितृत्व के बारे में जानकारियॉ दी जॉय। यह चाहे पढ़ाई के दौरान हो या विशेष अभियानों द्वारा। वे कहती हैं कि समाज में जो तबका गरीब है वहाँ इस तरह की वारदातें न के बराबर हैं, क्योंकि एक तो वहाँ धुल-मिलकर रहने की परिस्थितियाँ ज्यादा हैं और निजता नाम की चीज़ प्राय: होती ही नहीं, दूसरे ऐसे समाज के बच्चों में 'सेल्फ रेस्पेक्ट' और 'सेल्फ इस्टीम' यानी आत्म सम्मान और आत्म मुग्धाता जैसी किसी भावना की कोई गुंजाइश शुरु से ही नहीं होती। इसलिए वहॉ आत्महत्या की हद तक जाने जैसी हताशा और निराशा भी कभी नहीं होती।

ओशो ने कभी कहा था कि आज के समाज में बच्चा पैदा होना एक दुर्घटना सरीखा है। वास्तव में आज की तैयार हो रही नयी पीढ़ी के मिजाज में बच्चे सर्वाधिक 'एब्यूज्ड' हैं। कारण जो भी हों लेकिन सुखद यह है कि ग्रामीण भारत में अभी यह बीमारी नहीं पहुची है। संयुक्त परिवार भी जो कुछ बचे हैं, गॉवों में ही हैं। शहरों की पारिवारिक सेहत सुधारने के लिए गॉवों का अध्ययन किया जाना चाहिए। (Also published by feature agency humsamvet.org.in on 24 January 2011)

Thursday, January 20, 2011

...हम जैसे बहुत लोग डार से बिछड़े ही हैं --- सुनील अमर

अरसा पहले अमृता प्रीतम का उपन्यास पढ़ा था -- डार से बिछड़ी . डार यानी डेरा यानी घर ! इधर संयोगवश अपने गाँव में थोड़ा लम्बा वक़्त गुजारना पड़ा तो लगा कि मैं भी डार से बिछड़ा ही हूँ .
मेरी माँ श्रीमती सुशीला त्रिपाठी (84 ) कई गंभीर बीमारियों से ग्रस्त थीं और तमाम इलाज के बाद डाक्टरों ने कह दिया कि अब इन्हें घर ले जाकर इनकी सेवा करिए. इस तरह की ''सेवा'' का अर्थ लगभग सभी लोग समझते हैं, सो मैं भी समझ गया. इकलौता पुत्र और आज की भाषा में single होने के कारण लगभग तीन महीना मैं उनकी सेवा में ही दिन-रात लगा रहा.इसी बहाने गाँव को थोड़ा ताज़ा-ताज़ा जाना भी . माँ गाँव में ही रहती थी.बीते महीने उनका देहावसान हो गया.
वैश्वीकरण और संचार-विस्फोट के बावजूद गाँव अभी कमोबेश गाँव बने हुए हैं,रहन-सहन में जिस तरह अमीरी-गरीबी पहले दिखती थी, उसी तरह आज भी दिखती है. गाँव में जो लोग अमीर हो गए हैं, उन्होंने अपने सामाजिक सरोकार दूसरी तरह के कर लिए हैं लेकिन जो अमीर नहीं हैं उनका जीवन-यापन का तौर-तरीका अभी ज्यादा स्वाभाविक और प्राकृतिक है. एक-दूसरे के सुख-दुःख में उनकी सहभागिता अभी भी ज्यादा सहज है.और हम जैसे लोग तो घर-परिवार वहीं रहने के बावजूद NRV यानी '' non resident villager '' सरीखे हो गए हैं! एक-दो घटनाओं ने बहुत आहत किया --
१- शाम का समय था और मैं टहलते हुए खेतों की तरफ काफ़ी दूर चला गया था. ठंढक की वजह से कपड़ों से लदा-फदा मैं मोबाइल पर दिल्ली अपनी एक दोस्त से बातें करने में मशगूल था.कुछ देर बाद लगा कि जैसे कोई पुकार रहा है. धुंधलका सा हो चला था फिर भी देखा कि थोड़ी दूर पर एक बृद्ध महिला कांख में कुछ सामान दबाये आ रही थी और वही मेरी दिशा में मुखातिब थीं.दूरी और धुंधलका होने के कारण पहचान नहीं पा रही थीं, इसीलिए स्थानीय अवधी बोली में वे '' के होय? तनी सुना तौ? '' की हांक अधिकारपूर्वक लगा रही थीं. फोन बंद करके मैं उनके पास गया .''पायलागी'' किया और पूछा कि क्या है.
मुझे नजदीक से देखने और पहचानने के बाद उन वृद्धा के चेहरे का भाव ही बदल गया.जैसे कोई अपराध उनसे अनजाने में हो गया हो, बहुत कातर स्वर में उन्होंने कहा कि ,'' अरे बचवा तू ह्वा ! चीनेह्न नाय ( पहचाने नहीं ) बच्चा! ''
मैं ख़ुद ही झेंप गया और बोला कि '' का बात है माई बतावा तौ ?''
'' नाही बच्चा, कुछ नाय , तू जा टहरा ( घूमो-टहलो ), हम चिनेह्न नाय तुहैं बच्चा!''
मेरे कई बार पूछने पर भी उन्होंने काम नही बताया तो मैं खिसियाकर चला आया. मैं जानता था कि किसी काम से ही उन्होंने पुकारा था.
लगभग उसी वक़्त गाँव के ही मुझसे उम्र में काफ़ी बड़े एक सज्जन वहां से गुजरे तो उन वृद्धा ने उन्हें जोर से पुकार कर अपनी कांख में से गिर रहे सामान को पकड़ाकर कहा कि इसे उनके घर तक पहुंचा दें .
वे दोनों चले गए और मैं बड़ी देर तक वहीँ खिसियाया सा बैठा रहा.जो अधिकार, जो लगाव और जिस विश्वास से वृद्धा ने उनसे अपने काम के लिए कहा, मुझसे नही कहा, जबकि मैं भी उसी गाँव का रहने वाला और उन वृद्धा का घर-परिवार से उतना ही नजदीकी हूँ जितना कि वे सज्जन, लेकिन समीकरण रिश्ता बना सकते हैं, लगाव नहीं ! मै बाहरी आदमी हो चुका हूँ अब!
२ -- इधर मौसम बहुत ख़राब था. दिन भर कुहरा और बदली! मौसम का मिजाज़ बेहद ठंढा! टहलने निकला था तो देखा कि गाँव के बाहर लड़के वालीबाल खेल रहे थे! देखते ही गरमी का एहसास हुआ! 25 साल पहले के दिन याद आ गए जब हम भी खेला करते थे! मन में खेलने की तीब्र इच्छा जग रही थी लेकिन कहने में संकोच हो रहा था तभी एक लड़के ने कह ही दिया कि आइये चाचाजी आप भी खेलिए. खेलने का अभ्यास तो न जाने कब का छूट चुका था ही बस शौक बुझाने लगा. बार-बार गलतियाँ हो रही थीं . लड़कों के खेल में भी बाधा पड़ रही थी लेकिन वे मुझे झेल रहे थे! उनमें से एकाध लड़के आँखों ही आँखों में मेरी तरफ कटाक्ष भी कर रहे थे फिर भी मुझे मेहमान समझकर वे तमाम लड़के खेलाते रहे. आपस की ज़रा सी गलती पर वे लोग खूब चाँव-चाँव करते लेकिन मुझसे एक सम्मानजनक दूरी वे सब बनाये रखे.यह सम्मान जब थोड़ी देर बाद असह्य होने लगा तो मैं ख़ुद ही वहाँ से खिसक आया !
कभी-कभी सम्मान भी कितना खलने लगता है, यह बड़ी शिद्दत से महसूस किया मैंने!
अपना ही गाँव और अपना ही घर फिर भी यह बेगानापन !
घर लौट कर माँ के पास बैठे-बैठे मै सोचता रहा कि अब मेरे लिए अपनापन किस जगह बचा हुआ है? लखनऊ में जहाँ कि मैं रहता हूँ या दिल्ली,मुंबई,अहमदाबाद , उत्तराखंड और ऐसी वे तमाम जगहें जहाँ मैं आता-जाता रहता हूँ ? कहीं तो नहीं! जैसे आपस में घुल-मिलकर गाँव वाले रह रहे हैं, क्या दुनिया के किसी कोने में वो आत्मीयता मेरे लिए मौजूद है ? शायद नहीं ! और शायद क्या बिल्कुल नहीं.
न गाँव के रहे और न बाहर के ! न घर के और न घाट के !!
यह भी सोचा कि अगर मैं यहीं गाँव आकर रहने लगूँ तो क्या कुछ समय बाद मैं भी उन सबमें घुल-मिल जाऊंगा? उनका लगाव हासिल कर लूँगा?
काफ़ी देर बाद मेरे मन ने कहा नहीं, बहुत मुश्किल है अब. एक लेखक-पत्रकार होने की जो खोल इतने वर्षों से मैंने ओढ़ रखी है,शहर में रहने की एक आदत, जो मुझमें बन गयी है, उसे उतार फेंकना और इन सब में समाहित हो जाना इतना आसान नही!
नगरीय-संस्कृति का भी तो नही हो पाया मैं ठीक से!
तो कहाँ से जुड़ा हूँ मैं ?
और कहाँ का होकर रह गया हूँ ?
शायद कहीं का नहीं !
जैसे-जैसे उम्र बढ़ेगी, यह एहसास शायद और कचोटने लगेगा मुझे.

Tuesday, January 18, 2011

“जेंडर जेहाद” के हक़ में ''--''शीबा असलम फहमी”

हफ्ते की मुलाकात में इस बार हमारे बीच हैं स्त्री अधिकारों के मामलों में बिलकुल अलग ढंग की सोच रखने वाली शीबा |शीबा असलम फहमी के लिए धर्म की अपनी परिभाषाएं हैं ,शीबा असलम फहमी को हम देश की उन चंद महिलाओं में गिन सकते हैं जो न सिर्फ मुस्लिम बल्कि हर तबके की महिलाओं के लिए अपनी कलम और अपनी जबान से संघर्ष कर रही हैं न सिर्फ संघर्ष कर रही हैं बल्कि स्त्री विरोधी ताकतों को पराजित भी कर रही हैं |आइये बात करते हैं शीबा से |इस पूरी बातचीत को आप आडियो फार्मेट में हमारी वेबसाईट में “हफ्ते की मुलाकात” कालम में सुन भी सकते हैं--आवेश तिवारी


आवेश तिवारी -शीबा आप क्या मानती हैं तीसरी दुनिया के देशों में ” जेंडर जेहाद “कितना सफल रहा है |और इनके सफल या असफल होने की वजह क्या है ?
शीबा असलम फहमी – तीसरी दुनिया के देशों में जेंडर जेहाद यानि नारीवादी आन्दोलन बहुत अच्छा चल रहा है ,जब हम तीसरी दुनिया के देशों की बात करते हैं तो ये वो देश हैं जो निजी विषमताओं से अनवरत गुजर रहे हैं ,जब हम स्त्री विमर्श की बात करते हैं तो ये अमेरिका की पश्चिमी देशों की गोरी महिलाओं का स्त्री विमर्श नहीं होता ,ये हमारा, हमारी मिटटी से उपजा स्त्री विमर्श है ,हमारे हालात के हिस्साब से जो स्त्रियों की मूलभूत समस्याएं हो सकती हैं हल हो सकते हैं उनमे से हल ढूंढ़ता हुआ स्त्री विमर्श है ,और निश्चित तौर पर ये सफल हो रही है अगर कोई दीवार २०१ हथौड़ों में टूटती है तो पहले के २०० हथौड़ों के वार को नाकाम नहीं कहा जा सकता |,उन २०० हथौड़ों की मार की वजह से २०१ वा हथौड़ा कामयाब हुआ है |कोई भी समस्या हो इस धरती पर हम सबका योगदान समस्या और समाधान के बीच की दूरी के गप को थोडा कम करने का हो सकता है ,हमारे पास या किसी के पास इन समस्याओं का पूरा हल नहीं होता


आवेश तिवारी -आपको क्या लगता है इस्लाम मुल्लाओं और हिंदुत्व पंडितों के चंगुल से कब तक मुक्त हो पायेगा ,क्या इस स्थिति से आप कभी निराश होती हैं
शीबा असलम फहमी - मै फिर कहूँगी मै बिलकुल निराश नहीं होती.पिछले जमानों में जब हम सोच नहीं सकते थे हमारे पास भाषा नहीं थी अधिकारों की ,मगर आज समय बदल रहा है ,मुझे आपके शब्द पर आपत्ति है जो आपने पंडितवाद कहा ,मुझे ब्राम्हणवाद ज्यादा उपयुक्त शब्द लगता है कई पंडित ऐसे हैं जो खुद ब्राम्हणवाद से पीड़ित हैं ,बहुत से पंडित हैं जो खुद ब्राम्हणवाद के खिलाफ हैं ,इत्फकान हम जिस किसी परिवार में पैदा हुए उसकी वजह से हम उसे कुछ नहीं कह सकते ,यही बात मौलानाओं के सम्बंध में भी मै कहना चाहूंगी कि ये पहचान करनी चाहिए की प्रगतिशील मौलाना कौन हैं ? और वो इसी समाज में हैं ,और बहुत सारे हैं ,अभी जनवरी की बात है अब तक कहा जाता था कि मुसलमान लड़कियां गैर – मुस्लिम लड़कों से शादी नहीं कर सकती ,लेकिन जर्मनी के एक मौलाना ने फतवा दिया की नहीं मुस्लिम लड़कियां अगर किसी ऐसे लड़के से मोहब्बत करती हैं जो इस्लाम से बाहर का है तो वो उससे शादी कर सकती हैं |अगर आप देखें तो ये आज के समय में क्रांतिकारी बात है |मुझे लगता है खासकर औरतें ,समाज का गैर ब्राम्हणवादी तबका जिनमे ब्राह्मण भी हों और मौलाना मिल बैठे तो कई समस्याओं का समाधान संभव है |मुझे लगता है कि इन समस्याओं और इन सस्याओं के हल के जर्नलाइजेशन से परहेज करना चाहिए

आवेश तिवारी -आज देश में मुस्लिम महिलाओं में साक्षरता का प्रतिशत बेहद कम है ,आपको क्या लगता है ऐसा क्यूँ है इसके पीछे कौन सी वजहें हैं
शीबा असलम फहमी -देखिये देश में जो मुस्लिम महिलाओं में साक्षरता का प्रतिशत था वो पहले से बेहतर है ,जब उनको कम्पेयर करते हैं तो हाँ कम हैं ,लेकिन जब हम इनकी पहले कि अपेक्षा बेहतरी को देख रहे हैं तो हमें उन कारणों को चिन्हित करके जिनकी वजह से वो बेहतर हुआ है ,उन पर और काम करना चाहिए ,दूसरी बात ये है कि तमाम पुरुष सत्तात्मक समाज में जहाँ पर अधिकतर सत्ता ख़ास तौर से धार्मिक सत्ता मर्दों के हाँथ में होती है ,औरतों की उपयोगिता इतनी संकुचित कर दी जाती है कि आज भी हमारे मौलाना कह देते हैं कि औरतों को पार्लियामेंट में न जाकर ,पार्लियामेंट में जाने लायक लड़के पैदा करने चाहिए,ये तो प्लूटोनिक तर्क है| प्लूटो ने एक जमाने में कहा था कि औरतों को चाहिए की बलशाली और समाज उपयोगी मर्द पैदा करें |,ये इस्लाम पूर्व की एक धारणा है ,आज मौलाना इसी तरह सोचते हैं ,बात करते हैं, और मीडिया उनको कवर कर रहा है |लेकिन हाँ ,हम बहुत मजबूती के साथ उनका जवाब दे रहे हैं ,उनको मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं, उनको चैलेन्ज कर रहे हैं और उनकी खिल्ली उडा रहे हैं ,ये सच है आज हम जिस स्थिति में हैं उससे बहुत अधिक आशान्वित हैं |

आवेश तिवारी -शीबा अगर हम हिंदुस्तान की बात करें तो आपको क्या लगता है महिलाओं में जो विचारधारा से जुडी गुलामी है वो कब तक ख़त्म हो पायेगी ,इसके लिए किस किस्म के संघर्ष किये जाने की जरुरत है |
शीबा असलम फहमी – मैंने अभी हाल में लिखा है ,समाज जिन हथियारों से लैस करके बेटों को, लड़कों को दुनिया का सामना करने के लिए उतारता है जब उन हथियारों से बेटियों को भी लैस करने लगेंगे तो वो भी उसी मजबूती से दुनिया का सामना करेंगी |जब कोई पुरुष अपने घर ,बाहर या समाज में किसी भी स्तर पर किसी उलझन में फंस जाता है तो वो जिस साहस के साथ और जिस आत्मविश्वास के साथ उन परिस्थितियों का सामना करता है उस साहस और आत्मविश्वास के पीछे जो कारण काम करते हैं अगर औरत के लिए भी उन वजहों से जुडी ताकत होगी तो वो कभी भी अपने आत्मसम्मान के साथ समझौता नहीं करेंगी ,चाहे वो पति के साथ हो ,ससुराल में हो ,सास के साथ हो,काम करने की जगह हो या समाज में कहीं पर भी हो |आप देखिये कि आप लड़कियों को हाथ- पैर तोड़कर लंगड़ा और लूला बनाकर समाज में झोंक देते है कि जाओ समाज का सामना करो ,चाहे उन्हें आप ससुराल भेजते हों या काम करने की जगह पर भेजते हों |आप उसे शिक्षा तो दे देते हैं क्यूंकि सरकारी तौर पर शिक्षा मिल रही हैं आप उसे संपत्ति में हिस्सा क्यूँ नहीं देते ,उसे मजबूत बनाइये उसके पास इतने साधन हों कि कल को अगर उन्हें अपने पति से अलग होना पड़े उन्हें अपना काम छोड़ना पड़े तो कम से कम उनके पास पेट भरने को तो हो ,जब ऐसा हुआ तो वो मजबूती से समाज में उतरेंगे और वो भी मजबूती से अपने से फैसले करेंगी |

आवेश तिवारी -शीबा आज हम अल्पसंख्यक महिलाओं की बात करते हैं शहरों कस्बों की महिलाओं की बात करते हैं उनके सरोकारों उनकी समस्याओं की बात करते हैं ,लेकिन गाँवों में ,टोलों में रहने वाली महिलाएं हैं ,आदिवासी महिलायें हैं उनकी चर्चा बहुत कम होती है आपको क्या लगता है इसकी वजहें क्या हैं ?

शीबा असलम फहमी -देखिये ,नारीवादी आन्दोलन देश की ग्रामीण आबादी में लीडरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम का सफलतापूर्वक क्रियान्वयन कर रहा है| दूर दराज के क्षेत्रों में जाकर वहां की औरतों को उनके अधिकारों को बता रहा है कि जिन विषमताओं से आप गुजर रही हैं वो विषमतायें आपकी किस्मत नहीं हैं,संसाधनों का आप तक नहीं पहुंचना भगवान की परीक्षा नहीं है इसकी वजह सरकार और दुनिया भर के कार्पोरेट्स हैं, इसमें सिर्फ समाज ही शामिल नहीं है |आज राजस्थान में जो पानी की समस्या है वो औरतों से सीधी जुडी समस्या है ,जिसमे कार्पोरेट्स भी शामिल है ,जिस तरह से जंगल ख़त्म हो रहे हैं उनका सीधा असर गाँव की महिलाओं पर पड़ रहा है उनकी रसोई से है |जरुरत इस बात की है कि इन आदिवासी महिलाओं ,गाँव की महिलाओं में नेतृत्व क्षमता विकसित की जाए ,उनका नेता दिल्ली से क्यूँ आएगा, सिविल सोसायटीज को इसके लिए आगे आना होगा |

आवेश तिवारी – शीबा आपको लगता है कि नहीं मीडिया भी महिलाओं को लेकर दोहरे मापदंड अपना रहा है ,नोयडा में किसी देर रात की पार्टी से घर लौट रही महिला के साथ होने वाली छेड़खानी शुर्खियाँ बन जाती हैं लेकिन दूर –दराज के गाँवों कस्बों में रोज बरोज होने वाली महिला उत्पीडन से जुडी गंभीर ख़बरें अन्दर के पेजों पर भी जगह नहीं पाती |आपको क्या लगता है इसकी वजहें क्या हैं और ऐसा है की नहीं ?

शीबा असलम फहमी – मै इसको सिर्फ महिलाओं से जोड़कर नहीं देखती मैं इसको मीडिया के काम करने के तरीके से जोड़ कर देखती हूँ ,मईसको मीडिया की काहिली से भी जोड़कर देखती हूँ ,दिल्ली क्यूँ छाया रहता है ख़बरों में ?दिल्ली इस लिए छाया रहता है क्यूंकि आपको भाग दौड़ नही करनी पड़ती ,आठ दस किलोमीटर जाकर ख़बरें और सुर्खियाँ ले आई जाती हैं ,अब आप देखिये दिल्ली की सर्दी को ही कितना ग्लेमराइस्द किया जाता है जबकि बांदा ,कानपुर ,लखनऊ में पड़ने वाली ठण्ड दिल्ली से कहीं बहुत ज्यादा होती है मीडिया सुविधाभोगी है ,कभी वो संसाधनों का रोना रोता है तो कभी किसी अट्टालिका पर खड़ा होकर तेज हवा को दिखलाता हुआ सर्दी का आतंक बयां करता है जबकि असल शरद जहाँ होती है वहां मौतें भी होती है पर अफ़सोस ख़बरें नहीं होती ,आप किसी उत्पीडित महिला को उनके स्टूडियो पंहुचा दीजिये ,फिर देखिये क्या खबर पैदा होती है .. Read this interview on www.network6.in (Also in Audio)

Sunday, January 09, 2011

अगली बार जब स्त्री-विमर्श सूझे ! -- शीबा असलम फ़हमी (पत्रकार, स्तंभकार, व समाजशास्त्री )

याद कीजिये, क्या अपने कभी आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति को किसी बड़े आन्दोलन या सामाजिक बदलाव का नेतृत्व करते देखा है? राजा राम मोहन राय,बाल गंगाधर तिलक, सर सैयद अहमद खान, भीमराव अम्बेडकर,छत्रपति शाहूजी महाराज,ज्योतिबा फुले, मोहनदास करमचंद गाँधी, कांशीराम या महिलाओं में रज़िया सुल्तान,लक्ष्मीबाई, चाँद बीबी, सावित्रीबाई फुले,पंडिता रामाबाई,रकमाबाई, बेगम भोपाल, ज़ीनत महल - कौन थे ये लोग ? ग़रीब-गुरबा? नहीं!
सीधी सी बात है, समाज से भिड़ने के लिए और उसके दबाव को झेलने के लिए जो आर्थिक मज़बूती चाहिए, अगर वह नहीं है तो आपकी सारी 'क्रांति' जिंदा रहने की जुगत के हवाले हो जाती है.खुद को संभाल न पाने वाला इन्सान कैसे किसी आर्थिक-सामाजिक विरोध और असहयोग को झेलकर समाज से टकराएगा ? एक निराश्रित, भूखे, कमजोर से यह उम्मीद कि वह क्रांति की अलख जगाकर परिस्थितियां बदल दे, निहायत मासूमाना मुतालबा है. लेकिन इस मामले को अगर आप स्त्री-विमर्श के हवाले से समझें तो परत-दर-परत एक गहरी होशियारी और आत्मलोभ का कच्चा चिठ्ठा खुलने लगता है.
कौन नहीं जनता कि संपत्ति में बंटवारे को लेकर समाज कितना पुरुषवादी है. बेटियों को हिस्सा देने के नाम पर क़ानूनी बारीकियों के जरिये ख़ुद को फायदे में रखने की ख़ातिर कितने वकीलों-जजों को रोजगार मुहैया कराया जा रहा है और बेटी का 'हिस्सा' तिल-तिल कर दबाया जा रहा है.
इसके बरक्स अगर आप पुरुषों के विमर्श और साहित्य की दुनिया पर नज़र डालें तो शायद ही कोई हो जो यह न मानता हो कि महिलाओं को सशक्तिकरण की ज़रूरत है. जो महिलावादी विमर्श-लेखन में नहीं हैं वे भी और जो बाज़ाब्ता झंडा उठाये हैं वे तो ख़ैर मानते ही हैं कि समाज में औरतों की हालत पतली है.
आजकल तो पुरुषों द्वारा कविता-कहानी के ज़रिये भी स्त्रियों की दयनीयता को महसूसने की कवायद शुरू हो चुकी है.ऐसे में ज़रूरी हो जाता है कि इनसे कहा जाय कि ज़रा आत्मावलोकन करें.अब इस लेखन और स्त्री आन्दोलन में पुरुष सहयोग की भागीदारी उस स्तर पर है कि जिम्मेदारी भी डाली जाय. पिछले तीन-चार सालों से जब से महिला विषयक लेखन से जुड़ी हूँ, तब से ही कुछ ख़ास तरह के साहित्य और विमर्श से दो-चार हूँ. अक्सर तो लेखक-प्रकाशक टिप्पड़ी-समीक्षा के लिए किताबें भेज देते हैं. कुछ इन्टरनेट लिंक और साफ्ट कापी आदि भी आती रही है,जिनमें अक्सर कविताएँ मिलीं जो स्त्री और स्त्री-चरित्रों का आह्वान करती हैं. पिछले लगभग एक साल से ऐसे निजी और सामुदायिक ब्लॉगों की भी भरमार हैजिनमें स्त्री-केन्द्रित कविता-कहानी-विमर्श छाया हुआ है. कुछ कविताएँ अपपनी माँ, नानी, दादी वगैरह को मुखातिब हैं उनकी ज़िन्दगी के उन पहलुओं और हादसों को याद करती हैं जब उन्हें सिर्फ़ बेटी, बहू, माँ, बहन समझा गया, लेकिन इन्सान नहीं. जो ख़ानदान में तयशुदा किरदारों में ढल गयीं और भूल गयीं कि वे अपने आप में एक इन्सान भी हैं. जिनके होने से परिवार-खानदान की कई जिंदगियां तो संवर गईं लेकिन खुद उनका वज़ूद मिट गया. कुछ और इसी तरह के स्त्री-विमर्श पर नज़र डालूं तो,पुरुष-लेखकों का एक और वर्ग है जो अनुभूति के स्तर पर 'स्त्री-मन' में प्रवेश कर, वहाँ उतर जाता है जहाँ से वे खुद औरत बनकर दुनिया देख रहे हैं. उनके भीतर की स्त्री के नजरियों को लेखनी में उतरना और फिर उन बारीकियों को आत्मसात करना.
एक और मिज़ाज है स्त्री-केन्द्रित लेखनी का,जो विमर्श-विश्लेषण द्वारा महिलाओं को बराबरी-इंसाफ़ और हक़ हासिल करने के लिए हांक लगाता है. वहाँ आह्वान के साथ-साथ धिक्कार भी है जो औरत के संकोच, बुज़दिली,धर्मभीरुता,संस्कारी और शुशील बर्ताव को छोड़, आग-ज्वाला बनने का आह्वान करता है, और इसके अभाव को स्त्री की 'गुलामी की मनोदशा' का प्रतीक मानता है.
साहित्य बिरादरी में तो स्त्री-देह को लेकर जो कुछ चल रहा है उस पर सिर्फ़ यही कह कर बात ख़त्म करुँगी कि दैहिक मुक्ति मात्र से सारी दुनिया में स्त्रीवादी क्रांति का सपना देखना अजीब लगता है. और बात जब वेशभूषा, पर्दा-प्रथा या संस्कृति पर आकर टिक जाती है तो और भी सतही हो जाती है. पुरुषों द्वारा इस तरह के स्त्री-विमर्श में भाषणबाजी के तौर पर वह सब कुछ है जो कि हम किसी प्रतिक्रियावादी विमर्श में देखते हैं.और जिसे अंग्रेजी में 'लिप-सर्विस' कहा जाता है, बस.
लेकिन इस हमदर्दी-भरे लेखन-विमर्श और विश्लेषण में ईमानदारी की बेहद कमी है जो किसी से ढंकी-छुपी नहीं है.और जिन पर पुरुष-समाज की मौन स्वीकृति जारी है और जो महिला-सबलीकरण में सबसे बड़ी बाधा है.
महिलाओं की दुर्दशा पर द्रवित साहित्य रचने वालों से लेकर,ठोस, विचारोत्तेजक और रेडिकल विमर्श करने वालों से भी यह पूछा जाना ज़रूरी हो गया है कि वह साहित्य कब रचा जायेगा जिसमें पति,पिता,भाई,पुत्र,पौत्र के असली किरदार उतरेंगें कि कैसे उनके पिता उनकी माँ के साथ खुलकर वह सब करते रहे जिससे वे दया की निरीह पात्र बनती गईं? कैसे उनके दादा-नाना-ताया का रौब-दाब कायम होता रहा? कैसे वे खुद पति के रूप में अपने पूर्वजों का अगला संस्करण बने हुए हैं? आज समाज में जिन स्रोतों से ताकत, सम्मान, आत्मविश्वास हासिल किया जाता है,स्त्री को भी ज़रूरत उन्हीं की है न की दैहिक चिंतन के चक्रव्यूह में फंसकर असली मुद्दों से भटकने की.
जो पुरुष-समाज स्त्री-मुक्ति-विमर्श में शामिल है, उनसे दो टूक सवाल है कि पिता-भाई के रूप में क्या आपने अपनी बेटी और बहन को परिवार की जायदाद में हिस्सा दिया या कन्नी काट गए? अगर पिता-भाई के रूप में पुरुष ईमानदार और न्यायप्रिय नहीं है तो उनकी बेटियां-बहनें अबलायें ही बनी रहेंगीं. पति-ससुराल और समाज में हैसियत-हीन बनने की प्रक्रिया मायके से ही शुरू होती है जब--
(1) विवेकशील होने के लिए शिक्षा नहीं मिलती.
(2) आत्मविश्वासी होने के लिए आज़ादी नहीं मिलती.
(3) आत्मनिर्भर होने के लिए परिवार-पिता की जायदाद में हक़ बराबर हिस्सा नहीं मिलता.
ये तीनों धन बेटियों को पीहर में मिलने चाहिए. अगर औरत इनसे लैस है तो ससुराल-पति क्या पूरे समाज के आगे ससम्मान ज़िन्दगी तय है लेकिन अगर पिता ही ने उसे इनके अभाव में अपाहिज बना दिया है तो क्या मायका, क्या ससुराल और क्या बाहर की दुनिया- सभी जगह उसे समझौते ही करने हैं और आत्मसम्मान, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता पर कितने ही प्रवचन उसका कोई भला नहीं कर सकते.
साहित्य-जगत में स्त्री-सबलीकरण पर आप अगली बार जब भी सोचें, कृपया यहीं से सोचें कि खुद आपने अपनी बेटी-बहन-पत्नी को परिवार की संपत्ति में 'हक़ बराबर' हिस्सा दिया क्या? क्योंकि मध्यवर्ग में स्त्री-शिक्षा पर चेतना तो कमोबेश आ गयी है, दूसरी तरफ सरकारी नीतियों की वजह से भी लड़कियों की शिक्षा आगे बढ़ी है लेकिन मर्द की जहाँ अपनी ताक़त-हैसियत में निजी स्तर पर भागीदारी की बात आती है, वह सरासर मुजरिम की भूमिका में है. तब वह दहेज़,भात, नेग आदि कुरीतियों की आड़ में छुपकर मिमियाता है कि हम बहन-बेटी को ज़िन्दगी भर देते ही हैं. बेटी को दहेज़-भात-नेग में टरकाने वाले यह सब खुद रख लें अपने लिए और जो अपने लिए जायदाद दबा रखी है वह बेटियों-बहनों को दे दें तो चलेगा? क्या वे इस अदला-बदली को तैयार होंगें?
एक और पलायनवादी तर्क यह आता है कि बेटी-बहन को तो ससुराल से भी मिलता है. यह सबसे कुटिल तर्क देते समय वे यह नहीं सोचते कि जब तुम खुद अपने खून, अपनी औलाद को नहीं दे रहे हो तो पराये लोग जो दहेज के बदले उसे ले गए, वह उसके नाम अपनी जायदाद लिखवायेंगें ? या ऐसे पिता-भाई खुद अपनी पत्नियों के नाम जायदाद का कितना हिस्सा चढ़वाते हैं कागज़ों पर?
जिस दिन बेटी के पास पलटकर वापस आने का संबल अपना 'घर' होगा जिस दिन डोली-अर्थी के चक्रव्यूह से वह मुक्त होगी, जिस दिन बुरे वक़्त में संबल बनने के लिए रिश्ते और संसाधन होंगे, उसी दिन से बहुएं-पत्नियाँ आत्मसम्मानी, आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर होंगी.
सवाल यह है कि अपने इस वाजिब हक़ को लेने के लिए प्रेरित करनेवाला न साहित्य है कहीं,न विमर्श, क्योंकि यह किसी सरकारी नीति में हिस्सेदारी का मामला नहीं है, न ही किसी दूसरे की बहन-बेटी को ' स्त्री-देह' की मानसिक जकड़न से मुक्त करवाकर स्वान्तः सुखाय भोग का मामला, इसमें तो खुद अपनी अंटी ढ़ीली करनी पड़ती है, और बैठे-बिठाये बाप की जायदाद से मिलने वाले सुख-संतोष-सुरक्षा से हाथ धोना पड़ता है.
लिहाज़ा इस पर सर्वत्र मौन सधा हुआ है और बहस इस पर जारी है की किस तरह स्त्रियाँ ख्वामख्वाह अपने शारीर के प्रति अत्यधिक सतर्क होकर गुलामी में जकड़ी हुई हैं, कैसे वे शुचितावादी धार्मिक-सांस्कृतिक परम्पराओं को धोकर जीवन-सुख से खुद को वंचित कर रही हैं. कैसे वे समाज की तयशुदा भूमिकाओं में फंसकर रह गयी हैं और एक स्वछंद स्त्री होने के सुख से वंचित हैं.कुल मिलकर वह सारा स्त्री-विमर्श जारी है जिससे खुद मर्द किसी तरह के घाटे में नहीं हैं. वह परिवार की संपत्ति पर, सारे अधिकारों पर और सत्ता पर एकछत्र राजा बना बैठा है. उसकी सत्ता पर कहीं से आंच नहीं आ रही है. वह कमजोर,अधिकारहीन, विवेकहीन, आत्मविश्वासहीन, सम्पत्तिहीन महिलाओं (बेटी, बहन,पत्नी, माँ,रखैल) से घिरा हुआ, खुद को निर्विघ्न सत्ता में बनाये हुए है. और समाज में न्यायप्रिय, आधुनिक प्रगतिशील, स्त्रीवादी दिखने के लिए वह सभी फैशनेबल सिद्धांतों-वादों को अपनी वाणी में आत्मसात कर समय-सम्मत उवाच करता है.
ऐसी सूरत में सिमोन द बाउवार से लेकर प्रभा खेतान तक, और तसलीमा नसरीन से मैत्रेयी पुष्पा तक जो भी समर्थन स्त्री-विमर्श के नाम पर आप दे रहे हैं वह गल-थोथरी से ज्यादा क्या है? और आप ख़ुद जो द्रवित, सूक्ष्म, संवेदनशील साहित्य रच रहे हैं, वह समय को देखते हुए भाषा व शब्दकोष की होशियारी दिखाने से ज्यादा क्या है?
यक़ीन मानिये, इस वक़्त मुझे सामाजिक-साहित्यिक दुनिया के कई चेहरे याद आ रहे हैं जो निजी ज़िन्दगी में पैतृक संपत्ति पर ठाठ के चलते आज सामाजिक जीवन में भी स्त्री-दलित विमर्श पर क्रांतिकारी तजवीजें दे रहे हैं, वे तसलीमा नसरीन को सुरक्षा न दे पाने के लिए भारत सरकार को भी खरी-खरी सुनाते हैं और दलितों के उत्थान के बजाय पार्कों के निर्माण के लिए मायावती को भी आड़े हाथों लेते हैं. पर उनके निजी जीवन में झांकते ही पता चल जायेगा कि जनाब बहनों को केवल दहेज-भात-नेग में टरकाने में यक़ीन रखते हैं. ऐसे सामाजिक चिंतकों के जीवन में न्याय और बराबरी के आदर्शों की जाँच-पड़ताल का समय आ गया है.
महिला-सबलीकरण की मुहिम को संसद के साथ-साथ पीहर में स्थापित करने की ज़रूरत है. और निश्चित रूप से इसमें पुरुष ही कुछ कर सकते हैं. औरतें तो बस उनके ज़मीर को जगाने की कोशिश ही कर सकती हैं. इसलिए महिला-सशक्तिकरण पर अगली बार जब विमर्श करें तो यहीं से शुरू करें कि ख़ुद अपने परिवार-ख़ानदान में सबसे पहले जायदाद में भागीदारी के कागज़ तैयार करवाएं, फिर इस मुहिम को रिश्ते-नाते, पड़ोस-मुहल्ले तक पहुंचाएं.
जिस दिन बेटियां भी बेटों की तरह मजबूत ज़मीन पर खड़ी होंगी, दुनिया हिला देंगी. ( प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ' हँस' के जनवरी २०११ अंक से साभार )

Friday, January 07, 2011

कृषि क्षेत्र की उपेक्षा का नतीजा--सुनील अमर

कुछ ताजा खबरों से पता चलता है कि देश के भीतर सब कुछ कैसे गड्मड चल रहा है। कहा जाता है कि सरकार ने अनाज ज्यादा खरीद लिया और उसे रखने की जगह नहीं है, इसलिए वह सड़ रहा है और देश की सबसे बड़ी अदालत इस पर सरकार से कैफियत तलब करती है कि जब रखने की जगह नहीं है और तमाम देशवासी भूखों मर रहे हैं तो उसे गरीबों और जरूरतमंदों में क्यों नहीं बांट देते? सरकारी विभागों ने ही दो महीने पहले बता दिया था कि प्याज की पैदावार इस साल भारी बरसात के कारण 60 प्रतिशत कम हुई है, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री एक-दूसरे से पूछ और बता रहे हैं कि प्याज की कीमतें आसमान कैसे छूने लगी हैं!

यह भी गौर करने की बात है कि प्याज की कीमतें लगभग साल भर से बढ़ ही रही हैं। अब इधर जब बिचौलिये अपनी तिजोरी भरने में और उजड़े हुए किसान अपनी जान गंवाने में लगे हैं तो सरकार ने ब्रह्मास्त्र चलाते हुए महाराष्ट्र के प्याज-किसानों को 400 करोड़ रुपयों का एक राहत पैकेज देने की घोषणा कर दी है। दूसरी तरफ मंहगी दर पर प्याज खरीद कर उसे सस्ती दर पर जनता को उपलब्ध कराने का खेल भी दिल्ली में शुरू हुआ है। इन सबके साथ-साथ खबर है कि पाकिस्तान से प्याज का आयात हो रहा है और (रोक के बावजूद) देश से प्याज का निर्यात भी बदस्तूर जारी है!

देश की सत्ता को जब संप्रग ने अपनी पहली पारी के रूप में 2004 में संभाला था, तब यह बात बहुत जोर-शोर से प्रचारित की गई थी कि पहली बार ऐसा स्र्वणिम अवसर आया है जब दुनिया के चार वरिष्ठ अर्थशास्त्री भारत सरकार में मौजूद हैं-वे हैं- प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री प्रणव मुर्खजी, गृहमंत्री पी. चिदम्बरम तथा योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया। उस वक्त यह भी याद दिलाया गया था कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए देश में पहली बार नये आर्थिक सुधारो का एजेंडा लागू किया था। तब से अब तक दिल्ली की यमुना में बहुत पानी बह चुका है और देश की गरीब जनता का बहुत सा खून और पसीना भी। सरकार के अपने ही आंकड़ें बताते हैं कि देश की तीन चौथाई आबादी घोर बदहाली में जी रही है और एक दशक में दो लाख से अधिक अन्नदाता हताशा के कारण कीटनाशक पीकर अपनी जान दे चुके हैं। इतने किसानों की आत्महत्याओं के बावजूद हमारे दूरअंदेशी अर्थशास्त्री अहलूवालिया जी का निष्र्कष है कि देश में महंगाई इसलिए बढ़ रही है, क्योंकि गांवाें में अमीरी आ गई है!

सत्तारूढ़ कांग्रेस ने अपनी स्थापना के 125 र्वष पूरे होने का जश्न हाल ही में अपने 83वें अधिवेशन के रूप में मनाया। अधिवेशन में कृषि संबंधी जो प्रस्ताव पेश किया गया, उसमें बताया गया कि देश में 52 प्रतिशत लोगों को कृषि से रोजगार मिल रहा है, लेकिन इसके विपरीत पिछले महीने ही केन्द्र सरकार के श्रम मंत्रालय ने एक सव्रे रपट जारी की है जिसमें बताया गया है कि कृषि से रोजगार हासिल करने वालों की संख्या घटकर अब सिर्फ 45.5 प्रतिशत रह गयी है तथा बड़ी संख्या में लोग खेती छोड़ रहे हैं! उधर बीते 12 नवम्बर को दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में आयोजित जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन में विश्व नेताओं को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने घोषणा की थी कि देश की अर्थव्यवस्था काफी मजबूत है और शीघ्र ही यह नौ प्रतिशत की विकास दर को छूने वाली है। संयोग देखिए कि उसी के सिर्फ एक दिन पहले श्रम मंत्रालय ने एक सव्रे रपट जारी कर बताया कि राष्ट्रीय सैम्पल सव्रे ने 2007-08 में देश में बेरोजगारों की जो संख्या एक करोड़ बतायी थी, वह अब बढ़कर चार करोड़ से अधिक हो गयी है! इसका क्या मतलब माना जाए कि अपनी ही सरकार की रपट का पता कांग्रेस और उसके प्रधानमंत्री को नहीं है या वह सच्ची रिपोर्ट पेश नहीं करना चाहती ? सचाई यह है कि देश में जब भी इन्फ्रास्ट्रक्चर यानी आधारभूत ढांचे की बात की जाती है तो उसमें कृषि को कोई खास महत्व नहीं दिया जाता। जब कृषि पर निर्भरता 75 प्रतिशत थी तब भी और अब जबकि सरकार 52 प्रतिशत बता रही है तब भी। यही कारण है कि देश के इस सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र की हमेशा उपेक्षा की गई। कांग्रेस ने इस अधिवेशन में कृषि पर पेश प्रस्ताव में भले ही पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का यह र्चचित उद्धरण पेश किया कि ‘..और सभी क्षेत्र प्रतीक्षा कर सकते हैं लेकिन कृषि नहीं।’ लेकिन वास्तविकता यह है कि सिर्फ छंटी-छटाई सैद्धान्तिक बातों के अलावा कृषि की बेहतरी के लिए सरकार के पास न तो कोई विचार हैं और न कोई योजना। केन्द्रीय मंत्री सचिन पायलट ने जरूर कृषि क्षेत्र को लेकर अपनी चिंता और सुझावों से अधिवेशन को अवगत कराया लेकिन इस पर अमल कर पाना उनकी पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार के वश की बात नहीं लगती। श्री पायलट का सुझाव था कि उर्वरक अनुदान (सब्सिडी) के रूप में प्रतिर्वष जो एक लाख करोड़ से ऊपर की धनराशि उर्वरक निर्माताओं को दी जाती है वह सीधे किसानों को दी जाए। इस मुद्दे पर कुछ र्चचा की जा सकती है। दरअसल संप्रग प्रथम ने ही यह तय किया था कि उर्वरकों पर छूट की व्यवस्था में परिर्वतन की आवश्यकता है और छूट की धनराशि के कूपन तैयार कर किसानों को दे दिये जाएं ताकि किसान बाजार भाव पर उर्वरक खरीद कर तथा दुकानदार को छूट का कूपन देकर उसका लाभ प्राप्त कर लें। अभी कुछ माह पहले यह भी तय किया गया था कि छूट के कूपन बैंकों के माध्यम से किसानों को दिये जाएं, लेकिन यह व्यवस्था आज तक लागू नहीं हो पाई है क्योेंकि उर्वरक निर्माताओं की लॉबी बहुत प्रभावशाली है। वहां से लेकर सरकार तक इसमें प्रतिर्वष अरबों रुपयों का खेल होता है। यह जानना दिलचस्प होगा कि पूर्व केन्द्रीय उर्वरक और पेट्रोलियम मंत्री रामविलास पासवान के कार्यकाल में र्वष 2004-05 में जो उर्वरक अनुदान 15,779 करोड़ रुपये का था वह एक साल बाद 2006-07 में बढ़कर 40,338 करोड़ रुपये तथा 2008-09 में तो 1,19772 करोड़ रुपये का हो गया!

आखिर देश में उर्वरकों की खपत कितनी है जो मात्र यूरिया और डीएपी पर ही एक साल में सवा लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी दे दी गई? क्या देश के किसान इतनी खाद इस्तेमाल करने भर के लिए अमीर हो गये हैं? किसानों की बदहाली की दैनिक र्चचाओं के बीच उर्वरक निर्माताओं के इस दुष्प्रचार पर आंख मूंदकर कैसे यकीन कर लिया जाए कि किसान उर्वरको का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं। दरअसल अनुदान लेने के लिए र्फजी उत्पादन दिखाने का जो खेल होता है, वह किसी से छिपा नहीं है। श्री पायलट ने यह भी कहा कि कृषि ऋणों पर ब्याज अब भी बहुत ज्यादा है और इसे कम किया जाना चाहिए। ध्यान रहे कि राष्ट्रीय किसान आयोग के पूर्व अध्यक्ष और प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक डा. स्वामीनाथन ने चार र्वष पूर्व ही सरकार को सुझाव दिया था कि कृषि ऋण पर ब्याज चार प्रतिशत से भी कम रखा जाए लेकिन संप्रग सरकार आज तक इसे क्रियान्वित नहीं कर पाई। महाराष्ट्र के किसानों को बार-बार हजारों करोड़ रुपयों का राहत पैकेज केन्द्र सरकार दे रही है लेकिन क्या किसानों की हालत और आत्महत्याओं के आंकड़ों में कोई सुधार हो रहा है? फिर इस तरह के शोशे छोड़ कर सरकार किसे बहलाना चाह रही है?oo in Rashtriya Sahara on edit page 07-01-2011

Monday, January 03, 2011

बिनायक को सजा दिलाने के लिए भाजपा ने की पैरोकारी ---- शीतला सिंह

छत्तीसगढ़ में रायपुर की एक अदालत ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) के उपाध्यक्ष और सामाजिक कार्यकर्ता बिनायक सेन सहित नक्सल विचारक नारायण सान्याल और कोलकाता के कारोबारी पीयूष गुहा को भारतीय दंड विधान की धारा 124 ए (राजद्रोह) और 120 बी (षडयंत्र) के तहत उम्रकैद की सजा सुनायी है। श्री सेन को 14 मई 2007 को बिलासपुर में गिरफ्तार किया गया था। बिनायक सेन को देश में समाज सेवा के लिए कई सम्मान मिले हैं। कई अन्य देशों में भी विश्व स्वास्थ्य मिशन आदि के लिए उन्हें कई सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उनकी वैचारिक विरोधी रही भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें गंभीर सजा देने के लिए विशेष पैरोकारी की थी।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में राज्य और सरकार दोनों को एक ही नहीं माना जा सकता। राज्य तो स्थायी व्यवस्था है, लेकिन सरकारें देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप आती-जाती रहती हैं। व्यवस्था चलाने के लिए इन सरकारों का विधायी अंग कानून भी बनाता है और जिसके अनुरक्षण का दायित्व स्थायी तत्व के रूप में कार्यरत कार्यपालिका के पास होता है। न्यायपालिका को भी राज्य का अंग ही माना जाता है, क्योंकि उसकी सत्ता अलग से नहीं है।

भारतीय संविधान में नागरिकों को मूल अधिकार दिये गये हैं। उसी के अनुच्छेद 19 (1) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के क्रम में ही राजनीतिक संगठनों के बनाने और चलाने का भी अधिकार है। इस अधिकार में प्रतिबंध केवल उपक्रम के लिए ही लगाया जा सकता है। लोक व्यवस्था कानून व्यवस्था का पर्यायवाची नहीं माना जा सकता, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत 1951 में जो परिवर्तन किये गये थे, वे ही सरकारों को सार्वजनिक व्यवस्था के क्रम में कदम उठाने का भी अधिकार देते हैं, पर यह मूल अधिकारों को समाप्त करके नहीं। अंग्रेजों द्वारा बनायी गयी भारतीय दंड विधि की धारा 124 ए में राजद्रोह को यूं परिभाषित किया गया है- ‘जो कोई व्यक्ति लिखित या मौखिक शब्दों, चिन्हों या दृष्टिगत निरूपण या किसी भी तरह से नफरत या घृणा फैलाता है या फैलाने की कोशिश करता है या भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ विद्रोह भड़काता है या भड़काने की कोशिश करता है, उसे आजीवन कारावास या उससे कुछ कम समय की सजा दी जायेगी, जिसमें जुर्माना भी लगाया जा सकता है या जुर्माना किया जा सकता है।

इसके साथ ही तीन व्याख्याएं भी दी गयी हैं (1) विद्रोह की अभिव्यक्ति में शत्रुता की भावनाएं और अनिष्ठा शामिल है। (2) बिना नफरत फैलाए या नफरत फैलाने की कोशिश किये, अवज्ञा या विद्रोह भड़काए बिना सरकार के कार्यों की आलोचना करने वाले मत प्रकट करना जिसमें कानूनी रूप से उन्हें सुधारने की बात हो, तो यह इस धारा के अंतर्गत अपराध नहीं माना जायेगा। (3) बिना नफरत फैलाये या नफरत फैलाने की कोशिश किये, अवज्ञा या विद्रोह भड़काए बिना प्रशासन या सरकार के किसी अन्य विभाग की आलोचना करने वाले मत प्रकट करना इस धारा के अंतर्गत अपराध नहीं माना जायेगा। इसलिए लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण आंदोलन को राजद्रोह की परिभाषा में नहीं रखा जा सकता। यदि ऐसा करने का अधिकार न होगा तब तो लोकतंत्र जो एक दल या विचारक या कार्यक्रम वाले दल द्वारा चलाया जा रहा हो, उसे फिर कैसे हटाया जायेगा। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने अभिव्यक्ति के प्रतिबंध के संबंध में भी कुछ मानक बनाये हैं- यानी जहां दबाना आवश्यक है, कोई सामुदायिक हित खतरे में है, लेकिन यह खतरा अटकलों पर नहीं होगा बल्कि पब्लिक आर्डर के लिए आंतरिक रूप से खतरनाक होना जरूरी है। इसी प्रकार 124 ए के अंतर्गत विराग (डिसअफेक्शन) कहा जा सकता है। वह भी इससे सीधा सम्बद्ध है।

इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर इस संबंध में जो निर्णय दिये हैं उसे ‘विराग’ को स्नेह या बुरी भावना से अलग किया गया, व्यवस्था या अव्यवस्थाओं में अन्तर किया गया है। विद्रोह उकसाने के लिए किसी व्यक्ति को आरोपित करने हेतु अभिव्यक्ति और सरकार के बीच सीधा संबंध होना जरूरी है। गड़बड़ी की आशंका से विद्रोह को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए सरकार के प्रति अनास्था और उसे बदलने का प्रयत्न दोनों अलग-अलग तत्व हैं। अनास्था को अराजकतावाद कहा जा सकता है, जिसमें तर्क यह है कि सरकार व्यक्ति के मूल और स्वाभाविक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाती है और उसके लिए निरंकुशतापूर्ण हो जाती है। जब यह निरंकुशता प्रतीक बन जाये तब इससे कैसे लड़ा जाये? क्योंकि सारे संहारक अस्त्र तथा उनका संगठित प्रयास सरकार के हाथ में ही होते हैं। इस अराजकतावाद में भी व्यक्ति के सामान्य जीवन व स्थापना का सिद्धान्त अस्वीकार्य नहीं किया गया है।

जब सरकारें होंगी, तब उनके खिलाफ असंतोष भी होगा और वह विभिन्न स्वरूप ग्रहण करेगा। इसके लिए आंदोलन भी होंगे, लेकिन उन्हें कुचलने के लिए राज्य तभी कोई कदम उठा सकता है जब हिंसा को प्रोत्साहित करने के कोई कदम उठाये गये हों। यह केवल भावनाओं पर आधारित नहीं हो सकता। लोकतांत्रिक और निर्वाचित सरकारों के खिलाफ आंदोलन या अभिव्यक्ति को राजद्रोह का कारण मान लिया जायेगा तब तो यह सरकारों की निरंकुशता ही सुदृढ़ करेगा। उनकी असंवेदनशीलता के परिणामों से ग्रस्त होने से बचने के लिए प्रतिरोध ही तो विकल्प होगा। लेकिन बारीक धारा यही है कि वह हिंसक नहीं होना चाहिए।

इसीलिए जब 124 ए की परिभाषाएं की गयी हैं और कहा गया है कि ‘कानून द्वारा स्थापित सरकारों को उन लोगों से अलग होकर देखना चाहिए जो कुछ समय के लिए कार्य कर रहे हों। इसलिए यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति और उसकी सजा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजद्रोह की सीमाएं निर्धारित करता है कि इसका प्रयोग जनता के मूल अधिकारों को समाप्त करने के लिए नहीं हो सकता। इसी प्रकार सरकार का काम विचारों पर प्रतिबंध लगाना नहीं है। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता समाज के विभिन्न अंगों व समुदायों को प्रदान की गयी है। केवल समाचार-पत्रों को ही नहीं है। वे भी आम जन समुदाय की श्रेणी में आते हैं।

इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के क्रम में ही संगठन बनाने और चलाने की आजादी को भी देखा जाना चाहिए। उनकी निष्ठा सरकार के प्रति हो, ऐसा आवश्यक नहीं है। इसलिए इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर अंतिम निर्णय तो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ही होना है। कुल मिलाकर यह निर्णय न केवल भावनाओं, अटकलों और उनके कल्पित परिणामों पर आधारित है, बल्कि अव्यवस्था को साधारण परिभाषा में ही मूल अधिकारों से अलग करके लिया गया है.
(श्री शीतला सिंह जनपद फ़ैजाबाद, उत्तर प्रदेश से प्रकाशित हो रहे सहकारी समाचार पत्र दैनिक जनमोर्चा के मुख्य संपादक हैं और पिछले कई बार से वे भारतीय प्रेस परिषद् के सदस्य हैं! श्री सिंह ने अयोध्या विवाद के समाधान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर बहुत कार्य किया है)